डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh  के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh Damor Tribe Chhattisgarh

डामोर जनजाति का परिचय

डामोर मध्य प्रदेश की एक अल्पसंख्यक जनजाति है। इनकी अधिकांश जनसंख्या राजस्थान में निवास करती है। मध्य प्रदेश में इनकी जनसंख्या 2011 की जनगणना में 1815 दर्शित है। मध्य प्रदेश में इनकी जनसंख्या रतलाम, मंदसौर आदि जिले में मुख्यतः पाई जाती है।

छत्तीसगढ़ में इनकी जनसंख्या जनगणना 2011 में 56 दर्शाई गई है। इनमें पुरुष 32 एवं स्विय 24 थी। छत्तीसगढ़ में निवासरत डामोर जनजाति परिवार संभवतः राज्य पुनर्गठन में मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ आये इस जनजाति के कर्मचारियों का परिवार हो सकते हैं। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

डामोर जनजाति की उत्पत्ति 

डामोर जनजाति के उत्पत्ति के संबंध में ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। दन्तकथाओं के अनुसार दो भाई भगवानजी मानजी और बालाजी मानजी, परमार राजा के वंशज थे। गुजरात के स्थानीय राजा के राज्य में मेहमान बनकर आये। एक दिन दोनों भाई शिकार के लिये निकले, दोनों को वहाँ बहुत प्यास लगी। उन्हें पास एक झोपड़ी दिखाई दी, दोनों झोपड़ी के पास गये। भगवान जी ने वहाँ पानी पी लिया, किन्तु छोटे भाई ने झोपड़ी के स्वामी से जाति पूछी। झोपड़ी स्वामी डोम जाति का था। छोटे भाई बालाजी पानी नहीं पिया और वापस चला गया।

भगवान जी को आत्मग्लानि हुई पर उन्होंने दूंगरपुर के राजा के यहाँ जाकर सेना में नौकरी कर ली। उसने राज्य के भील सुटेरों को कैद किया। राजा ने प्रसन्न होकर कुछ ग्राम दे दिये। डोम के यहाँ पानी पीने के कारण इसके मेराज “डागोर” कहलाये दूसरी किवदंती यह है कि महाराणा प्रताप के सेना में कुछ वीर सैनिक थे जो गुजरात के डाम क्षेत्र के मूल निवासी थे। महाराणा प्रताप के साथ पयस्त होकर जंगलों की शरण लिये इनके वंशज बाद में डामोर कहलाये।

डामोर जनजाति का रहन-सहन 

डामोर जनजाति के लोग भील, परेलिया आदि जनजातियों के साथ ग्राम में निवास करते हैं। इनके घर सामान्यतः मिट्टी की बनी होती है, छप्पर देशी खपल से बनी होती है। घर में 2-3 कमरे होते हैं घर की दीवारें सफेद मिट्टी से पुताई की गई होती है। घर का फर्श मिट्टी का होता है, जिसे महिलाएँ सप्ताह में दो बार गोबर लिपती है पर में अनाज रखने की कोठी, चारपाई, पंट्टी (चक्की), मूसल, कुछ नीर-कमान, कुल्हाड़ी आदि पाई जाती है। पशुओं के लिये स्थान अलग होता है। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

पुरुष, स्त्री सुबह उठकर बबूल, नीम आदि की दातौन से दाँत साफ करते हैं। सप्ताह में दो-तीन बार ही स्नान करते हैं। काली मिट्टी से बाल धोते हैं। बालों पर मूँगफली का तेल लगाकर स्विय कधी कर बालों का जूड़ा बनाती हैं। स्त्रियाँ शरीर में हाथ, पैर, चेहरे पर गुदना गुदाती हैं। गहनों की काफी शौकीन होती हैं। महिलाएँ पैर में कड़ा, हाथों में चूड़ियाँ, गले में मोती की माला, कानों में झुमका, नाक में लौंग, सिर पर राखड़ी पहनती हैं।

वस्त्रों में पुरुष छोटी धोती घुटनों के ऊपर से, बंडी, सिर पर पगड़ी पहनते हैं। स्त्रियाँ घाघरा चोली, ओढ़नी पहनती हैं। इनका मुख्य भोजन मक्का, जुआर की रोटी, कोदरा की भात, उड़द की दाल, मौसमी सब्जी है। त्योहार, उत्सव के अवसर पर मुर्गा, बकरा, मछली भी खाते हैं। महुआ से निर्मित शराब भी पीते हैं। पुरुष बीढ़ी भी पीते हैं। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

डामोर जनजाति का व्यवसाय 

डामोर जनजाति का आर्थिक जीवन मुख्यतः खेती, मजदूरी, जंगली उपज संग्रह, पशुपालन पर आधारित है। कृषि में मुख्यतः मक्का, जुआर, कोदरा, उड़द, अरहर, मूंगफली, प्याज बोते हैं। जंगली क्षेत्रों में महुआ, गुल्ली, गोंद, शब्द आदि भी कभी-कभी एकत्र कर लेते हैं।

दीपावली के बाद मजदूरी करने के लिये शहरों में भी चले जाते हैं। पहले खरगोश, हिरण आदि का शिकार भी कर लेते थे, किन्तु अब प्रतिबंध के कारण शिकार नहीं करते। वर्षा ऋतु में अपने उपयोग हेतु कुछ मछली पकड़ लेते हैं। महिलाएँ भी काफी मेहनती होती है। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

डामोर जनजाति के परम्पराए

डामोर समाज पितृसत्तात्मक, निवास स्थानीय है। दो उपजाति समान विशीय निवासस्था क्रमशः उच्च डामोर और निम्न डामोर में विभक्त हैं। इनमें आपस में विवाह नहीं होते हैं, किन्तु खान-पान हो जाता है।

उपजातियाँ विभिन्न “कुल” (गोत्र) में बंटी हुई हैं। ऊँचा डामोर में डामोर, परमार, सिसोदिया, राठौड़, चौहान, सोलंकी, सरोदिया, बारिया, मालीवड़ कुल पाये जाते हैं। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

निम्न डामोर में खांट, पागी, अमलीयास, पटेल, संरतिया, पंठरिया, पुजारा, दिंदोर, उजेला, खरादी, तराल कटारा, कोटवाल, इनोछिया, बामदिया, गोंधा आदि कुल पाये जाते हैं। कुल बहिर्विवाही समूह हैं, अर्थात् एक ही कुल के लड़के-लड़कियों का आपस में विवाह नहीं होता।

गर्भावस्था में कोई विशेष संस्कार नहीं किया जाता। प्रसव स्थानीय बुजुर्ग महिलाओं की देखरेख में घर पर ही कराते हैं। प्रसव के पश्चात् बच्चे की नाल तीर की नोक से काटते हैं तथा घर में ही गड्ढा खोदकर गड़ाते हैं। प्रसूता को गुड़, मरी, पीपर, सोंठ का काढ़ा बनाकर पिलाते हैं। 12वें दिन प्रसूता एवं बच्चे को शुद्धिकरण स्नान कराते हैं। परिवार की देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

विवाह उम्र लड़कों में 15-18 वर्ष तथा लड़कियों में 14-16 वर्ष पाई जाती है। विवाह का प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है। विवाह में वर पक्ष वाले वधू पक्ष को नगद रकम देते हैं, जिसे “दापा” कहा जाता है। दापा की रकम 2000 से 10000 रुपये तक प्रचलित है। वर पक्ष के लोग बरात लेकर वधू के घर आते हैं। चोरों फेरा वर-वधू को जाति के बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा कराया जाता है।

” आंटा-सांटा” (विनिमय), ” खण्दानिया” (सेवा विवाह), “दूकू” (सहपलायन), “भगेली” (घुसपैठ, नारा भी समाज में मान्यता प्राप्त है। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

मृत्यु होने पर मृत व्यक्ति को जलाते हैं। अस्थियों को नर्मदा या नजदीक की नदी में विसर्जित करते हैं। घर को गोबर से लीपकर शुद्ध करते हैं। 13वें दिन देवी-देवताओं की पूजा कर जाति वालों को मृत्यु भोज देते हैं। पितृपक्ष में कुछ लोग पूर्वजों के नाम पर श्राद्ध भी करने लगे हैं।

इस जनजाति की अपनी परम्परागत पंचायत होती है। जाति पंचायत के प्रमुख को “मुखी” कहते हैं। अन्य पंच भी होते हैं। जाति पंचायत का प्रमुख कार्य इसके सदस्यों का जाति में या अन्य जाति के साथ अनैतिक संबंध पर नियंत्रण रखना, जाति के देवी-देवताओं की पूजा व्यवस्था करना, विवाह, “छूटाछेड़ा” (तलाक), आदि झगड़ों का निपटारा करना है। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

डामोर जनजाति के देवी-देवता और त्यौहार 

इनके प्रमुख देवी-देवता महादेव, डाकोरजी, केशरियाजी, कुबेरजी, कालका आता पतगिक वधर्म के सभी देवी देवताओं को भी मानते हैं। सूरज, पर्वत, धरती, बाघ, नागदेव आदि की भी पूजा करते हैं।

इनके प्रमुख त्योहार होली, दिवाली, दशहरा, नोरता, शीतला अष्टमी, रामनवमी, जन्माष्टमी आदि है। भूत-प्रेत, जादू-टोना, मंत्र-तंत्र में विश्वास करते हैं। जादू मंत्र के जानकार व्यक्ति को “बढ़या” कहा जाता है। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

डामोर जनजाति के लोग नवरात्रि में गरबी, होली पर भगोरिया, विवाह में लगन नृत्य करते हैं। लोकगीत में गरबा, लगनगीत, फाग, भजन आदि मुख्य हैं। इनके मुख्य वाद्य यंत्र ढोल, मांदर, “थाक”, “मोरली” आदि हैं।

2011 की जनगणना में छत्तीसगढ़ में निवासरत इस जनजाति की साक्षरता 82.7 प्रतिशत दर्शाई गई है। इनमें पुरुषों में साक्षरता 96.4 प्रतिशत एवं स्त्रियों में साक्षरता 66.7 प्रतिशत थी। ( डामोर जनजाति छत्तीसगढ़ Damor Janjati Chhattisgarh damor tribe chhattisgarh )

अधिक प्रतिशत यह भी दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ में निवासरत डामोर परिवार मध्य प्रदेश से बंटवारा में आये कर्मचारियों अथवा केन्द्र शासन के कार्यालय में पदस्थ इस जाति के कर्मचारी के परिवार होंगे।

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source : Internet

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Rajveer Singh
Rajveer Singh

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