सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा । 

सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh

सवरा जनजाति की उत्पत्ति 

सवरा जनजाति छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड में निवारत एक जनजाति है। 2011 की जनगणना में छत्तीसढ़ में इनकी जनसंख्या 130709 दर्शित है। इनमें पुरुष 64769 तथा स्त्रियाँ 65940 थी। छत्तीसगढ़ में सवरा जनजाति मुख्यतः रायगढ़, महासमुंद, बिलासपुर जिले में निवासत करते हैं।

सवरा जनजाति भारत की एक प्राचीन जाति है, जो कोलारियन समूह के अंतर्गत है। इस जनजाति के लोग अपनी उत्पत्ति रामायण के शबरी से मानते हैं। महाभारत में भी जनजाति के लोग अपनी व जाति का उल्लेख मिलता है। महासमुंद जिले के सवरा अपनी उत्पत्ति रामायण काल के वानरराज सुग्रीव से मानते हैं। एक दंतकथा के अनुसार महादेव मनुष्य को खेती करना सीखाने के लिए एक हल बनाया। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

सवर जाति के पूर्वज को कुल्हाड़ी देकर वहाँ के पेड़ों को काटकर साफ करने को कहा। तत्पश्चात् अपने वाहन नंदी को वहीं छोड़ हल में नंदी के साथ जोतने के लिए दूसरा बैल लेने गये। सवर अपनी कुल्हाड़ी से जंगल के पेड़ों को काटकर खेती के लिए जमीन साफ किया। इस कार्य में उसे बहुत जोरों से भूख लगी। उसने आस-पास खाने की वस्तु खोजा। कुछ न मिलने पर नंदी को मारकर उसका मांस खा लिया। महादेव वापस लौटे, जंगल साफ देखकर सबर पर प्रसन्न होकर मंत्र-तंत्र, जड़ी-बूटी का ज्ञान प्रदान किया। फिर महादेव नंदी को ढूंढने लगे, मरे हुए नंदी को देखकर महादेव क्रोधित होकर सवर को शाप दिया कि तुम व तुम्हारे वंशज सदैव भूखे रहेंगे तब से गरीबी सवरा जनजाति के साथ जुड़ी हुई है।

सवरा जनजाति का रहन-सहन 

सवरा जनजाति अन्य जनजातियों बिंझवार, कंवर, कोंध, खड़िया, आदि के साथ ग्राम में निवास करते हैं। ग्राम में अन्य जातियों जैसे अपरिया, कोलता, नाई, अहीर, धोबी, ब्राह्मण आदि भी रहते हैं । ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

सवरा जनजाति का घर सामान्यतः मिट्टी का बना होता है, जिस पर घासफूस या देशी खपरैल का छप्पर होता है। घर में दो तीन कमरे होते हैं। घर की दीवार मिट्टी की होती है, जिस पर सफेद या पीली मिट्टी की पुताई करते हैं। घर का फर्श मिट्टी का होता है, जिसे गोबर से लीपते हैं।

घरेलू वस्तुओं में अनाज रखने की कोठी, चूल्हा, मिट्टी, एल्युमिनियम, पीतल आदि के कुछ वर्तन, जांता, ढेकी, मूसल, ओढ़ने-बिछाने के कपड़े, कृषि उपकरण, कुल्हाड़ी, मछली पकड़ने के चोरिया आदि होते हैं। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

पुरुष सिर तथा दाड़ी, मूंछ के बाल काटते हैं। महिलाएँ बाल लम्बे रखकर जूड़ा बनाती हैं। महिलाओं के शरीर में गोदना पाया जाता है। हाथ, पैर, गले, नाक, कान में महिलाएँ गिलट, चाँदी, पीतल का गहना पहनती हैं। वस्त्र-विन्यास में पुरुष पंछा, बंडी तथा स्त्रियाँ लुगड़ा पहनती हैं। नव-युवतियाँ अब शरीर के ऊपरी भाग में ब्लाऊज भी पहनती हैं।

इनका मुख्य भोजन कोदो अथवा चावल का पेज, भात, बासी तथा मौसमी साग-भाजी, उड़द, मूंग, अरहर की दाल है। मांसाहार में मुर्गी, बकरा, मछली, हिरण, खरगोश, गिलहरी, विभिन्न पक्षियों के मांस कभी-कभी खाते हैं। पुरुष व स्त्रियाँ महुआ से निर्मित शराब पीते हैं। पुरुष तम्बाखू को पत्ते में लपेटकर चोंगी बनाकर पीते हैं। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

सवरा जनजाति का व्यवसाय 

सवरा जनजाति मुख्यतः कृषि वनोपज संग्रह पर निर्भर है। इनकी कृषि भूमि असिंचित है। इसमें दल, संग धान, कोदो, उड़द, तिल, अरहर आदि बोते हैं। कृषि भूमि असिंचित तथा कम होने के कारण उपज भी कम होती है, जो पूरे वर्ष के लिए अपर्याप्त होती है। अतः अन्य कृषकों के खेत पर मजदूरी करने जाते हैं।

जंगल से जंगली कंदमूल, भाजी एकत्र कर खाते हैं। जंगल से महुआ, डोरी, गुल्ली, चार, तेंदू, हर्रा, लाख, गोंद, तेंदू पत्ता, सरई बीज एकत्र कर बेचते हैं। वर्षा ऋतु में स्वयं के उपयोग के लिये मछली पकड़ते हैं। कभी-कभी खरगोश तथा पक्षियों को भी मारकर खाते हैं। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

छत्तीसगढ़ के सवरा जनजाति में मुख्यतः तीन उपजातियाँ क्रमशः कला पीड़िया (बढ़े सावरा), आड़े सवरा तथा ठाकुर सवरा (छोटे) पाया जाता है। तीनों उपजातियाँ अंतः विवाही समूह है। उपजातियाँ विभिन्न गोत्रों में विभक्त है।

सवरा जनजाति के परम्परा 

इनके प्रमुख गोत्र भैंसा, भोई, बाघ, कुंदला, घनमूला, बींछी, बगुला ( हंसराज), नाग, कलशा, सूरजवंशी, गुरिया, बाहरा, भटिया, हथिया आदि हैं। प्रत्येक गोत्र के टोटम पाये जाते हैं। सवरा जाति पितृवंशीय, पितृसत्तात्मक व पितृ निवास स्थानीय होता है।

इस जनजाति की गर्भवती महिलाएँ प्रसव के दिन तक अपनी आर्थिक व पारिवारिक कार्य करती हैं। गर्भावस्था में कोई विशेष संस्कार नहीं किया जाता। प्रसव परिवार या रिश्तेदारी की बुजुर्ग महिलाओं की देख-रेख में घर पर ही कराते हैं। नवजात शिशु की नाल “सुतई” (सीप) से काटते हैं। प्रसूता को कुलथी की दाल, खम्हार की छाल का काढ़ा, सोंठ, पीपर, गुड़, नारियल खाने के लिए देते हैं। छठे दिन घर की लिपाई-पुताई कर नवजात शिशु तथा प्रसूता को स्नान करा नया कपड़ा पहनाते हैं। रिश्तेदारों, मित्रों को भोजन कराते तथा शराब पिलाते हैं।

विवाह प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है। लड़कों का विवाह उम्र 14-18 वर्ष तथा लड़कियों का 12-16 वर्ष माना जाता है। वर के पिता वधू के पिता को सूक (वधूधन) के रूप में 2 खण्डी चावल, 20 किलो दाल, 5 किलो गुड़, 3 किलो चिवड़ा, 50 रुपया तथा 8 साड़ी देता है। वर पक्ष के लोग बारात लेकर वधू के घर आते हैं। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

विवाह की रस्म जाति का बुजुर्ग व्यक्ति या “गारिया” (बैगा) संपन्न कराता है। इसके अतिरिक्त विनिमय, सेवा विवाह, विधवा को चूड़ी पहनाना (पुनर्विवाह) को भी सामाजिक मान्यता दी जाती है।

मृत्यु होने पर मृतक को जलाते हैं। अस्थि महानदी में विसर्जित करते हैं। तीसरे दिन परिवार के दाढ़ी, मूँछ, सिर के बाल का मुण्डन करा स्नान करते हैं। घर की पुताई करते हैं। मृत्यु भोज तीसरे दिन या 10वें दिन देते हैं। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

सवरा जनजाति में परंपरागत जाति पंचयित पाई जाती है। इसके पदाधिकारी “मुक्कदम” और “दीवान” होते हैं। इनमें मुक्कदम प्रमुख तथा दीवान सहयोगी होता है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, अनैतिक संबंध में विवादों का निपटारा परंपरागत ढंग से सामाजिक भोज एवं जुर्माना लेकर करते हैं। परगना जाति पंचायत में सभापति तथा कोषाध्यक्ष होता है, जो अन्तर्जातीय विवाह, तलाक के अनसुलझे विवादों का निपटारा करते हैं।

सवरा जनजाति के देवी-देवता 

सवरा जनजाति के प्रमुख देवी-देवता, जगन्नाथ भगवान, ठाकुर देव, दुल्हादेव, करिया धुरूवा, माता देवाला, घटवालिन, शबर शबरी, साहड़ा देव, भैंसासुर, समलाई मंगला, खड़ापाठ, परूआपाठ आदि हैं। इसके अतिरिक्त हिंदू देवी-देवता, नदी, पर्वत, धरती, सूरज, चांद की भी पूजा करते हैं। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

इनके प्रमुख त्योहार रथयात्रा, हरियाली, नागपंचमी, जन्माष्टमी, नवाखानी, दशहरा, दिवाली, होली आदि हैं। देवी-देवता की पूजा में मुर्गी, बकरा की बलि भी देते हैं भूत-प्रेत, जादू-टोना में काफी विश्वास रखते हैं।

सवरा जनजाति के लोग विवाह के अवसर पर नाचते गाते हैं। होली में फाग गाते हैं, रहस नाचते हैं। भजन, रामधुनी, रामायण आदि भी गाते हैं। नवयुवक करमागीत, ददरिया गीत भी कभी-कभी गाते हैं। ( सवरा जनजाति छत्तीसगढ़ Savra Janjati Chhattisgarh savra tribe chhattisgarh )

सवरा जनजाति में साक्षरता 2011 की जनगणना में 65.0 प्रतिशत दर्शित है। पुरुषों में साक्षरता 76.4 प्रतिशत तथा स्त्रियों में 53.9 प्रतिशत थी।

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source : Internet

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