भूमकाल विद्रोह छत्तीसगढ़ | Bhumkal Vidroh Chhattisgarh

भूमकाल विद्रोह छत्तीसगढ़ Bhumkal Vidroh Chhattisgarh


भूमकाल विद्रोह (1910)

शासक
  • रुद्रप्रताप देव
नेतृत्वा
  • गुण्डाधुर धुरवा ( नेतानार के जमींदार )
विपक्षी
  • अंग्रेज ।
कारण
  • अंग्रेजो की अनेक अत्याचार व शोषण वादी निति ।
  • बैजनाथ पांडा को दीवान बनाया ।
प्रारम्भ
  • पुसपाल बाजार से लूट पात शुरू ।
नारा
  • बस्तर बस्तरवासियों  का है।
प्रतीक
  • लाल मिर्च व् आम की टहनी ।
दमनकर्ता
  • कप्तान गेयर ने 1 फ़रवरी 1910 को पंजाबी सेना के बल पर विद्रोह का दमन किया ।
विद्रोह
  • सड़क घाट में हुआ था ।
मुखबीर
  • सोनू मांझी
परिणाम
  • 29 मार्च 2010 से गुंडाधुर लापता है ।
विशेष
  • गुंडाधुर को चमत्कारी पुरुष कहा जाता  है ।
  • गुण्डाधुर को छत्तीसगढ़ का तात्या टोपे कहा जाता है ।

1910 में हुआ भूमकाल विद्रोह बस्तर का सबसे महत्वपूर्ण व व्यापक विद्रोह था। इसने बस्तर के 84 में से 46 परगने को अपने चपेट में ले लिया इस विद्रोह के प्रमुख कारण थे –

जनजाति वनों पर अपने पारम्परिक अधिकारों व भूमि एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों के मुक्त उपयोग तथा अधिकार के लिए संघर्षरत थे।  1908 में जब यहाँ आरक्षित वन क्षेत्र घोषित किया गया और वनोपज के दोहन पर नियंत्रण लागू किया गया तो जनजातियों ने इसका विरोध किया।

अंग्रेजों ने एक ओर तो ठेकेदारों को लकड़ी काटने की अनुमति दी और दूसरी ओर जनजातियों द्वारा बनायी जाने वाली शराब के उत्पादन को अवैध घोषित किया।

विद्रोहियों ने नवीन शिक्षा पद्धति व स्कूलों को सास्कृतिक आक्रमण के रूप में देखा। अपनी संस्कृति की रक्षा करना ही उनका उद्देश्य था।

पुलिस के अत्याचार ने भूमकाल विद्रोह को संगठित करने में एक और भूमिका निभायी। उक्त सभी विद्रोहों को आग्ल-मराठा सैनिक दमन करने में सफल रहे व विद्रोहियों को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफलता नहीं मिल सकी। पर राजनैतिक चेतना जगाने में ये सफल रहे।

सरकार को भी अपनी नीति निर्माण में इनकी मांगों को ध्यान में रखना पड़ा। 1857 के महान विद्रोह के उपरांत भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप न करने की अंग्रेज नीति ऐसे ही विद्रोहों का परिणाम थी। कालांतर में इन विद्रोहों के आर्थिक कारको ने नवीन भारत की नीति निर्माण में भी मार्गदर्शन किया।

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