छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल | Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel

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विद्यार्थीओ आज हम पढेगेंगे Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of Chhattisgarh यह जनजाति परीक्षा की दृस्टि से महत्वपूर्ण है तो इस जनजाति को आपको पढ़ना चाहिए ।

Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel  छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल
Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल

छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल  Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel |

प्रकृति की स्वच्छन्द गोद में भीड़-भाड़ से दूर गिरि कंदराओं, घने जंगलो के आसपास निवास करने वाली गोंड जनजाति अपनी कम से कम आवश्यकताओं के साथ प्राकृतिक जीवन यापन करती है। लोक संगीत या आदिम संगीत खेल मनोरंजन के साधन हैं। इनके खेलों में विशेष सामग्री की आवश्यकात नहीं होती है।

कंकड़, पत्थर, धूल, लकड़ी, पत्ता आदि साधनों से ही केल जम जाता. है। खेल के लिये खास मैदन या चबूतरा नहीं घर का छोटा आँगन, गली-खोरी आदि कहीं भी खेल खेले जाते हैं। हार-जीत का निर्णय खिलाड़ी स्वयं कर लेते है। खेल में वेश-भूषा का कोई महत्व नहीं है और न ही खिलाड़ियों को शिक्षण-प्रशिक्षण देने का आवश्यकता होती है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

सब कुछ परंपरानुसार होता है। कोई भी नवसिखा खिलाड़ी एक बार खेल देखकर उसे खेल सकता है। इसी तरह खिलाड़िों की कोई संख्या निश्चित नहीं होती है। नियम इतने सादे सरल और कम होते हैं कि उनका पालन अपने – आप हो जाता है। खेलों में व्यायाम के साथ-साथ मनोरंजन भी खूब होता है। आपस में झगड़े-झांसे भी नहीं होते है। खेलों में समय की कोई पाबंदी नहीं होती है।

ढेरी

जब जी में जाती है, तो दांव देने वाला वही खिलाड़ी फिर से अड्डे पर खड़े होकर ढेरी में चोट मारकर गिराने का भरसक प्रयास करता है। ढेरी गिरते ही खेलने वाले सभी खिलाड़ी ताबड़-तोड़ भागकर गेंद की मार से बचने की कोशिश करते हैं । ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

यही क्रम खेल के पूरे समय तक चलता है। बीस खपरी (ढेरी) पर चोट मारते समय यदि खेलने वाले किसी खिलाड़ी ने गेंद जमीन पर गिरने से पहले गेंद रोक ली (कैंच कर ली तो वह खिलाड़ी खेल से बाहर कर दिया जाता है। खेल का यह क्रम चलता है, खेलने वाली टोली के सभी खिलाड़ी खेल से बाहर हो तक चलता है तब दांव देने वाली टोली को खेलने का अवसर मिलता है इस तरह पारियाँ बदलती रहती हैं।

डंडा चूमना

डंडा चूमना वृक्षों और डालियों का खेल है। इस खेल • में वही लड़का भाग लेता है, जो अत्यंत फुर्ती के साथ झाड़ों में चढ़ और उतर सके। वर्षाकाल के कुछ दिनों को छोड़कर यह खेल कभी भी खेला जाता है। लड़कियाँ इस खेल में भाग नहीं लेती है। ज्यादातर इस खेल के लिये इमली या शीशम के वृक्ष चुने जाते है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

क्योंकि इन वृक्षों की डगालें अत्यंत मजबूत और लचीली होती है। गाँव के लड़के एकत्र हो जंगल को कूच कर झाड़ के नीचे पहुँचकर सर्वानुमति से अगुवा चुन लिया जाता है। अब मुखिया दो फूट लंबा एक डंडा लेकर झाड़ के नीचे से दूर फेंकता है। इसके पूर्व दांव देने वाले लड़के का निर्धारण किया जाता है। खेलने वाले सभी लड़के एक गोल घेरे मे खड़े होते हैं। अगुवा खिलाड़ी लड़का सभी लड़कों की गिनती निम्मनानुसार शब्दों के व्दारा करता है ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

         आंच कांच पूरे पांच, नदी किनारे काला सांप, लाओ लाठी मारो सांप।

अगुवा लड़का गोले मे खड़े हुये सभी लड़कों की छाती में एक बाद एक उंगली रखकर इन शब्दों को लय ताल से बोलता है। जिस लड़के पर साँप शब्द का अंत होता है, वह अलग कर शब्दों का उच्चारण फिर प्रारंभ होता है । इस तरह बारी-बारी से सभी लड़के अलग होते जाते है तथा जो लड़का अंत में शेष बचता है, वह दांव देने वाला होता है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

वह मुखिया व्दारा दूर फेंके गये डंडे को उठाने के लिये फुर्ती से दौड़ लगाता है। सभी खिलाड़ी वृक्ष के ऊपर उसकी डालियों में चढ़ जाते हैं और दांव देने वाला खिलाड़ी लड़का डंडा उठाकर वृक्ष के नीचे आ डंडे को चूमकर रख वृक्ष पर चढ़ता है और यह प्रयास करता है कि वह चढ़े हुये लड़को में से किसी को छू ले । इधर पूर्व से चढ़े हुये लड़के यह प्रयास करते हैं कि वे दांव देने वाले लड़के से बचकर किसी तरह नीचे रखे डंडे छू ले । ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

इसलिये वे झाड़ से नीचे रखे हुये डंडे को बचाने का प्रयास करता है। यदि अपने चतुराई से वृक्ष पर चढ़े हुए किसी लड़के ने डंडा छू कब्जा मान वह डंडे को ऊपर चढ़े हुये अपने साथियों को देने का भरपूर प्रयास करता है। जितने लड़के डंडा छू लेते है, वे मीर (विजयी) माने जाते है जो नहीं छू पाते और उनें दांव देने वाला लड़का नीचे छू लेता है, तो उसे दांव देना पड़ता है। सभी मीर हो दांव देने वाले लड़के फिर से दांव देना पड़ता है अर्थात फिर से डंडा फेंका जाता है, दांव देने वाला फिर उठाकर लाता है और खेल का पूरा क्रम पुर्ववत चलता है।

फुर्र-फुर्र

मूल रूप से लड़कियों का खेल है। जब भी मौका मिला, लड़कियाँ इकट्ठी हुई, घर का आँगन ही खेल का स्थल, खासकर वह आँगन जिसमें पिरमिटिया (पारें) बनी हुई होती है। गाँव के कई आँगनों में यह खेल चलता है। आँगन मे लड़कियाँ गोल घेरे में सामने वाली लड़की से एक-दूसरे की एड़ी और पंजे सट कर मिल जायें इस तरह गोल घेरे में एक दूसरे के साथ मिल आकार ऐसा बनता हैं, मानो फूल खिला हो।

अब सभी लड़कियाँ एक स्वर में कहती है- दादर के महुवा, गिर गये पतेरा, इतना कहकर बजाती हैं और दूसरी बार अपने दोनों हाथों को जमीन पर रखकर सरकती है। इस प्रकार तीन क्रियायें एक साथ चलती हैं, यथा दादर के महुवा….कहना, ताली बजाना और जमीन पर सरकना। मुखिया लड़की बीच में अचानक फुर्र फुर्र कहते ही सब लड़कियाँ आँगन की पिरमिटिया या ओंटा मे चढ़ जाती हैं, जो लड़की इस दौड़ में नहीं चढ़ पाती है- वह दांव देने वाली लड़की कहलाती है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

सब लड़कियाँ उससे बचती है और वह सबको छूने का प्रयास करती है। जो लड़की पिरमिटिया या ओंटा पर चढ़ी रहती है, उसे छूने पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। जो लड़की नीचे उतरती है और उसे दांव देने इस तरहवाली लड़की छू लेती है, तो उसे दांव देना पड़ता है।

कूकी की हांक

गोंड जनजाति के गाँवों में छोटे बच्चों के व्दारा कूकी की हांक का एक मनोरंजन खेल खेला जाता है। एक लड़का दांव देने वाला होता है और मुखिय सभी खेलने वाले लड़कों को गोल घेरे में खड़ा कर प्रत्येक लड़के की छाती में बारी-बारी से हाथ की एक उंगली रखकर निम्नानुसार उच्चारण करता है-

ताना रे हरी नाना रे साजन ताना रे हरी नाना

जिस लड़के पर अंतिम नाना शब्द गिरता है, उसे घेरे से अलग कर मीर समझा जाता है इस प्रकार समस्त लड़कों में से जो अन्त में बच दांव देने वाला होता है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

किसी एक स्थान को थान अर्थात गोल निश्चित कर दांव देने वाला लड़का उसमें आँख बंद करके खड़े होते ही सब लड़के यहाँ-वहाँ छुपने के लिये भाग जाते है। तब मुखिया अपने छुपे हुए स्थान से कूकी की हांक लगाता हैं। कूकी की हांक सुनकर दांव देने वाला लड़का छुपे हुये लड़को को ढूँढ उन्हें छूने का प्रयास करता है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

दूसरी ओर छुपे हुए लड़के दांव देने वाले लड़के से बचकर थान छू लेते हैं, वे मीर समझे जाते हैं छू जाने वाले लड़के को दांव छू • देना पड़ता है। दांव देने वाला लड़का थान की रक्षा करते हुए अपने दुश्मन लड़के को छूता है। इस खेल का मुख्य उद्देश्य थान की रक्षा करना और थान को छूना होता है।

लुखरी दांव

लुखरी दांव आदिवासी गाँवों में बूढ़ी औरतों और छोटे-छोटे बच्चों व्दारा खेला जाता है। प्रायः रात्रिकालीन जब कार्यों से फुर्सत मिलती है तो छोटे-छोटे बच्चे बच्चियाँ का दल अपनी नानी दादी के साथ आँगन में जमा हो जाता है। नानी दादी किसी एक बच्ची को दांव देने वाली लुखरी (लोमड़ी) बनाती है। बाद बाकी सभी बच्चे आँगन में गोल घेरे में बैठ जाते है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

अब नानी या दादी कोई ऐसी बात या चुटकुला बोलती हैं, जिससे सभी जोर से ठहाका लगाकर हँसते है। इसके साथ ही सभी बचेचे अपने एक घुटना मोड़कर उस पर दोनों हाथों इस तरह को रखते है, कि घुटने पर कटोरिनुमा आकार बन जाता है। अब नानी या दादी एक कंकड़ी उठाती है और उसे सभी खिलाड़ी बच्चों के घुटनों पर बनी कटोरी में रखने का उपक्रम करती हैं। इसी समय यह उच्चारण करती है

एक-दो-तीन खाओ बीन-बीन

यह कहते हुए किसी एक की कटोरी में कंकड़ी को छुपा देती है। जैसे ही उच्चारण बंद होता है, सभी बच्चे एक स्वर में बोलते है – आ लुखरी बेर खा जात। यह सुनते ही दांव देने वाली लड़की छुपी हुई गोटी (कंकड़ी) को ढूँढने के लिये सबके बीच मे आती है। दांव देने वाली लड़की सूझबूझ एवं सतर्कता के साथ प्रत्येक खिलाड़ी लड़की के सिर पर हाथ रखती हुई इसमें गोटी- इसमें गोटी कहती है।

सभी खिलाड़ी लड़कियाँ अपे घुटने पर बनी हाथ की कटोरी में गोटी छिपाने का अभिनय करती है, जिससे दांव देने वाली लड़की को यह शंका हो कि अमुक के पास गोटी छिपी है। दांव देने वाली लड़की को जब यह विश्वास हो जाता है कि अमुक लड़की की मुट्ठी मे गोटी छिपी है तो वह उस लड़की के सिर पर हाथ रखकर पकड़ लुखरी कहती है, उसे अपनी मुट्ठी खोलना पड़ता है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

यदि उसकी मुट्ठी मे गोटी निकल गई, तब उसे खेल से निकलकर लुखरी बनना पड़ता है और लुखरी बनी हुई लड़की खेल में उसका स्थान लेती है। यदि मुट्ठी में गोटी नहीं निकली तो दांव देने वाली लड़की पर एक तरैया चढ़ जाती है और खेल पूर्ववत आरंभ होता है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

इस तरह एक लड़की पर सात तरैया चढ़ जाने पर उसे बोदा (मूर्ख) बन अपनी एक टांग अंगोछे से बाँधकर लंगड़ाती हुई दौड़-दौड़ कर अन्य खिलाड़ी लड़कियों को छूती है और सब लड़कियाँ यहाँ-वहाँ भागती है। चारों ओर हँसी के फव्वारे फूटते हैं। अपूर्व मनोरंजन के साथ यह खेल चलता है। ( Chhattisgarh ke Gond Janjati ke Khel | छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के खेल Games of Gond tribe of छत्तीसगढ़ )

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