नगेसिया जनजाति छत्तीसगढ़ | Nagesiya Janjati Chhattisgarh

नगेसिया जनजाति छत्तीसगढ़ Nagesiya Janjati Chhattisgarh

नगेसिया छत्तीसगढ़ की एक जनजाति है। ये लोग मुख्यत: रायगढ़ जिले की जशपुर तहसील में रहते है । वे अपने को किसान भी कहते है

गेसिया जनजाति कीत्पत्ति

नगेसिया के उत्पत्ति के संबंध में ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है। किवदंती के अनुसार किसी ने एक नवजात शिशु को जंगल में फेक दिया था. सूर्य की तेज गर्मी से इस शिशु की एक नाग अपना फन/ छत्र की भांति इसके ऊपर फैलाकर रहा था।

मुण्डा जनजाति के कुछ लोग उधर से गुजरे, उन्होंने शिशु को अपने घर ले आये। शिशु का पालन पोषण किया। बाद में यही बालक मुण्डा नजाति का राजा हुआ। नाग द्वारा रक्षित होने के कारण इनके वंशज नगेशिया कहलायें।

कुछ विद्वान नागशिया शब्द का व्युत्पति नाग+बसिया अर्थात नागपुर (छोटा नागपुर) क्षेत्र में बसने वाले अर्थात नागबसिया कहते थे, जो कालांतर में परिवर्तित होकर नगेसिया हो गया। विद्वानों के अनुसार यह जनजाति कोलारियन समूह (मुण्डा समूह) से निकली एक जनजाति है।

गेसिया जनजाति की जनसंख्या

इनकी आबादी झारखंड में भी पाई जाती है। 2011 की जनगणना अनुसार छत्तीसगढ़ में इनकी जनसंख्या 114532 दर्शित हैं। इनमें पुरुष 57536 तथा स्त्रियां 56996 थी। राज्य में नगेसिया जनजाति मुख्यतः सरगुजा, बलरामपुर, जशपुर, रायगढ़ जिले में पाये जाते हैं।

साक्षरता:-2011 की जनगणना में साक्षरता 51.4 प्रतिशत दर्शित हैं। पुरुषों में 61.5 प्रतिशत व महिलाओं में साक्षरता 41.2 प्रतशित थी।

गेसिया जनजाति के तीन समूह

नगेसिया जनजाति पितृसत्तात्मक, पितृवंशीय, पितृ निवास स्थानीय परंपरा को मानती है. इसके तीन उपजातियां क्रमशः सेन्दुरिया, तेलहा, और धुरिया पायी जाती हैं. कहा जाता है कि प्रारंभ में इनकी उपजाति नहीं थी. इनके पूर्वज ने तीन विवाह किये ।

प्रथम पत्नी के माथे पर सिन्दुर लगाकार विवाह किया, इससे उत्पन्न संतान सेन्दुरिया, कहलायें।

दूसरी पत्नी से सिर्फ सगाई किया और उसके मांग पर तेल लगाया, अत: इनकी संतान तेलिया या तेलहा कहलायी।

तीसरी पत्नी के माथे पर धूल की टाका लगाकार पत्नी का दर्जा दिया, इससे उत्पन्न संतान धुरिया कहलायें। इनमें सिन्दुरिया उच्च, तेलहा मध्यम, धुरिया निम्न माने जाते हैं । उपजाति गोत्रमें विभक्त है जो बहिर्विवाही है।

गोत्र टोटम पर आधारित हैं। विवाह के अवसर पर वधू के माथे को सजाने के लिये वे लोग अलग सामग्री का उपयोग करते है। तेलता तथा धुरिया लोगों में विवाह होते है, किन्तु सेंदुरिया लोगों के साथ उनके विवाह नहीं होते,

क्योंकि सेन्दुरिया लोग इन दोनों से अपने आपको उंचा समझते है। तेलहा तथा धुरिया महिलायें, कांच की चूड़ियां तथा कुहनी के उपर बाजूबंद नहीं पहनती है। तेलहा महिलायें नाक में नथुनी नहीं पहनती और न ही अपने शरीर पर गोदना गुदवाती है, जबकि सेन्दुरिया महिलायें नथुनी पहनती और गोदना गुदवाती है।

गेसिया जनजातियों के गांव घर

नगेसिया जनजाति अन्य जनजातियों यथा उरांव, मुण्डा, कंवर, मझवार आदि के साथ गांव में निवास करते हैं. इनका घर प्रायः मिट्टी का बना होता है। घर की दीवार सफेद मिट्टी से पुताई, फर्श मिट्टी का होता है। जिसे गोबर से लीपते हैं।

घर में सामान्यतः दो तीन कमरे होते हैं। सामने परछी होता है। कमरे में देव स्थान तथा अनाज रखने की कोठी पाईजाती है। घरेलु वस्तुओं में चारपाई, ओढ़ने-बिछाने के कपड़े, रसोई के बर्तन, चक्की, मूसल, कृषि उपकरण, मछली पकड़ने के जाल, कुल्हाडी आदि होता है। पशुओं के लिये अलग से स्थान होता है. महिलाएं सुबह उठकर घर की साफ-सफाई करती है।

गेसिया जनजातियों में  पुरु महिलाएं

बबूल, हरा, करंज आदि के दातौन से दांत साफ कर प्रतिदिन स्नान करते हैं। बाल को पुरुष कटाते हैं। महिलाएं बालों को गूंथकर चोटी जूड़ा बाती है. बाल धोने के लिए मिट्टी अथवा साबुन का उपयोग करते हैं. महिलाएं गहनों का शौकीन होती है ।

पैर की उंगली में बिछिया, पैर की पैरपट्टी, कमर के करधन, हाथ में ऐंठी, बाहुओं मे पहुंची, गले में चैन, हमेल, कान में खिनवा, झुमका नाक में फूली पहनती हैं जो सामान्यत: गिलट या नकली चांदी के होते हैं।

वस्त्र विन्यास में पुरुष पंछा, बंडी, धोती, कुरता, महिलाएं लुगड़ा, पोलका पहनती है. इनका मुख्य भोजन कोदो, गोंदली, चावल की भात, पेज उड़द, अरहर, कुलथी की दाल, मौसमी साग भांजी है। मछली, मुर्गी, बकरे का मांस कभी कभी खातेहैं। त्यौहार, उत्सव आदि में चावल की शराब जिसे हंडिया कहते हैं, बनाकर पीते हैं।

गेसिया जनजातियों का आर्थिक जीवन

इस जनजाति का आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि, जंगली उपज संग्रह, मजदूरी पर आश्रित है। इनके खेती की प्रमुख फसल कोदो, गोंदली, धान, मक्का, उड़द, मूंग, अरहर, कुलथी, तिल आदि हैं ।

जमीन असिंचित होने के कारण उपज कम होती है। जंगल में महुआ, तेंदूपत्त, हरा, लाख, धवईफूल,रेशम कोसा एकत्र कर बेचते हुै। भूमिहीन व छोटे कृषक अन्य आदिावसी अथवा गैर आदिवासियों के खेतों मेंमजदूरी करने जाते हैं।

पहले छोटे-छोटे पशु पत्रियों का शिकार भी करते थे। अब शिकार पर प्रतिबंध होने से शिकार नहीं करते हैं। वर्षा ऋतु में मछली पकड़ते हैं तथा स्वयं भोजन में उपयोग करते हैं.

गेसिया जनजातियों में संस्कार

शिशु जन्म को भगवान की दान मानते हैं। गर्भास्थामें कोई संस्कार नहीं होता है । इस जनजाति की गर्भवती महिलाएं प्रसव स्थानीय दाई की मदद से घर पर ही करते हैं। बच्चे की नाल ब्लेड से काटकर घर में गड्ढा खोदकर गड़ाते हैं।

प्रसूता को कुलथी, छिंद की जड़, सोंटष गुड़, पीपल, सरई छाल का काढ़ा पिलाते हैं। छठे दिन छठी मनाते हैं। नवजात शिशु व प्रसूता को नहलाकर सूरज तथा घर के देवी-देवता का प्रणाम कराते हैं। रिश्तेदारों को भोजन कराते हैं तथा बीड़ी, तम्बाखू, हंडिया पिलाते हैं।

विवाह की उम्र लड़कों में 14-18 व लड़कियों में 12-16पाई जाती हैं। शिक्षण के कारण अब विवाह उम्र में कुछ वृद्धि हुई है। विवाह का प्रस्ताव वर पक्ष से आता है। वर के पिता वधू के पिता को अनाज दाल, तेल, तथा नगद कुछ रकम देता है, इसे बुन्दा कहा जाता है।

विवाह चारण चरण क्रमश: मंगनी, फलदान, विवाह और गौना में पूरा होता है. विवाह संस्कार जाति प्रमुख या बुजुर्ग व्यक्ति सम्पन्न कराते हैं। इनमें विनिमय, सेवा विवाह आदि का प्रचलन भी है. सहपलायन और घुसपैठ को सामाजिक पंचायत में जुर्माना लेकर विवाह को सामाजिक मान्यता प्रदान की जाती हैं।

मृत्यु होने पर मृतक को जलाते हैं। अस्थि को सोन, महानदी या आर्थिक स्थिति अच्छी होने पर गंगा में प्रवाहित करने ले जाते हैं। तीसरे दिन स्नान करने के बाद देवार (मंत्र जादू के जानकार) के मार्गदर्शन में पूर्वजों की पूजा करते हैं। 10वें दिन मृत्यु भोज देते हैं. पितृपक्ष में मृतक के नाम पानी से तर्पण कर कुछ दाल भात मिलाकर रख देते हैं।

परंपरागत जाति पंचायत:-जाति पंचायत के प्रमुख मुखिया कहलाते हैं। इस पंचायत में अनैतिक संबंध, विवाह, तलाक के झगड़े का पिटारा व जाति के देवी देवता की पूजा व्यवस्था करते हैं।

प्रमुख देवी-देवता:- इस जनजाति के प्रमुख देवी देवता गौरेया देव, शिकारी देव, सदना माता, धरती माता, अन्नकुमारी आदि हैं। इसके अतिरिक्त हिंदू देवी-देवता सूरज, चांद, नदी, पहाड़, वृक्ष, जंगली जानवर, नाग आदि की भी पूजा करते हैं।

पूजा के समय मुर्गा, बकरा की बलि दी जाती हैं। इनके प्रमुख त्यौहार दीवाली, फुगान, सरहुल, नवाखानी, पितर, पोला, दशहरा आदि हैं। भूत-प्रेत, जादू टोना, पर काफी विश्वास करते हैं। जादू मंत्र का जानकार व्यक्ति देवार कहलाता हैं।

नृत्य गीत:-इस जनजाति के युवक-युवतियां सरना पूजा में सरहुल नृत्य, करमा पूजा में कर्मा नृत्य, अखरा नृत्य, विवाह के समय बिहाव नृत्य करते हैं। लोकगीतों में सरहुल गीत, बिहाव गीत, भजन मुख्य हैं।

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