बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar

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बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar
बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains और Interview पूछा जाता है, तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar

हिन्दुस्तान का हृदय स्थल मध्यप्रदेश का पूर्वी दक्षिणांचल दंडकारण्य, महाकांतार या बस्तर ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से देश का एक महत्वपूर्ण भूभाग है। यहां की संस्कृति का अध्ययन विश्व के विद्वानों के लिए अन्वेषणात्मक जिज्ञासा का केन्द्र रहा है। इसका क्षेत्रफल लगभग 13000 वर्गमील है। यह पूर्व में उड़ीसा, पश्चिम में महाराष्ट्र दक्षिण में आन्ध्रप्रदेश से घिरा है। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

उपनिषद, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रंथों में रेवोत्तरस’ पद की जानकारी मिलती है। राम को अपने वनवास काल में बहुत सा समय इस अंचल में व्यतीत करना पड़ा। महाभारत के अनुसार इस अंचल पर सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी नरेशों का शासन रहा। बौद्ध, जैन काल, नंदवंश, मौर्य काल में भी यह क्षेत्र तत्कालीन राजनीति से प्रभावित होता रहा। शंगु सातवाहन शासकों का इस अंचल पर हस्तक्षेप रहा। ई. 300 तक वाकाटकों ने भी इस क्षेत्र को पदाक्रांत किया। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

समुद्र गुप्त के समय महाकोशल

समुद्र गुप्त के समय महाकोशल में महेन्द्र और बस्तर में व्याघ्रराज का राज्य था। नलवंश, शरभपुरीय पांडु वंश, कलचुरि वंश के राजाओं का बस्तर की भूमि के किसी न किसी छोर पर नियंत्रण रहा। इस अवधि में राजाओं के साथ विद्वान भी रहते थे जिनमें राजगुरू, राज ज्योतिषी, राजपुरोहित प्रमुख होते थे जिनका राजनीतिक व सांस्कृतिक विकास के क्षेत्रों पर प्रभाव रहता था। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

बिहार के उत्तर के मिथिलांचल विद्वानों, दार्शनिकों, तांत्रिकों का गढ़ रहा है। कोसल के पूर्व में गंडक के आगे बिहार का वर्तमान मिथिला प्रदेश विदेह जनपद के नाम से प्रसिद्ध था। पुराणों के अनुसार यह कोसल जनपद की एक शाखा थी। बौद्ध काल में यह वृजि या वज्जि गण था। याज्ञवल्क और सीता के नाम से मिथिला गौरवान्वित था। मैथिली भाषा, मैथिल ब्राह्मण तथा दरभंगा के रूप में विदेह जनपद का पृथक अस्तित्व आज भी स्मरण हो आता है। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

बस्तर में समयानुकूल अनेक राजनीतिक परिवर्तन

बस्तर में समयानुकूल अनेक राजनीतिक परिवर्तन हुए, जिसका प्रभाव सामाजिक परिस्थितियों पर भी पड़ा। मूल आदिम प्रजातियों के अतिरिक्त अन्य प्रवासियों का प्रवेश इस अंचल में होता रहा। यद्यपि यातायात की दृष्टि से यह एक दुर्गम क्षेत्र रहा, फिर भी यहाँ पर विद्वानों का आगमन होता रहा। कई यहाँ सम्मानित होकर बस गए। वास्तव में मिथिला, उत्कल, कनोज, सरयूपार, महाराष्ट्र से लोग आते गए संपर्क सूत्र धार्मिक, आध्यात्मिक एवं व्यापारिक तथा प्रशासनिक था जिसने इस अंचल के जन जीवन को प्रभावित किया। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

मिथिला के ब्राह्मण वस्तुतः संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान दर्शन शास्त्र, धर्मशास्त्र के ज्ञाता तथा तांत्रिक हुआ करते थे। यही कारण था कि देश के विभिन्न रजवाड़ों, जमींदारों में उन्हें ससम्मान आमंत्रित किया जाता था। यह परम्परा प्राचीन काल से चले आ रही है। सल्तनत काल में आक्रांताओं के अत्याचार के कारण कुछ विद्वान नेपाल की ओर गए कुछ मध्यप्रदेश के अरण्यांचल में शांति की खोज में निकल पड़े। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के अकालों ने भी कईयों को अपनी जन्मभूमि छोड़कर यहां आने को विवश किया। इस प्रकार मध्यप्रदेश के दक्षिण पूर्वाचल में उनकी संख्या में वृद्धि होती गई।

मैथिलों के आने का प्रथम मार्ग

मैथिलों के आने का प्रथम मार्ग था दरभंगा, बनारस, इलाहाबाद, विध्याचल, जबलपुर, मंडला। दूसरा मार्ग था-छोटा नागपुर, रायगढ़, सारंगढ़, शिवरी नारायण आदि। छत्तीसगढ़ में दोनों ओर से आने वाले विद्वानों का मिलन केन्द्र रतनपुर था क्योंकि वह छत्तीसगढ़ की राजधानी थी। वहाँ पर 200 परिवार थे जो बाद में छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में फैले। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

गोंडवाना राज के अंतर्गत गढ़ा मंडला तथा जबलपुर एक महत्वपूर्ण केन्द्र था। वहाँ से एक वर्ग लोजी, बालाघाट, गोंदिया, भंवरगढ़, देवगढ़ की ओर गया तथा दूसरा वर्ग मंडला में रहा। मंडला से कवर्धा, खैरागढ़ राजनांदगांव, बिलासपुर, रतनपुर की ओर से बढ़ते गए। मंडला से ही एक अन्य मार्ग छत्तीसगढ़ की ओर आने हेतु अपनाया गया। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

अमरकंटक, पेन्ड्रा, कोटा, रतनपुर बिलासपुर, रायपुर यहाँ से अभनपुर, धमतरी, कांकेर, जगदलपुर गये। मैथिली ब्राह्मणों का प्रारंभ में प्रमुख केन्द्र गढ़ा जबलपुर मंडला, रतनपुर, रायपुर बाद में कांकेर, बस्तर, खैरागढ़ आदि राजवाड़ों में वे गए। इस अंचल में वे राजगुरु, राज ज्योतिषी, राज पुरोहित एवं अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यहाँ उन्होंने अपनी विद्वता एवं प्रयास से अंचल में एक सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ा। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

मंडन मिश्र मैथिल ब्राह्मण

विद्वानों में प्रचलित है कि मंडन मिश्र मैथिल ब्राह्मण थे और महिष्मती मंडला में रहते थे। दरभंगा जिला एजेटियर के अनुसार महाराजाधिराज दरभंगा के पूर्वज मिथिला में आने के पूर्व जबलपुर के पास रहते थे। उनके पूर्वज का वर्णन रानी दुर्गावती के प्रसंग में है। जिनका नाम महेश ठाकुर था। मंडन मिश्र का समय लगभग आठवीं शताब्दी का था और महेश ठाकुर सोलहवीं सदी के थे। इस प्रकार मैथिल विद्वानों का आगमन प्राचीन काल में सिद्ध होता है। विद्वता के कारण यहाँ पर अनेक गांव राजाओं के द्वारा दिये गये।

बस्तर के सामाजिक इतिहास में मैथिल विद्वानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गोडवाना के शासक यादवराव के राज पुरोहित केशव झा के वंशज भी मंडला, रायपुर, बस्तर आदि क्षेत्रों में रहे। इनकी 32 पोढ़ी तक पुरोहिती रही पश्चात मैथिल ठाकुर वंश की 14 पीढ़ी तक बनी रही। महेश ठाकुर राजा बनकर मिथिला गये। रानी दुर्गावती से रट होकर महेश ठाकुर के शिष्य रघुनंदन राय ने बस्तर प्रस्थान किया। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

अर्वाचीन बस्तर के राजनैतिक एवं सांस्कृतिक चेतना के विकास में मैथिली ब्राह्मणों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वास्तव में पं. केदारनाथ ठाकुर की कृति ‘बस्तर भूषण के माध्यम से बाह्य बौद्धिक जगत बस्तर से परिचित हुआ। जिसका उद्धरण विदेशी विद्वानों ने भी दिया है। बस्तर को अराध्य देवी दंतेश्वरी को एक समकालीन प्रतिमा रायपुर में ठाकुर परिवार के मंदिर में है क्योंकि राजगुरु के ही परिवार के रायपुर में भी राजगुरु थे।

इसी परिवार के खेरागढ़ में भी राजगुरू थे। बस्तर की राजनीति में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बस्तर के मैथिल विद्वानों की कृतियों पर यदि अन्वेषणात्मक प्रयास किया जाए तो निश्चित रूप से सांस्कृतिक इतिहास के महत्वपूर्ण पृष्ठ सामने आ सकते हैं। राजगुरू परिवार में सुरक्षित महत्वपूर्ण दस्तावेज दुर्भाग्यवश दीमकों और बारिश की बौछार से समय के साथ नष्ट हो गये अन्यथा बस्तर के इतिहास पर व्यापक प्रकाश पड़ता। ( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

मैथिल विद्वान रामचरण दास ने संवत 1707 फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को ताम्रपत्र लिखा इसमें कांकेर बस्तर के सोमवंशी एवं काकतीय राजाओं के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी की 35 पंक्तियाँ है। (1650 ई) मैथिल पंडित भगवान मिश्र लिखित छत्तीसगढ़ी का प्रथम शिलालेख दंतेवाड़ा मंदिर में है। बस्तर भूषण पं केदारनाथ ठाकुर लिखित महत्वपूर्ण ग्रंथ है ।( बस्तर की संस्कृति | Bastar ki Sanskriti | Culture of Bastar )

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Source : Internet

 

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Rajveer Singh
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