कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh Kolam Tribe Chhattisgarh

कोलम जनजाति का परिचय 

कोलम जनजाति महाराष्ट्र की जनजाति है। 2011 के जनगणना में इनकी जनसंख्या महाराष्ट्र में 194671 दर्शाई गई है। महाराष्ट्र में कोलम मुख्यतः यवतमाल, नांदेड़, चंद्रपुर और गढ़चिरौली, वर्धा आदि जिले में तथा आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में पाये जाते हैं। छत्तीसगढ़ में इनकी अल्प जनसंख्या दर्शाई गई है।

2011 की जनगणना में इनकी जनसंख्या छत्तीसगढ़ में 402 दर्शित है। इनमें पुरुष 210 तथा स्त्रियाँ 192 हैं। संभवतः कुछ परिवार महाराष्ट्र से प्रवर्जित होकर केंद्र शासन की कार्यालय या उपक्रम नौकरी के लिए आने की संभावना है। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

अतः महाराष्ट्र में इनकी अधिकांश जनसंख्या नियासरत होने के कारण इनका सामाजिक सांस्कृतिक परिचय महाराष्ट्र के कोलम जनजाति के आधार पर दिया जाना उचित होगा।

कोलम के उत्पत्ति संबंधी ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। हटन ने भी इन्हें आंध्र प्रदेश में गोंड की उपजाति बताया है। रसेल ने कोलम को नीलगिरी के जनजाति के सदृश्य बताया है। आंध्र के कोलम स्वयं को के हिडिम्बी और भीम के वंशज मानते हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

इन जनजाति के लोग अपनी बोली में स्वयं को “कलेवर”, गोंडी में इन्हें “पुंजारी”, तेलुगु में ” मन्नेरवरलु” तथा महाराष्ट्र में अन्य जाति के लोग मराठी में इन्हें “कोलम” कहते हैं। इनकी बोली “कोलामी ” कहलाती है, जो द्रविड़ भाषा की समूह की बोली है।

कोलम जनजाति के रहन-सहन 

कोलम जनजाति मुख्य ग्राम से कुछ दूरी पर अलग अपना टोला बनाकर रहते हैं। टोले के चारों ओर कृषि भूमि होती है। टोला वर्गाकार बसा होता है, जिसके मध्य पूर्वोन्मुख “चवड़ी” (चौरी) होता है, जहाँ गाँव के पुरुष एकत्र होते हैं, बैठते हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

इनके घर की दीवाल सामान्यतः बाँस से निर्मित होती है जिस पर मिट्टी व गोबर का लास्टर होता है। छप्पर घास-फूस या कभी-कभी देशी खपरैल का बनाते हैं। घर में सामान्यतः एक या दो कमरे होते हैं। घर में अनाज रखने की कोठी, बाँस के बर्तन, ओढ़ने बिछाने के कपड़े, चक्की, चूल्हा, भोजन बनाने व खाने के लिये मिट्टी, एल्युमीनियम, पीतल के बर्तन होते हैं।

वस्त्र विन्यास में पुरुष धोती, बंडी और फेंटा तथा महिलाएँ साड़ी और ब्लाउज पहनती हैं। महिलाएँ हाथ की कलाईयों में कांच की चूड़ियाँ, विवाहित महिलाएँ गले में काँच के काले मनकों का मंगलसूत्र, हर्मल, नाक में नथ, कान में कुरकल, बारी आदि पहनती हैं जो नकली चाँदी, गिलट, पीतल के होते हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

इनका मुख्य भोजन जुआर की रोटी, राब, उड़द, मूंग, अरहर, चना, बरबटी को दाल, मौसमी सब्जी है। जंगली कंदमूल, फल, भाजी भी खाते हैं। मांसाहार में मछली, बकरा, मुर्गा, सुअर, हिरण, खरगोश, गोह, केकड़ा, कछुआ, जंगली पक्षी, चूहा आदि का मांस खाते है। महुआ से निर्मित शराब पीते हैं। पुरुष धूम्रपान करते हैं।

कोलम जनजाति के व्यवसाय 

इनका परम्परागत व्यवसाय यांस बर्तन निर्माण, आदिम कृषि, शिकार, खाद्य संकलन, मछली पकड़ना आदि था। वर्तमान में मुख्यतः कृषि और मजदूरी पर निर्भर हैं। इनकी प्रमुख कृषि उत्पादन ज्वार, अरहर, उड़द, मूंग, तिल आदि हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

भूमिहीन या लघु कृषक मजदूरी व जंगली उपज संग्रह भी करते हैं। वर्षा ऋतु मछली पकड़ते हैं। शिक्षण प्राप्त कर कुछ नवयुवक शासकीय सेवा में भी आ रहे हैं।

कोलम जनजाति के परम्पराए 

कोलम पितृवंशी, पितृसत्तात्मक तथा पितृ निवास स्थानीय जनजाति है। इनमें कई बहिर्थिवाडी गोत्र पाये जाते हैं, जैसे टेकाम, कुमरा, मंडावी, अटराम, वतुलकर, नेकवरका, पारसिनेकुल, घोटकुल, रविकुल, चेड़, दूव, कापडा, सुईकेर, मौसली. कब्बी आदि। इनमें गोत्र क्रमशः “चारदेव”, “पचदेव”, “सहदेव” वाले होते हैं। समान देव वाले वर कन्या में विवाह नहीं होता है ।

पहले रजस्वलाकाल में महिलाएँ खेतों में निर्मित अलग झोपड़े में निवास थी। प्रसव घर में स्थानीय दाई की मदद से कराते हैं। प्रसूता को जड़ी-बूटी, गुड़, साँठ आदि खिलाते हैं। पांचवें दिन शुद्धिकरण क्रिया संपन्न करते हैं। मुंडन तथा नामकरण 45वें दिन करते हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

विवाह हेतु मामा या बुआ की लड़की को प्राथमिकता देते हैं। विवाह उम्र लड़कों के लिए 17 से 20 वर्ष तथा लड़कियों की 14 से 18 वर्ष मानी जाती है। विवाह प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से किया जाता है। वधू मूल्य के रूप में अनाज, बकरा, नगद कुछ रकम दिया जाता है। विवाह रस्म वधू के घर जाति के बुजुगों के द्वारा सम्पन्न कराया जाता है।

सहपलायन, घुसपैठ प्रथा को जाति पंचायत में निर्णय उपरांत विवाह के रूप में मान्यता दी जाती है। विनिमय, सेवा विवाह, विधवा तथा तलाकशुदा का पुनर्विवाह भी पाया जाता है। विधवा का विवाह माता-पिता की स्वीकृति से किया जाता है। यदि कोई स्त्री को माता-पिता की स्वीकृति न मिले तो वह सिर पर पानी का घड़ा लेकर अपने पसंद के पुरुष के घर चली जाती है।

मृत्यु पर मृतक को दफनाते हैं। दसवें दिन तक सूतक माना जाता है। इस दिन नदी, तालाब में मुर्गा की बलि देकर स्नान करते हैं। दाढ़ी, मूँछ, सिर के बाल मुंडन कराते हैं। मृत्यु भोज देते हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

इनकी अपनी परंपरागत जाति पंचायत “पंच मंडल” कहा जाता हैं। पंच मंडल का प्रमुख नायक कहलाता है। अन्य सदस्यों में “महाजन” नायक का सहायता करता है। कारभारी दंड की रकम लेता है और हिसाब रखता है। घाट्या संदेशवाहक होता है।

इस पंचायत में अनैतिक संबंध, सम्पत्ति विवाद, विवाह, वधू मूल्य, तलाक संबंधी विवाद, सहपलायन, घुसपैठ विवाह संबंधी मामले का फैसला करते हैं। दोषी व्यक्ति से जुर्माना व सामाजिक भोज लेते हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

कोलम जनजाति के देवी-देवता और त्यौहार 

इनके प्रमुख देवी-देवता भीम देव (भीमायक), पोचमाई, मरी माई, सीता देवी लक्ष्मी, इंदुमाला देवी (हिडम्बी) आदि हैं। इसके अतिरिक्त हिंदू देवी-देवता वृक्ष, नदी, पहाड़ की पूजा करते हैं। सीता देवी को ग्राम की देवी के रूप में पूजते हैं। इन्हें फसल के प्रथम अन्न का नैवेद्य और बकरे या मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

इनके प्रमुख त्योहार साठी (गाँव बंधोनी) नव वर्ष (कोरार), उरा भीम पूजा (बुमी), दिवाली, सिमगा (होली) और मुरी आदि हैं। भूत-प्रेत, जादू-टोना पर काफी विश्वास करते हैं। गाँव के चारों कोने में पत्थर गाढ़कर मुर्गी की बलि देते हैं तथा नमक छिड़कते हुए गाँव बंधोनी करते हैं। एक स्थान को मुक्त रखा जाता है। यही गाँव का प्रवेश स्थान होता है। जादू मंत्र से रोगोपचार करने वाला “सुपारी” कहलाता है।

इनके प्रमुख लोक नृत्य “डंडोरी”, गुसदी और डिमसा कहलाता है। महिलाएँ विवाह के अवसर पर नाचती हैं और पुरुष वाद्य यंत्र बजाते हैं। इनके प्रमुख वाद्य यंत्र टापटा (ढोल) और बाँस (बाँसुरी) है। विवाह, त्योहार व नृत्य के अवसर पर लोक गीत गाते हैं।

वर्ष 2011 की जनगणना में छत्तीसगढ़ के कोलम जनजाति में साक्षरता 62.7 प्रतिशत थी। पुरुषों में साक्षरता 59.7 प्रतिशत व महिलाओं में 46.2 प्रतिशत पाई गई थी। ( कोलम जनजाति छत्तीसगढ़ Kolam Janjati Chhattisgarh kolam tribe chhattisgarh )

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source : Internet

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Rajveer Singh
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