मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh

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मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh
मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh  के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi Janjati Chhattisgarh Manjhi Tribe Chhattisgarh

मांझी जनजाति कि उत्पत्ति 

माझी जनजाति छत्तीसगढ़ राज्य की एक अनुसूचित जनजाति है। इनकी जनसंख्या 2011 की जनगणना अनुसार छत्तीसगढ़ में 65027 दर्शाई गई हैं। इनमें 32739 पुरुष तथा 32288 स्त्रियाँ थी। राज्य में इस जनजाति का प्रमुख निवास क्षेत्र रायगढ़, जशपुर, कोरबा, बलरामपुर तथा सरगुजा जिले हैं। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

माझी जनजाति के उत्पत्ति संबंधी ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है। आर. व्ही. रसेल ने अपनी पुस्तक “दी ट्राइब्स एण्ड कास्ट ऑफ सेन्ट्रल प्रोविन्सेस ऑफ इंडिया” (1916) में माझी जनजाति की उत्पत्ति गोंड, मुण्डा तथा कंवर जनजाति के पूर्वजों से माना है। इन्होंने मझवार एवं माझी को एक ही समूह माना है। अंग्रेज विद्वान विलियम क्रूक्स ने आदिवासी माझी को द्रविड़ माझी माना है। इन्होंने लिखा है कि आर्यन समूह के केवट, धीवर, मल्लाह आदि नाव द्वारा नदी की मझधार पार करने कारण मांझी कहलाते हैं। इन्हें उन्होंने आर्यन मांझी कहा है। विलियम क्रूक्स ने सचेत किया है कि आर्यन मांझी और द्रविड़ माझी (जनजाति) में सावधानी पूर्वक विभेद किया जाये।

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति माझी एवं अन्य पिछड़ा वर्ग में आने वाली जातियाँ जो व्यवसायिक “मांझी” कहलाते हैं, इनमें सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक रूप से निम्नांकित विभेद है : ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

(1) जनजाति माझी (द्रवीड़ माझी )

सरगुजा जिले के मैनपाट क्षेत्र, कोरबा जिले के लेभरू क्षेत्र, जशपुर जिले के पहाड़ियों में निवासरत अनुसूचित जनजाति समूह के माझी जिनके जीविकोपार्जन का साधन कंदमूल एवं वनोपज संग्रह, बन्दर एवं अन्य वन्य जीवों का शिकार, बाँस की टोकरी, झउंहा निर्माण आदि है। इनका विस्तृत नृजातीय वर्णन आगे दिया गया है।

(2) व्यवसायिक मांझी (आर्यन मांझी )

अन्य पिछड़ा वर्ग के केवट, ढीमर, मल्लाह, नावड़ा आदि जातियाँ जिनका जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन नदी, नालों से मछली पकड़ना, सिंघाड़े की खेती, नाव चलाना तथा फुटाना (चना), मुरमुरा बेचना आदि है। नाव से नदी पार करना के कारण माझी कहलाते हैं। इन्हें विलियम क्रूक्स ने आर्यन मांझी (1886) में कहा था। इन्हें पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक लाभ प्राप्त करने की पात्रता आती है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

(3) पद नाम माझी

बस्तर संभाग के जनजातियों में क्षेत्रीय जनजाति पंचायत के मुखिया (प्रमुख) को “माझी” कहा जाता है। यह पद परम्परागत होता था जो पीढ़ी दर पीढ़ी माझी (मुखिया) के सन्तानों को मिलता था। इन्हें उनके वास्तविक जाति यथा मुरिया जाति का होने पर मुरिया का, हलबा जाति का होने पर हलबा का या भतरा जाति का होने पर भतरा जाति का प्रमाण पत्र की पात्रता आती है। 

मांझी जनजाति क़े रहन-सहन 

माझी जनजाति के गाँव सामान्यतः पहाड़ी तथा जंगली क्षेत्रों में होते हैं। यह जनजाति गॉड, मंझवार, कंवर, मुण्डा, नगेसिया, उरांव, कोरवा आदि जनजातियों के साथ गाँव में निवास करती है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

इनके घर सामान्यतः मिट्टी व लकड़ी के बने होते हैं. जिनके ऊपर सामान्यतः घास फूस या देशी खपरैल का छप्पर होता है। फर्श मिट्टी का होता है। घर में दो-तीन कमरे होते हैं। जानवरों के लिये पीछे का कमरा होता है, जिसका दरवाजा घर के पिछवाड़े में खुलता है।

घरेलू वस्तुओं में धान कूटने की मूसल, घांस की टोकरी, सूपा, ओढ़ने-बिछाने के कपड़े, मिट्टी से बनी हुई गगरी, कनोजी, तवा, परई, हडिया तथा एल्युमिनियम की थाली होती है। प्रत्येक घर में तीर-धनुष अनिवार्य रूप से पाया जाता है। कृषि उपकरण तथा मछली पकड़ने का जाल पाया जाता है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

माझी जनजाति के पुरुष तथा स्त्रियाँ सुबह उठकर नीम, बबूल आदि की टहनियों से दातून करती हैं। सप्ताह में 3-4 बार नहाते हैं। महिलाएँ रिठे व मिट्टी से सिर धोती हैं तथा सिर में तेल लगाकर जूड़ा बाँधती हैं। गुदना गुदाने की प्रथा इनमें प्रचलित है।

मांझी जनजाति क़े व्यवसाय 

वस्त्र-विन्यास में स्त्री तथा पुरुष अन्य जनजातियों (गोंड, मंझवार, कंवर) जैसा ही पहनते हैं। इनका मुख्य भोजन चावल, कोदो की पेज, भात, मौसमी सब्जी, जंगली कंदमूल, फल आदि हैं। मांसाहार में चीतल, सांभर, बरहा, सुअर, गिलहरी, बन्दर, केकड़ा, मछली और सभी पक्षियों का मांस खाते हैं। पुरुष तंबाकू को तेंदू पत्ते में लपेटकर लगभग पांच छह इंच लम्बी चोंगी बनाकर पीते हैं।

इनका आर्थिक जीविकोपार्जन पहाड़ी खेती, जंगली उपज संग्रह, शिकार, बाँस की टोकरी निर्माण होती है। पहाड़ी खेती में कोदो, धान, उड़द आदि बोते हैं। जंगली उपज में महुआ, चिरोंजी आदि एकत्र कर बेचते हैं। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh
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कोल माझी मोहलाइन के रेशे से रस्सी गेरुवा, डोरी-डांवा बनाकर कंवर, गोंड, स्व, बिंझवार आदि जनजातियों को अनाज के बदले में देते हैं, इसके अतिरिक्त बाँस की टुकनी, झांवी, झउंहा आदि निर्माण कर अन्य कृषक आदिवासियों को अनाज के बदले में देते हैं। ये लोग बरहा, सांभर, गिलहरी, खरगोश आदि के शिकार भी करते हैं। स्वयं के उपभोग के लिये मछली भी पकड़ते हैं।

माझी जनजाति वर्तमान में मझवार से अलग एक स्वतंत्र जनजाति है। किन्तु मझवार के साथ इनका खापान संबंध पाया जाता है। माझी जनजाति मुख्य रूप से तीन उपजातियों में विभक्त है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

(1) कोल माझी, (2) डोरबटा/तुरिया माझी, (3) किसान माझी। किसान माझी अपने को उपरोक्त दोनों से बड़ा मानते हैं, तथा हाडू (बन्दर), चिटरा (गिलहरी) आदि नहीं खाते। ये मुख्य रूप से आदिम कृषि करते हैं। उपजातियाँ विभिन्न गोत्रों में विभक्त हैं। इनके प्रमुख गोत्र केकरा खोकसा, धनकी, वाघ, सुआ, धीन्चा, नाग, बारम, तेलासी, मरकाम, सेमरिया, कुर्राम, उड़का, मराई आदि हैं। प्रत्येक गोत्र के टोटम होते हैं।

मांझी जनजाति क़े परम्परा 

इस जनजाति में गर्भावस्था में कोई संस्कार नहीं होता है। प्रसव प्रायः स्थानीय सुईन (दाई) की देखरेख में घर के बाहर एक छोटी सी प्रसव झोपड़ी बनाकर कराया जाता है। बच्चे का नाल गिर जाने पर छठी मनाई जाती है। रिश्तेदारों को खाना खिलाते हैं। कपड़े धोने हेतु धोबी बुलाया जाता है। प्रसूता को हिरवा से बनाया गया कसा जिसमें गुड़ सेमर की छाल, छिंद की जड़, सोंठ आदि होती है, पिलाया जाता है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

विवाह की उम्र लड़कों में 14 से 18 तथा लड़कियों में 12 से 16 वर्ष पाई जाती है। भाई व बहन के पुत्र-पुत्रियों में आपस में विवाह (ममेरा, फुफेरा) होते हैं। विवाह का प्रस्ताव वर का पिता वधू के घर लेकर जाता है। विवाह तय होने पर वधू पक्ष को चावल, ग्यारह रुपये, तेल, दाल, सब्जी, भाजी “सूक” के रूप में दिया जाता है।

विवाह की रस्में माझी जनजाति के सियान (बुजुर्ग व्यक्ति/बैगा) द्वारा पूरी कराई जाती है। इनमें “उरिया” (सहपलायन), “दुकू” (घसूपेठ), “लमसेना” (घर जवाई), “चूड़ी पहनाना” (पुनर्विवाह) आदि विवाह का रूप में भी पाया जाता है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

माझी जनजाति में मृतक के शरीर को दफनाया जाता है। मृत्यु के तीसरे दिन तीसरा व दसवें दिन दसवा किया जाता है। इसमें परिवार के पुरुषों के सिर के बाल, दाढ़ी, मूँछ आदि मुण्डन कराते हैं। मृत्यु भोज जाति वालों को दिया जाता है।

माझी जनजाति में स्वयं की अलग जाति पंचायत होती है। इसका प्रमुख सियान होता है। इस पंचायत में दूसरे जाति से विवाह, तलाक, विहाटी (वधू धन वापस लेना) आदि का निपटारा किया जाता है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

मांझी जनजाति क़े देवी-देवता 

इनके मुख्य देवी-देवता ठाकुर देव, बूढादव, बूढीमाई, ढीहारिन आदि हैं। देवी-देवताओं को मुर्गा, बकरा आदि की बलि देते हैं। इनके मुख्य त्योहारों में कर्मा, नवातिहार, फाल्गुन तिहार ( होली), गौरा तिहार आदि है। भूत-प्रेत, मंत्र-तंत्र में भी काफी विश्वास करते हैं। . इस जनजाति की महिलायें सुवा नृत्य, गौरा त्योहार के समय नाचती हैं।

इसके अतिरिका युवक-युवतियाँ कर्मा उत्सव के समय कर्मा नृत्य, फागुन तिहार में डंडा नाच, विवाह के समय विवाह नाच आदि करते हैं। इनका मुख्य वाद्य यंत्र ढोल तथा मांदर है। त्योहारों के समय सुआ गीत, कर्मा गीत, डण्डा गीत गाया जाता है। ( मांझी जनजाति छत्तीसगढ़ Manjhi janjati chhattisgarh manjhi tribe chhattisgarh )

2011 की जनगणना में माझी जनजाति की साक्षरता 44.1 प्रतिशत दर्शित है। पुरुषों की साक्षरता 54.6 प्रतिशत तथा स्त्रियों की साक्षरता 33.5 प्रतिशत थी।

 

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