बस्तर के मेले मंडई | Bastar Ke Mele Mandai | Fairs of Bastar

बस्तर के मेले मंडई Bastar Ke Mele Mandai Fairs of Bastar

फसल की कटाई के बाद बस्तर अंचल में मेले और मंडईयों का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है. यहां मड़ई को मंडई कहा जाता है. बस्तर में आयोजित होने वाले मंडई के मूल में कोई न कोई अत: कथा, संवेदना, लोक-परंपरा निहित है, यही कारण है कि इनके सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक स्वरूप में कोई बदलाव आज तक नहीं आया. ।

मेला शब्द मिलन शब्द से बना प्रतीत होता है.मेला शब्द में एक रोमांच है. लगता, बैठता और भरता भी है. मेला ताजा और बासी भी हो जाता है और उठ भी जाता है. गांव-परगना, अंचल की अधिष्ठात्री देवी-देवताओं की पूजा का  पर्व भी होता है.।

बस्तर के किसी गांव की प्रस्तावित मंडई-मेलों की तिथी के निर्धारण में, गावं के पुजारी का निर्णय सर्वमान्य होता है. ग्राम कोटवार के द्वारा साप्ताहिक बाजार में इसकी विधिवत सार्वजनिक आंचलिक देवी-देवताओं के साथ पुजारी और सिरहा को भी विधिवत आमंत्रण भेजा जाता है. ।

मंडई के आयोजन के लिए ग्रामवासी अपनी हैसियत के अनुसार धनराशि, चावल-दाल इकट्ठा कर लेते है. दूरस्थ अलचों में बसने वाले ग्रामीण वर्ष में एक बार आयोजित होने वाले इस मेले में  अपने सगे संबंधियों से मिलकर उनके हाल-चाल, सुख-दुख जानने हेतु उत्सुक होते है.।

शादी का समाचार सिर पर हल्दी डालकर दिया जाता है. मेले के अवसर पर ग्रामीण अपने श्रृंगार के पति सजग दिखाई देती है. सिर के बालों को पारंपरिक तरीको से सजाती है, जिसे बाकटा खोसा, टेडगा खोसा, ढालेया खोसा अथवा लदेया खोसा कहा जाता है.।

इसी तरह कांटा, किलिप तथा फूलों से अपने बालों को संवारत= सजाती है. कानों में तड़की, करनफूल, नाम में फूली, गले में नाहुन, चापसरी, ख्रिपरी माला, धान खेड़ माला, मूंगा माला, हाथों और बांह में खाडू, अंयठी, ककनी, बाहटा, पावं में पयंड़ी, ढलवें पैसे और चांदीको पट्टी तथा हाथ अंगुलियों में मुंदी की शोभ देखते ही बनती है. ।

उत्सवों में युवतियां सामान्यतया रंग-बिरंगी साड़िया पहनती है, किन्तु सौभाग्यशालिनी व सम्पन्न युवतियाँ बस्तर की सबसे बहुमूल्य साड़ी ठेकरा पाटा पहनती हैं, कंधों पर खूबसूरत तुवाल रखती है.मेलों में विभिन्न तरह के देशी झूलों देखा जा सकता है ।

मिठाई, लाई-चना, बीड़ा पान, लाडु, केला, चिवड़ा, गुड़िया खाजा,सरसतिया बोबो आदि पारम्परिक मिठाई-खाजा मेलों सहज ही उपलब्ध रहता मेलों में क्षेत्रीय व्यापारी भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते है. युवतियों को छापे वाली ब्लाक मेंहदी और गुदना अपनी ओर आकर्षित करती है. ।

रात ग्रामीणों के लिए रात्रि जागरण की रात होती है. इन अवसरों पर होने वाले नाट, नाटक, स्वांग, चइत-परब एवं अन्य उपलब्ध मनोरंजन साधनों में लोग खो जाते हे. मेला जहां एक ओर देवी-देवताओं के आगमन से प्रारंभ होता है तो दूसरी विदाई, पूजन-बलि के साथ होती है. ।

लोग अपने और अपने  परिजनों के लिए भरपूर खरीददारी करते हुए लौट जाते चर्चित मेलों में मावली मेला (नारायणपुर), कोंडागांव मेला, फागुन मेला (दंतेवाड़ा), लिंगेश्वरी मेला (आलोर), रामाराम मेला (सुकमा), ईलमिड़ी, भंगाराम मेला (केशकाल) भद्रकाली मेला, चपका मेला, कांकेर मेला, धौड़ाई मेला, बस्तर मेला करपावंड मेला, बकावंड मेला, गुमडा (छत्तीसगढ़-ओडिसा सीमा), कचनार, मड़पाल, केसरपाल मेला, घोटपाल मेला, समलूर, बयानार, मर्दापाल, धनोरा, मर्दापाल, बारसूर मेला, चित्रकोट मेला, गुप्तेश्वर मेला (ओड़िसा), सकलनारायण मेला (भोपालपटनम)तुलार (बारसूर-दंतेवाड़ा) चिकटराज, जैतालूर (बीजापुर) आदि के अलावा आंचलिक मेला-मंडई में तीरथगढ़, मावली पदर, चिंगीतरई, घोटिया, देवड़ा, मूली, जैतगीरी, गारेंगा, जैबेल, छोटेडोंगर, बड़ेडोंगर, अंतागढ़, केशकाल, फरसगांव, विश्रामपुरी, दुर्गकोंदल, पखान्जूर का नरनारायण मेला, भानुप्रतापपुर, नरहरपुर, आसुलखार, कोरर, संबलपुर, गोविंदपुर, चारामा, हर्राडुला, सेलेगांव, जैतलुर आदि मेलों में आंचलिक जीवन की गहरी झलक मिलती है।

राजशाही के जमाने में मेलों के बहाने पूरी रियासत एकत्रित हुआ करती थी.बस्तर के ऐतिहासिक महत्व के पारम्परिक मेला मंडईयों ने महोत्सव का स्वरूप धारण कर लिया, जिनमें बारसूर महोत्सव, चित्रकोट महोत्सव, गढ़िया महोत्सव आदि प्रमुख महोत्सव हैं. इन महोत्सव स्थलों में छत्तीसगढ़ शासन की ओर से मेलों के स्वरूप में और भी अधिक भव्यता प्रदान की जाती है.

फागुन मंडई-
दंतेवाड़ा दंतेश्वरी की प्राचीन मंदिर की मान्यता एक शक्तिपीठ के रूप में दूर-दूर तक है। . यहां शखिनी-डंकिनी नदी के संगम तट पर अंचल की आराध्या देवी मां दंतेश्वरी माता के सम्मान में फागुन माह के शुक्ल पक्ष छठी से लेकर फागुन की समाप्ति तक मेला दक्षिण बस्तर का सबसे बड़ा मेला है. इस मेले में मांई दंतेश्वरी तथा भैरम के अलावा सैकड़ों आंचलिक देवी-देवताओं का संगम तट पर समागम होता है, जिनकी पारम्परिक रूप से पूजा-आराधना, शोभयात्रा, पालकी दर्शन की जाती है.

फागुन मेला प्रमुख आकर्षण डंडार नृत्य, विभिन्न स्वांग नृत्य, शिकार नृत्य, (लमाहामार, गंवरमार,चितलमार आदि) आंवलामार की रोमांचक दृश्य दर्शकों का खासा मनोरंजन करती है. मेले के अंतिम पड़ाव में सती की याद में होलिका दहन की जाती है तथा होली के दूसरे दिन रंगभंग उत्सव मनाया जाता है, इस रस्म में एक दूसरे पर मिट्टी फेंक कर होली खेली जाती है.।

‘मावली मेला-
बस्तर अंचल में मावली देवी मंदिर प्रमुख रूप से दंतेवाड़ा, जगदलपुर, नारायणपुर में मावली के नाम से विशाल मेला का आयोजन माघ महिने में शिवरात्रि के पूर्व सप्तदिवसीय होता है. मावली के नाम से कई गाँव भी बसे हैं मावली भाटा, मावली पदर, मावली गुड़ा आदि । 

लिंगेश्वरी मेला-
आलोर-वन स्थली ग्राम आलोर में लिंगेश्वरी मेले में शिव भक्ति के विभिन्न रूपों की स्थापना चौदहवीं शताब्दि से की गई है. यहां कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गुफा के अंदर विशेष पूजा-आराधना की जाती है,यह गुफा वर्ष में एक बार ही खोली जाती है.

रामाराम मेला
सुकमा जिला मुख्यालय से 9 किलोमीटर की दूरी पर फरवरी माह में आयोजित होने वाले तीन दिनों तक मेला को रामाराम मेला के रूप में जाना जाता है. पहाड़ की तलहटी पर चिटपिटिन देवी का मंदिर सुकमा जमींदारी की आराध्या देवी हैं मेले आयोजन प्रारंभ से अब तक सुकमा जमींदारी से जुड़े देव परिवार के सदस्य ही करते चले आ रहे है.। 

भद्रकाली मेला-
महाशिवरात्रि के दिन इंद्रावती और गोदावरी नदी के संगम तट पर भद्रकाली (भोपालपट्नम) का मेला भरता है. संगम तट पर भद्रकाली का एक छोटा सा मंदिर स्थित है. जब चालुक्य वंश के शासक बस्तर में अपने राज्य की स्थापना की चाह लिए पहली बार बस्तर में प्रविष्ट हुए तो भद्रकाली में मंदिर बनाकर कर देवी दंतेश्वरी की पूजा आराधना की थी. देवी से वरदान के रूप में प्राप्त दिव्य तलवार के बल
पर उन्होंने बस्तर में अपना राज्य स्थापित किया था.

संकलनारायण मेला-
भोपालपटनम से बारह किलोमीटर दूर पोड़सपल्ली की पर्वत श्रृंखला स्थित तीन किलोमीटर मार्ग तय करके सकलनारायण गुफा में प्रतिवर्ष चैत्र माह में सप्तदिवसीय मेला होता है. गुफा ईश्वरीय प्रतिमाओं के दर्शन होता है. मेले- मंडई अगहन महिने में पूर्णिमा की तिथि से केशरपाल मंडई से प्रारंभ होती है. तुलार गुफा में वर्षे दो बार, महाशिवरात्रि तथा शरदपूर्णिमा के समय तीर्थ मेला भरता है,

शिव-पार्वती जी की प्रतिमा की पूजा की जाती है. चिंगीतरई, समलूर, चित्रकोट, गुप्तेश्वर, चपका आदि स्थानों पर महाशिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है. कोण्डागांव का मेला माघ महिने में लगता है. माघ पूर्णिमा पर- छेरकीन देवी तथा गंगादोई आदि देवी-देवताओं के सम्मान में बस्तर मंडई भरती है. मेले-मड़ईयों में देशी विदेशी पर्यटकों, व्यापारियों, अध्येताओं, छायाकारों, रचनाकारों, फिल्मकारों आदि की ओर आकर्षित करने की ताकत रखती है।

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