कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh

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कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh
कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे  कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

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कंवर जनजाति का उत्पत्ति 

कंवर छत्तीसगढ़ की एक मुख्य जनजाति है। 2011 की जनगणना अनुसार छत्तीसगढ़ में कंवर जनजाति की कुल जनसंख्या 887477 दर्शित है। इनमें पुरुष |44124 तथा स्त्रियाँ 446235 थी। ये मुख्यतः बिलासपुर, रायगढ़, कोरिया, सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर, रायपुर, महासमुंद, गरियाबंद एवं राजनांदगांव जिले में पाई जाती है। बिलासपुर संभाग में “कंबर जनजाति” की बसाहट सर्वाधिक है।  ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

कंवर जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है। किवदतियों के आधार पर अपनी उत्पत्ति महाभारत के कौरववंशी राजा धृतराष्ट्र से बताते हैं। कुरुक्षेत्र में महासंग्राम के बाद शेष बचे कौरव स्वयं को बचाने के प्रयास में इधर-उधर जंगलों में प्राणों की रक्षा हेतु जा छिपे और जंगलों में ही अपना जीवन यापन करने लगे। ये कौरव कालांतर में “कंबर” कहलाये। इस प्रकार ये स्वयं को कुरुवंशी एवं चंद्रवंशी कहते हैं। कंवर की एक उपजाति तंवर जो छत्तरी भी कहलाते हैं, बिलासपुर जिले में इनकी 7 जमीदारियाँ क्रमशः कोरबा, छुरी, चांपा, लाफा, उपरोड़ा, मतिन और पेंड्रा थी।

कंवर जनजाति रहन-सहन 

इस जनजाति के लोग गॉड, उरांव, मझवार, बिंझवार, भैना, मुण्डा, नगेसिया आदि अन्य जनजातियों के साथ ग्राम में निवास करते हैं। इनके मकान मिट्टी के बने होते हैं, जिस पर देशी खपरैल या घास फूस का छप्पर होता है घर में सामान्यतः चार-पांच कमरे होते हैं, जिसमें एक कमरा रसोई व पूजा के लिये निर्धारित होता है। सामने परछी होती है। रसोई से सटे हुए कमरे की दीवारों में “खोडिया” (कोठी) रहती है जिसमें धान का भण्डारण किया जाता है। दीवारों पर सफेद या पीली मिट्टी की पुताई की जाती है। जानवरों के लिए अलग से स्थान (कोठा) होता है।

घर में मिट्टी, कांसा, पीतल, ऐल्युमिनियम के बर्तन, जांता, मूसल, टोकरी, कृषि उपकरणों में नागर, कोपर, कुदाली, टोंगिया इत्यादि के साथ शिकार के औजार भी होता है ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

। वस्त्र विन्यास में सामान्यतः पुरुष घुटने तक धोती व कमीज या बंडी, स्त्रियाँ सूती साड़ी, ब्लाउज तथा कम उम्र की लड़कियाँ लहंगा व ब्लाउज पहनती हैं। स्त्रियाँ आभूषण की शौकीन होती हैं। स्त्रियाँ हाथ में कंकनी, चूड़ी, ऐंठी, बांह में नागमोरी, पहुंची, गले में सूता, चाँदी के रुपयों का हार, कान में सुतवां, खिनवा, नाक में फूली, कमर में करधन, पैरों पैरी (कांसे या चांदी की) सांटी पहनती हैं। स्त्रियाँ प्रायः हाथ, पैर, बांह आदि पर गुदना गुदवाती है।

इनका मुख्य भोजन चावल तथा कोदो का भात, बासी, पेज, उड़द, तिवड़ा, अरहर की दाल, मौसमी सब्जियाँ तथा भाजी है। मछली, मुर्गा, बकरा, चीतल, सांभर, कोटरी, खरगोश, जंगली सुअर का मांस खाते हैं। उत्सव या विशेष अवसरों पर महुआ का शराब पीते हैं। पुरुष बीड़ी, तमाखू खाते हैं। (कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh)

कंवर जनजाति का कृषि और व्यवसाय 

इस जनजाति का मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि में धान, कोदो, तिल, तिवरा, अरहर, मूंग, उड़द, आदि की फसलें बोते हैं। सिंचाई के साधन न होने के कारण उत्पादन सामान्य ही होता है। जिनके पास सिंचाई के साधन हैं, वे सब्जी, गेहूं, चना, आदि रबी की फसलें भी बोते हैं। भूमिहीन या कम कृषि भूमि वाले परिवार अन्य लोगों के खेतों में मजदूरी करते हैं।

वनोपज संग्रह भी इनकी आय का प्रमुख स्त्रोत है, जंगलों में महुआ, तेंदू पत्ता, माहुल पत्ता, चार, गोंद, हर्रा, धवई के फूल आदि वनोपजा एकत्र कर बाजारों में बेचते हैं। पहले खरगोश, सांभर, कोटरी, चीतल का शिकार भी करते थे। अब शिकार पर प्रतिबंध होने से शिकार नहीं करते। ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

कंवर जनजाति परम्परा 

कंबर जनजाति पितृवंशीय, पितृसत्तात्मक तथा पितॄनिवास स्थानीय जनजाति है। यह जनजाति विभिन्न अन्तःविवाही उपजातियों में विभक्त है। इस जनजाति की प्रमुख उपजाति तंवर अथवा उत्तरी, राठिया, पैंकरा, चेरवा, दूधकंबर आदि हैं। ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

कंवर जनजाति के एक वर्ग बिलासपुर के कोरबा, पेन्ड्रा, मतीन, छुरी, चांपा, लाफा, उपरोड़ा आदि जमींदारियों में जमींदारी प्राप्त किये थे। अन्य सामान्य कंवर से अलग होकर तंवर या उत्तरी कहलाते हैं। स्वयं को अन्य उपजाति से उच्च मानते हैं। रीति-रिवाज सामाजिक नियम इन्होंने राजपूत क्षत्रियों के समान मानते हैं।

विधवा विवाह इनमें वर्जित हैं। कंवर जाति के सामान्य कृषक कंवर कहलाते हैं। राठिया उपजाति मुख्यतः रायगढ़ जिले में पाये जाते हैं। चेरवा कंवर को कंवर पुरुष व चेरो स्त्री से उत्पन्न माना गया है। ये मुख्यतः सरगुजा जिले में निवास करते हैं। पैकरा कंवर रतनपर के हैहयवंशी राजा के सेना में सैनिक थे, माना गया है। कमलवंशी कंवर प्रारंभिक कंबर जनजाति के मूल लोग माने जाते हैं। दूध कंबर को कालोनिल डाल्टन ने कंबर जनजाति का क्रीम कहा है। इनका स्थान तंवर के बाद माना जाता है। (कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh)

पूर्व में उपजातियों के बीच आपस में खान-पान संबंध पाया जाता था, किन्तु वैवाहिक संबंध नहीं पाया जाता। उपजातियाँ विभिन्न गोत्रों में विभक्त है। मूल कंवर जनजाति में बधवा, बिच्छी, बिलवा, बोकरा, चन्द्रमा, चंवर, चीता, चुवा, चम्पा, धनगुरू, ढेंकी, दर्पण, गोबरा, हुड़रा, जाता, कोठी, खुमरी, लोघा, सुआ, फूलबधिया, गंगाकछार, सोनवानी, माझी, नाहना, भैंसा, समुंद, कोड़िया, दूध, आड़िला, सोन पाखर, जुआड़ी, भंडारी, सिकुटा, डहरिया अदि गोत्र पाये जाते हैं। गोत्र बहिर्विवाही होता है। जीव-जन्तु, वृक्ष-लता, पशु-पक्षी व प्राकृतिक वस्तुओं पर आधारित टोटम (वंश चिन्ह) पाया जाता है।

इस जनजाति की गर्भवती महिलाएँ प्रसव के दिन तक अपनी आर्थिक व पारिवारिक कार्य करती हैं। प्रसव सुईन (बुजुर्ग महिला/दाई) द्वारा कराया जाता है प्रसव के बाद नाल (नाड़ा) काट कर जमीन में गड़ाते हैं। प्रसूता को तीन दिन तक भोजन नहीं दिया जाता। तीन दिन तक कशापानी, गुड़, सोंठ, तिल का लड्डू, नारियल का खोपरा देते हैं। इसके बाद हल्का, सुपच्य भोजन देते हैं। छठे दिन घर शुद्धिकरण करते हैं तथा छठी मनाते हैं। कुल देवी-देवता की पूजा करते हैं। रिश्तेदारों को खाना खिलाते हैं।

मृतक को प्रायः जलाते हैं, कभी-कभी दफनाते भी हैं। तीसरे दिन ” तीज नहावन” की रस्म में परिवार, रिश्तेदार व बिरादरी के लोग बाल, दाढ़ी या नाखून कटवाते हैं। घर की साफ-सफाई की जाती है। दसवें दिन पुरुष एवं नौवें दिन स्त्रो मृतक का दशकर्म किया जाता है, जिसमें स्नान, तर्पण व पूजा के बाद मृत्यु भोज दिया जाता है। बच्चे की मृत्यु होने पर उसे जमीन में दफानते हैं। पांचवें दिन हो मृत्यु भोज कर देते हैं। ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

कंवर जनजाति में विवाह 

सामान्यतः विवाह की उम्र लड़के के लिये 18 से 21 वर्ष, लड़कियों के लिये 16 से 18 वर्ष मानते हैं। विवाह की पहल वर पक्ष की ओर से किया जाता है, किन्तु विवाह का निर्णय कन्या पर निर्भर होता है। रिश्ता तय होने पर वर पक्ष के लोग नई साड़ी, गुड़ कुछ रूपये व शराब लेकर कन्या पक्ष के घर मंगनी के लिये जाते हैं। ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh)

विवाह रस्म क्रमशः मंगरी, द्वारामांगा, रोटी तोड़ना, विवाह एवं गौना सहित पांच चरणों में सम्पन्न होती है। वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को “सूक” भरना के रूप में चावल, दाल, तेल, गुड़, हल्दी व नगद कुछ रूपया देते हैं। विवाह संस्कार जाति के बुजुर्ग व्यक्ति सम्पन्न कराते थे। वर्तमान में कई परिवार ब्राह्मण बुलाने लगे हैं। गुरावट (विनिमय) तथा घर जमाई प्रथा भी प्रचलित है। “पैठू” (घुसपैठ) और उदरिया (सहपलायन) को सामाजिक पंचायत द्वारा कुछ जुर्माना लेकर विवाह के रूप में मान्यता दिया जाता है। विधवा को चूड़ी पहनाने (पुनर्विवाह) की अनुमति है।

कंवर जनजाति का पंचायत 

कंवर जनजाति की अपनी परम्परागत जाति पंचायत होती है। पंचायत प्रमुख को “गौटिया “ कहते हैं। गाँव की पंचायत के अतिरिक्त सात-आठ गाँव मिलकर “चक पंचायत” होती है। अगर ग्राम पंचायत में निर्णय नहीं हो पाता तो प्रकरण “चक पंचायत” में लाया जाता है। ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

इसके बाद सात उपजातियों की “सतगड़िया पंचायत” होती है। ये कंवर समाज की सर्वोच्च पंचायत होती है। इसका निर्णय मानने को सभी बाध्य होते हैं। इन पंचायतों में वैवाहिक विवाद, अन्य जाति के पुरुष या स्त्री से विवाह, अनैतिक संबंध व सामाजिक नियम तोड़ने संबंधी मामले का निपटारा करते हैं।

कंवर जनजाति के देवी-देवता 

कंवर जनजाति के प्रमुख देवी-देवता में “दूल्हा-देव”, “बाहन देव”, ” ठाकुर देव”, “शिकार देव”, “सर्व मंगला देवी” कोसगाई देवी, बुढ़वा रक्शा, मातिन देवी, बंजारी देवी आदि हैं। इसके अतिरिक्त हिन्दू देवी-देवता राम, कृष्ण, शिव, गणेश, हनुमान, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सूरज, भूमि, नाग, बाघ, वृक्ष आदि की भी पूजा की जाती है। कुल देवी व कुल देवता को बकरा या मुर्गा की बलि दी जाती है। ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh)

कंवर जनजाति के त्यौहार 

इनके प्रमुख त्योहारों में “हरियाली”, जन्माष्टमी, पोला, तीजा, पीतर, नवाखानी, अनंत चौदस, परमा एकादशी, दुर्गा नवमी, दशहरा, दीपावली, होली आदि हैं। भूत-प्रेत, जादू-टोना पर विश्वास करते हैं। मंत्र-तंत्र का जानकार व ग्राम के देवी-देवता का पुजारी “बैगा” कहलाता है। ( कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

कंवर जनजाति में “करमा नृत्य”, “सुआ नाचा”, भोजली नृत्य, राम सप्ताह, रहस नृत्य आदि होता है। गाँव में एक रामायण चबूतरा होता है, जिस पर रामायण पाठ का आयोजन होता है। स्त्रियाँ सुआ गीत, भोजली गीत, पुरुष राम सप्ताह गीत, फाग, सेवा आदि गाते हैं।

2011 की जनगणना में कंवर जनजाति में साक्षरता 67.0 प्रतिशत दर्शित है। पुरुषों में साक्षरता 79.0 प्रतिशत तथा स्त्रियों में 55.2 प्रतिशत थी। (कंवर जनजाति छत्तीसगढ़ Kawar janjati chhattisgarh kawar tribe chhattisgarh )

 

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