बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar Janjati Chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे  बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe Chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar Janjati Chhattisgarh Binjhwar Tribe Chhattisgarh

बिंझवार जनजाति की उत्पत्ति 

बिंझवार जनजाति की जनसंख्या 2011 की जनगणना छत्तीसगढ़ में 119718 दर्शित है। इनमें पुरुष 59653 तथा स्त्रियाँ 60065 है । बिंझवार जनजाति मुख्यतः महासमुंद, रायपुर, बिलासपुर, कोरबा तथा रायगढ़ जिले में पाई जाती है।

बिंझवार जनजाति के उत्पत्ति संबंध में ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है । दंतकथाओं के आधार पर ये अपनी उत्पत्ति विन्ध्याचल पर्वत मानते हैं। ये विन्ध्यकूप से लम्बा प्रवासित होकर आये। लम्बा का अर्थ या तो बालाघाट स्थित लम्बा या बिलासपुर के लाफागढ़ से लगाया जा सकता है। कुछ विद्वान इन्हें बैगा जनजाति से अलग हुआ एक भू-स्वामी समूह मानते हैं, जो स्थाई कृषि करने लगे । ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

किवदन्ती अनुसार ये अपनी उत्पत्ति बारह भाई बेतकार से भी मानते हैं विन्ध्यवासिनी के बारह पुत्र बेतकार धर्नुविद्या का अभ्यास कर रहे थे। छोटे भाई का एक तीर पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दरवाजे में जा लगा। दरवाजा बंद हो गया। पुरी के राजा, प्रजा एवं सैनिकों ने तीर निकालने तथा दरवाजा खोलने का बहुत प्रसास किया, किन्तु कोई भी ना ही तीर निकाल सका न दरवाजा खोल सका। बारह भाई बेतकार तीर को खोजते हुए यहाँ आये। छोटे भाई ने अपने हाथों से खींचकर तीर निकालकर मंदिर का दरवाजा खोल दिया। इससे वहाँ का राजा प्रसन्न हुआ और उन्हें बहुत-सी जमीन प्रदान की।

बिंझवार जनजाति इसी को अपना पूर्वज मानते हैं। सोनाखान, बोडासामर, रामपुर तथा भटगाँव में इनकी जमींदारी थी। छत्तीसगढ़ में अंग्रेजी हुकुमत का विरोध करने वाली 1857 की क्रांति के मुख्य सूत्रधार शहीद वीर नारायण सिंह सोनाखान के बिंझवार जमींदार के सुपुत्र थे । ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

बिंझवार जनजाति के रहन-सहन 

बिंझवार जनजाति सामान्यतः कंवर, सावरा, गोंड आदि जनजातियों के साथ ग्राम में निवास करते हैं। इनका घर की दीवार मिट्टी की बनी होती हैं, जिस पर देसी खपरैल का छप्पर होता है । घर में सामान्य रूप से दो-तीन कमरे होते हैं। दीवारों पर सफेद या पीली मिट्टी की पुताई करते हैं ।

घर का फर्श मिट्टी का होता है, जिसे प्रतिदिन गोबर लोपते हैं। घर में कमरे के आगे परछी होती है । पशुओं के लिए अलग कोठा होता है । इनके घर में अनाज की कोठी, “जांता” (चक्की), ढेकी, मूसल, चारपाई, ओढ़ने बिछाने के कपड़े, मिट्टी का चूल्हा, भोजन बनाने व खाने के कुछ बर्तन, कृषि उपकरण, वाद्य यंत्र आदि पाया जाता है।

पुरुष व महिलाएँ प्रतिदिन बबूल, नीम, करंज की दातुन से दाँत साफ कर स्नान करते हैं । शरीर से मैल निकालने के लिये चिकने पत्थर से शरीर को रगड़ कर नहाते हैं। पुरुष दाढ़ी, मूंछ व सिर के बाल नाई से कटाते हैं । स्त्रियाँ सिर के बाल लम्बे रखकर चोटी गूँथकर जूड़ा बनाती हैं । सिर के बालों में मूँगफली, तिल, गुल्ली का तेल डालकर कंघी करते हैं। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

स्त्रियों के हाथ, पैर, चेहरे पर गुदना पाया जाता है। स्त्रियाँ ” गहने” (आभूषण) की शौकीन होती हैं। प्रायः इनके “गहने” चाँदी या गिलट के होते हैं। पैर की उँगलियों में बिछिया, पैर में सांटी, तोड़ा, कमर में करधन, हाथ की कलाई में ऐंठी, नागमोरी, बाहों में पहुंची, गले में सुरदा, रुपिया माला, कान में खिनवा और नाक में फूली पहनती हैं।

वस्त्र-विन्यास में पुरुष पंछा व बंडी, स्त्रियाँ लुगड़ा, पोलका पहनती हैं। इनका मुख्य भोजन कोदो अथवा चावल का भात, बासी, पेज, मौसमी सब्जी, उड़द, मूंग, तिवड़ा की दाल है। जंगली कंदमूल भाजी भी खाते हैं । मांसाहार में मछली, मुर्गी, बकरा का मांस खाते हैं । उत्सव, त्योहार पर महुआ से निर्मित शराब पीते हैं। पुरुष धूम्रपान के रूप में बीड़ी पीते हैं। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar Janjati Chhattisgarh Binjhwar Tribe Chhattisgarh )

बिंझवार जनजाति के व्यवसाय 

इस जनजाति का आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि, जंगली उपज संग्रह व मजदूरी पर आधारित है। अधिकांश परिवारों के पास पैतृक कृषि भूमि है। इनमें कोदो, धान, तिवड़ा, उड़द, मूंग, अरहर, तिल बोते हैं। असिंचित जमीन होने के कारण उत्पादन कम होता है। जंगली उपज में तेंदूपता, तेंदू, चार, हर्रा, गोंद, शहद, लाख एकत्र करते हैं। तेंदूपत्ता वन विभाग को बेचते हैं। 

अन्य वनोपज स्थानीय बाजार में बेचते हैं। भूमिहीन या कम भूमि वाले परिवार दूसरे अन्य आदिवासी या गैर आदिवासी परिवारों के खेतों में मजदूरी करने जाते हैं। पहले कभी-कभी शिकार भी करते थे, अब प्रतिबंध के कारण शिकार नहीं करते। वर्षा ऋतु में अपने उपयोग के लिए मछली पकड़ते हैं। जनगणना 2011 के अनुसार इस जनजाति के 53.3 प्रतिशत जनसंख्या पूर्णतः कार्यशील एवं 42.0 प्रतिशत आंशिक कार्यशील है। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

बिंझवार जनजाति मुख्यतः 4 उपजातियाँ हैं। बड़े विझवार, सोनझरा, बिरजिया तथा बिझिया पाई जाती है। सभी उप जाति बहिर्विवाही समूह है। बड़े बिंझवार पहले जमींदार थे, उच्च माने जाते है। सोनझरा नदी से स्वर्ण एकत्र करते थे। बिरजिया पहले बेवरा खेती करते थे और बिझिया के संबंध में किवदन्ती है कि उनके पूर्वज से किसी गोंड राजा की हत्या हो गई थी। उपजातियाँ पुनः गोत्र में विभक्त है।

इनके प्रमुख गोत्र -पंडकी, लोही, बाघ, सेतबाघ, करही बाघ, डोंढ़का, नाग, धान, अमली, सोनवानी, सरई, भैंसा, भौरा, सेमी, ताड़, कमलिया, माझी, सरई, जाल, दूध कंवरिया, पंकनाली आदि हैं। इनके गोत्र नाम से दर्शित है कि वन एवं वन्य जीवों से इनका महरा संबंध रहा है। परिवार पितृसत्तात्मक, पितृवंशीय व पितृ निवास स्थानीय होता है। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

बिंझवार जनजाति के परम्परा 

गर्भावस्था में कोई संस्कार नहीं किया जाता। गर्भवती महिलाएँ प्रसव के पूर्व तक आर्थिक व पारिवारिक कार्य करती रहती हैं। प्रसव घर पर स्थानीय ” सुइन दाई” द्वारा कराया जाता है। बच्चे का नाल भरुवा घास के पंची या ब्लेड से काटते हैं। नाल को घर में गड्ढा खोदकर गड़ाते हैं। प्रसूता को सोंठ, गुड़, अजवायन, घी, पीयर, असंगंध से निर्मित पौष्टिक लड्डू और चाय पीने को देते हैं।

छठे दिन छठी मनाते हैं। परिवार के पुरुष नाई से “हजामत बनवाते हैं। रिश्तेदारों, मित्रों को चाय, बीड़ी तथा बात” बनवाते हैं। रिश्तेदारों, मित्र दारू पिलाते हैं। प्रसूता व बच्चे को स्नान करा नया कपड़ा पहनाकर कुल देवी-देवता का प्रमाण कराते हैं। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

विवाह उम्र लड़कों का 18 से 20 वर्ष एवं लड़कियों का 16 से 18 वर्ष माना जाता है। विवाह प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है। वर के पिता वधू के पिता को अनाज (चावल), दाल, गुड़, तेल, हल्दी, नारियल व कुछ नगद रुपया “सूक भरना” देता है। विवाह चार चरण क्रमशः मंगनी, फलदान, बिहाव तथा गौना में पूर्ण होता है। पहले जाति के बुजुर्ग व्यक्ति वर-वधू को फेरा लगवाते थे, अब ब्राह्मण बुलाने लगे हैं।

इसके अतिरिक्त घर जमाई (सेवा विवाह), विनिमय (गुरांवट), घुसपैठ (पैटू), सहपलायन (साथ-साथ दूसरे गाँव भाग कर ), विधवा पुनर्विवाह (चूड़ी पहनाने), द्वारा साथ-साथ रहने वाले दम्पत्ति को भी समाज में प्रचलित प्रथा के द्वारा मान्यता दी जाती है। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

 मृत्यु होने पर मृतक को दफनाते हैं। तीसरे दिन नजदीक के रिश्तेदारों में पुरुष अपनी दाढ़ी, मूँछ, सिर के बाल का मुण्डन कराते हैं। 10वें दिन दशकरम करते हैं, जिसमें स्नान के पश्चात् पूर्वजों की पूजा करते हैं। रिश्तेदारों को मृत्यु भोज कराते हैं। पितृ पक्ष में मृत पूर्वज के नाम पर जल तर्पण कर दाल-भात बड़ा आदि रखते हैं।

इस जनजाति में परंपरागत जाति पंचायत (समाज पंचायत) पाई जाती है। पंचायत का प्रमुख “गौटिया” कहलाता है। इस पंचायत में विवाह, तलाक, अनैतिक संबंध आदि विवादों का निपटारा किया जाता है। वर्तमान में जिला स्तरीय तथा राज्य स्तरीय संगठन भी कार्यरत है। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

बिंझवार जनजाति के देवी देवता 

इनके प्रमुख देवी-देवता ठाकुर देव, बूढ़ादेव, घटवालिन, दूल्हा देव, करिया धुरवा, भैंसासुर, सतबहेनिया, कंकालिन माता आदि है। इसके अतिरिक्त हिंदू धर्म के सभी देवी-देवताओं यथा राम, कृष्ण, शिव, हनुमान, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती आदि की पूजा करते हैं। सूरज, चंद्रमा, पृथ्वी, नदी, पहाड़, नाग आदि को भी देवता मानते एवं पूजा करते हैं। परंपरागत देवी-देवता को मुर्गा, बकरा, सुअर आदि की बलि दो जाती है।

इनके प्रमुख त्योहार हरेली, पोला, नवाखानी, दशहरा, दिवाली, होली आदि है। भूत-प्रेत, जादू-टोना पर विश्वास करते हैं। जादू-मंत्र के जानकार व्यक्ति ” बैगा ” तथा “झांखर” कहलाता है । ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

बिंझवार जनजाति के लोग करमा पूजा पर करमा नृत्य, होली पर रहस, बिहाव पर विवाह नाच, राम सप्ताह पर राम सप्ताह तथा दिवाली पर महिलाएँ पड़की नाचती हैं। लोकगीतों में सुआ गीत, ददरिया, करमा, बिहाव गीत, रामधुनी, फाग आदि प्रमुख हैं।

जनगणना 2011 के अनुसार इस जनजाति में कुल साक्षरता 60.9 प्रतिशत है। पुरुषों में साक्षरता 73.8 प्रतिशत व महिलाओं में साक्षरता 48.0 प्रतिशत है। ( बिंझवार जनजाति छत्तीसगढ़ Binjhwar janjati chhattisgarh binjhwar tribe chhattisgarh )

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source : Internet

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