पंडो जनजाति छत्तीसगढ़ | Pando Janjati Chhattisgarh | Pando Tribes

पंडो जनजाति छत्तीसगढ़ Pando Janjati Chhattisgarh Pando Tribes

सरगुजा जिले में पांडो लोगों की संख्या. बहुत कम है। इनकी जनजाति विशिष्टतायें, उरांव लोगों से भिन्न है। उरांव लोगों का इनकसे दूर का था अर्थात् मातृपक्ष की ओर से मौसेरे भाई का रिश्ता है और इसलिये पांडों लोग अपने को उरांवों से श्रेष्ठ समझते है।

इन आदिवासियों के नामों के अन्न्याक्षर भी एक से होते है। पांडो मुख्यिा का नाम दाखल साई है तो उरांव मुखिया का नाम मंगल साई, साई आदि है। वे अपनी सावधानी बोध तथा सफाई-पसन्दगी के लिये जाने जाते है।

उनमें व्यक्तिगत तथा पारिवारिक आरोग्य का उच्चबोध होता है। पाण्डो छत्तीसगढ़ की एक जनजाति है. भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ के लिए जारी अनुसूचित जनजाति की सूची में भारिया, भूमिया, भूइंहर के साथ दर्शाई गई है. विशेष पिछड़ी जनजाति को प्रदान की जाने वाली सुविधाएं के समकक्ष सुविधा पाण्डो जनजाति को भी प्रदाय करने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा आदेश जारी किया गया है।

आर्थिक जीवन

मुख्य: वनोपज संग्रह, बांस बर्तन निर्माण मजदूरी कृषि पर आधारित है। जंगलों में चिरौंजी, तेंदू, महुआ, आंवला, हर्रा, बहेड़ा, तेंदूपत्तवा, धवई फूल, गोंद, शहद, सूखी लकड़ी आदि एकत्रित कर स्थानीय बाजार में बेचते हैं।

कंदमूल यथा- बहुनी कांदा, बिरालू कांदा बंजागर कांदा, बोड़ा, महुआ आदि का उपयोग भोजन के रूप में करते हैं। बांस से अनाज रखने की डलिया, टोकरी, सूपा आदि बनाते हैं।

जिनके पास थोड़ी कृषि भूमि है, वे कोंदो, कुटकी, मड़िया, मक्का, धान, उड़द, कुलथी, मूंग आदि बोते हैं। स्थानीय अन्य आदिवासी या गैर आदिवासी कृषकों की खेती में मजदूरी करते हैं।

पाण्डो जनजाति में दो समूह पाया जाता है सरगुजिया और उत्तरांश। इस जनजाति के मुख्य गोती (गोत्र) भलवा, मनिगा, भूसर, चमढ़िया, दारी, चरगेड़िया, मरकाम, गोसाई, कमरो, मछराहा, पिपरिया, सिरम, चटगोहिाय, भूसर, शिकारी, भंवर, बिलमिया, टकरिया, टोटरवा आदि हैं।

जनगणना

2011 में छत्तीसगढ़ड में इनकी जनसंख्या, भारिया, भूमिया, भूमिहर-भूमिया आदि के साथ शामिल की गई है। पिछले सर्वेक्षण के अनुसार छत्तीसगढ़ में पाण्डो जनजाति की जनसंख्या 31814 दशाई गई है. इस जनजाति की मुख्य जनसंख्या सरगुजा, सूरजपुर, कोरिया आदि जिले में निवासरत हैं।

साक्षरता

जनगणना 2011 में भारिया, भूमिया, सिंगर के साथ शामिल करते हुए दर्शाई गई है। किंतु पाण्डो महिला एवं पुरुषों में साक्षरता अन्य जनजाति की तुलना में काफी कम है। इस जनजाति के लोग पाण्डो बोली बोलते हैं।

उत्पत्ति

प्रचलित दंतकथाओं के अनुसार इस जनजाति के लोग अपनी उत्पत्ति महाभारत काली पाण्डव से मानते हैं। इनके अनुसार पांच भाई पाण्डव अपना राजपाट जुए में हार कर 12 वर्ष का बनवास काल में बिताए थे।

जंगल व कांदमूल, फल-फूल खाकर अपना गुजर बसर करते थे। पाण्डो जनजाति के लोग उन्हें कंदमूल एकत्र कर भोजन के लिए देते थे।

माता द्रोपदी ने इन्हें बांस से विभिन्न प्रकार की टोकरी, सूपा आदि निर्माण करने की कला तथा गाण्डीवधारी अर्जुन ने इन्हें तीर-धनुष बनाना तथा चलाना सिखाया था। इनके लोकगीत तथा लोक कथाओं में पाण्ड्व राजा का उल्लेख आता है।

बिलासपुर जिले में स्थित मरवाही ब्लॉक के जंगलों में पंडो आदवासी विशेष पिछड़ी जनजाति के कंधों पर लटके तीर-कमान इनकी पहचान बन चुके हैं। ये बिना अंगूठे के इतना सटीक निशाना लगाते हैं ये खुद को को एकलव्य का वंशज बताते हैं।

जिस एकलव्य ने गुरु द्रोण की प्रतीमा बनाकर धनुर विद्या सीखी थी वहीं अब उसके वंशज एकलव्य की प्रतीमा बनाकर इस विद्या को साधने में लगे हैं। तीर चलाते समय अंगूठे का इस्तेमाल न कर वह अपने पूर्वजों को सम्मान देते हैं।

प्रमुख देवी-देवता

महामाई, वागेश्वर देव, दिहारी माई, बरहिया दे, गोती देव/देवी (कुल देव/देवी), बाबा देव, अन्न कुमारी, राकशपाट, छुरी पार आदि है।

उनके प्रमुख देवता बराईथन है, वे ज्वालामुखी नामक देवी की भी पूजा करते है, जो आदिवासियों की कोई शक्ति देवी प्रतीत होती है, जिसकी पूजा विंध्याचल पर्वत श्रेणियों में सर्वत्र की जाती थी।

देवी देवता की पूजा त्यौहार, उत्सव आदि में सिंदूर व चावल चढ़ाकर, गुड़ का होम देर शराब तथा मुर्गी, सुअर, बकरा आदिग की बलि देकर करते हैं।

प्रमुख त्यौहार

करमा तिहार, लाटा महुआ तिहार, होली, दशहरा, दिवाली आदि हैं. भूत प्रेत, जादू-टोना में विश्वास करते हैं. करमा पूजा के समय लड़के व लड़कियां करमा नृत्य करती हैं।

होली के समय होली नृत्य, विवाह में बिहाव नाचते हैं। इनमें प्रमुख लोक गीतों में करमा गीत, बिहाव गीत, फागुन आदि है।

दीवार मिट्टी की , छप्पर घास फूस या देशी खपरैल की बनी होती है। प्राय: एक या दो कमरा होता है। एक किनारे पर चूल्हा, बर्तनों में हंडी, कनौजी, गघरी, तवा मिट्टी के होते हैं। एल्युमिनियम या पीतल की थाली, कटोरी, लोटा, गंजी आदि होता है।

पुरुष व महिलाएं

करंज, हर्रा या नीम के दातौन से दांतों को सफाई करते हैं. प्रतिदिन स्नान करते हैं। शरीर एवं बालों में गुल्ली का तेल लगाकर महिलाएं सिर पर जुड़ा या चोटी बनाती है।

पुरुष पंछा, बंडी, स्त्रियां लुगड़ा पहनती है। स्त्रियां शरीर पर गोदना गुदवती है। स्त्रियां हाथों में कांच की चुड़ियां, नाक में फूली, कान में खिनवा, गले में माला पहनती है, जो स्थानीय बाजारों से खरीदती है।

मुख्य भोजन

चावल, कोदो, कुटकी आदि का भात या पेज, उड़द, मूंग, कुलथी, बेलिया की दाल, मौसमी सब्जी या जंगली भाजी है। वर्षा ऋतु में कंदमूल ,तता,महुआ की रोटी, बोड़ा आदि खाते हैं।

मांसाहार में मुर्गी, बकरा, खरगोश, सुअर, जंगली पक्षी मछली, केकड़ा आदि खाते हैं। उत्सव पर महुआ से स्वनिर्मित शराब पीते हैं। चावल से निर्मित हंडिया भी पाते हैं।

गोत्र

विवाह के लिए वर एवं कन्या का गोत्र अलग-अलग होना आवश्यक है. पाण्डो जनजाति की गर्भवती स्त्रियां प्रसव के दिन तक अपना आर्थिक एवं पारिवारिक कार्य करती हैं।

प्रसव परिवार एवं पड़ोस की बुजुर्ग महिलाएं कराती हैं। प्रसूता को सोंठ, गुड़ का पानी पिलाते हैं और मड़िया का पेज खाने के लिए जाता है। छठे दिन छठी मनाते हैं। प्रसूता एवं शिशु को स्नान कराते हैं। रिश्तेदारों को भोजन करा,शराब पिलाते हैं।

विवाह

लड़के का उम्र 18 से 20 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 16 से 18 वर्ष उपयुक्त मानते हैं। वर पक्ष वधू पक्ष को अनाज, दाल, तेल, लुगड़ा तथा नगद राशि सूक भरना के रुप में देते हैं।

समाज के बुजुर्ग विवाह की रस्म पूर्ण कराते हैं। विवाह के लिए धन राशि के अभाव में बरोखी बिहाव भी करते हैं, जिसमें तेल, हल्दी की रस्म नहीं होती, वर वधू को कपड़ा देकर अंगूठी पहनाकर घर ले आता है। उढ़रिया, ढूकू तथा चूड़ी पहनाने की प्रथा भी प्रचलित हैं।

मृत्यु

मृतक के शरीर को दफनाते हैं। पुरुषों के धनुष बाण, बांसुरी, सूपा धान तथा पानी से भरी मिट्टी का पात्र कब्र के पास रखते हैं।

महिलाओं के कब्र में मछली पकड़ने की चोरिया, सूपा, धान, कंघी, पानी आदि रखते हैं। तीसरे दिन घर की साफ-सफाई कर तीज नहावन नहाते हैं । दसवें दिन रिश्तेदारों को मृत्यु भोज देते हैं।

पंचायत

परंपरागत सामाजिक पंचायत (जाति पंचायत) पाई जाती हैं। मुखिया का पद वंशानुगत होता है। इस पंचायत में वैवाहिक का निपटारा किया जाता है। जाति के देव- देवताओं की पूजा व्यवस्था. भी किया जाता है।

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