छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजातियाँ | Chhattisgarh ki Anusuchit Janjatiya

छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजातियाँ | Chhattisgarh ki Anusuchit Janjatiya

छत्तीसगढ़ राज्य में अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत 42 जाति समूह और अनुसूचित जाति के अंतर्गत 44 जाति समूह अधिसूचित किए गए हैं। यह अधिसूचना भारत सरकार के राजपत्र में हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित है।

इनमें से कई जातियों के नामों में उच्चारण भेद पाए जाते हैं, जो इनके ही स्थानजनित उच्चारणगत विभेद हैं। चूंकि मूल रूप से यह अधिसूचना अंग्रेजी भाषा और लिपि में जारी हुई है तथा इसका हिन्दी अनुवाद सिर्फ हिन्दी अधिसूचना के रूप में जारी हुआ है।

अत: उच्चारण भेद के कारण मूल अनुसूचित जनजाति और मूल अनुसूचित जाति के लोगों को जाति प्रमाण पत्र उनके जनजाति  अथवा अनुसूचित जाति का होने के बाद भी जारी नहीं हो पा रहा था। समिति को राज्य की अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के अंग्रेजी लिपि के शब्दों के स्थानीय भाषा में ध्वन्यात्मक मानक शब्द अंकित करने के बारे में विचार करने और अनुशंसा देने की जिम्मेदारी दी गई थी।

समिति ने इस महीने की 14 तारीख को राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट दी है। इसमें समिति ने अनुसूचित जन-जातियों में से 22 जातियों और अनुसूचित जातियों में 05 जातियों के उच्चारणगत विभेद इंगित किए हैं, जिन्हें आज मंत्रि परिषद ने विचार-विमर्श के बाद मान्य करने का निर्णय लिया।

इनमें अनुसूचित जनजातियों के 22 समूहों के विभिन्न उच्चारण विभेद और अनुसूचित जातियों के पांच समूहों के 19 उच्चारण विभेद शामिल हैं।

अनुसूचित जनजातियों से संबंधित प्रकरणों में – भुईहार, भारिया, भूमिया, पण्डो, भुजिया, बियार, धनवार, गड़ाबा, गदबा, गोंड, धुलिया, डोरिया, कंडरा, नागवंशी, हल्बा, तंवर, खैरवार, कोन्ध, कोड़ाकू, मंत धनगड़, पठारी और सवरा जाति के अंतर्गत विभिन्न उच्चारण में विभेद वाली जातियां शामिल हैं। इसी तरह अनुसूचित जाति से गई। संबंधित प्रकरणों में औधेलिया, धारकर, चडार, गांड़ा और महार जाति समूहों में विभिन्न उच्चारण विभेद वाली जातियां शामिल है।

 छत्तीसगढ़ में एससी-एसटी एक्ट

सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी एक्ट के जिस फैसले को लेकर देश में विवाद हो रहा है, उसे छत्तीसगढ़ पुलिस ने लागू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च 2018 के फैसले का ऊलेख करते हुए सर्वोच्च अदालत द्वारा अजा,जजा अत्याचार निवारण अनियम 1989 के प्रावधानों का दुपयोग रोकने के संबंध में निर्देश दिए गए हैं।

अत्याचार निवारण अधिनियम में अग्रिम जमानत स्वीकार करने में कोई रोक नहीं है। अगर प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है या जहां न्यायिक स्वरूटनी पर शिकायत प्रथम दृष्टया झूठी पाई जाती है, उस पर विचार के बाद एफआईआर होगी।

अब हो सकती है प्रारंभिक जांच

पुलिस मुख्यालय के आदेश के अनुसार, एक निर्दोष को झूठा फंसाने से बचाने के लिए प्रारंभिक जांच हो सकती है। संबंधित उप पुलिस अधीक्षक यह पता लगाएंगे कि अपराध बनता है या नहीं। वह आरोप तुच्छ या उत्प्रेरित तो नहीं है।


‘सलवा जुडूम’ यानी शांति का कारवां

वर्षों पहले धुर नक्सल प्रभावित बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ कुछ दोस्तों ने एक दल बनाया, नाम दिया सलवा जुडूम’ यानी शांति का कारवां। उसी समय दल के एक संस्थापक सदस्य मधुकर राव ने शपथ ली कि इस लड़ाई में यदि
किसी साथी की मौत होती है तो वह उनके बच्चों की परवरिश करेंगे और अगर नक्सली उन्हें भी मार दें तो अन्य जीवित सार्थी यह दायित्व निभाएंगे।

मारे गए सदस्यों के 132 बच्चे बेसहारा हो चुके हैं, लेकिन दिए गए वचन के अनुसार मधुकर राव अब उन 132 बेसहारा
बच्चों को पढ़ा रहे हैं और परवरिश कर रहे हैं। नक्सलियों की मनाही और भारी विरोध के बाद भी उनका उनका गुरुकुल चल रहा है।

साथियों को दिए वचन को निभाने के लिए ही 2008 में पंचशील आश्रम की बुनियाद रखी। यहां बच्चे रहते भी हैं, पढ़ते भी हैं। बता दें कि नक्सल प्रभावित बीजापुर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित कुटरू गांव में संचालित पंचशील आश्रम के संचालक 57 वर्षीय मधुकर राव को नक्सलियों ने देखते ही गोली मारने का फरमान जारी कर रखा है।

आश्रम में पहली से आठवीं तक की कक्षाएं चलती हैं। गांव के ही चार युवक अल्प मानदेय लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। मधुकर को छात्र पिता तुल्य मानते हैं। वे उन्हें ‘बड़े सर’ कह कर बुलाते हैं। यहां बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ खेलकूद, गीत-संगीत से भी जोड़ा जाता है। उनके हाथों में बंदूक की जगह किताबें हों, उनका मकसद है। सरकार ने पुलिस सुरक्षा प्रदान की है।

यह था सलवा जुडूम

कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा को सलवा जुडूम का जनक माना जाता है। छत्तीसगढ़ में जब नक्सलियों का आतंक बढ़ने लगा तो महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम की शुरुआत 2005 में की थी।

इसका मकसद था नक्सलियों को उन्हीं की भाषा में सबक सिखाना। सलवा जुडूम से नक्सलियों के आतंक पर काफी हद तक अंकुश भी लगा। इसके बाद नक्सलियों ने बदला लेने के लिए सुकमा में 25 मई 2013 को कांग्रेस के काफिले पर हमला कर महेंद्र कर्मा सहित 29 नेताओं की हत्या कर दी थी।


छत्तीसगढ़ में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक

छत्तीसगढ़ में सरकारी और गैर सरकारी रिकार्डो में दलित शब्द लिखने पर पाबंदी लगा दी गई है। सरकार ने बाकायदा
आदेश जारी कर दलित के स्थान पर जाति का उल्लेख करने का निर्देश दिया है।

राज्य के गठन के पहले संयुक्त मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन सरकार ने 10 फरवरी 1982 को नोटिफिकेशन जारी कर हरिजन शब्द पर रोक लगाई थी।

इस शब्द के इस्तेमाल पर सजा का भी प्रावधान किया गया, लेकिन दलित शब्द के प्रयोग पर कितनी सजा का प्रावधान होगा यह स्पष्ट नहीं है।

जनजाति सलाहकार परिषद सचिवालय

नया रायपुर में आदिवासी जनजाति:- छत्तीसगढ़ राज्य में जनजाति सलाहकार परिषद के सचिवालय का शीघ्र गठन किया जाएगा। अनुसूचित जनजाति अनुसंधान संस्थान में यह सचिवालय संचालित होगा। वहींआदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान को सोसायटी के रूप में पुनर्गठित कर संचालित किया जाएगा, ।

जिससे भारत सरकार के जनजाति कार्य मंत्रालय से वित्तीय सहायता सीधे संस्थान को मिलेगी और प्रस्तावित योजनाओं का विभिन्न स्तर से अनुमोदन कराने के बजाए सीधे आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण सोसायटी से अनुमोदन मिलना प्रारंभ हो जाएगा।

राज्य में जनजाति संस्कृति एवं भाषा अकादमी गठन के प्रस्ताव को सैद्धांतिक सहमति मिल गई है नया रायपुर पुरखौती मुक्तांगन के समीप 27 करोड़ की लागत से 22 एकड़ में शहीद वीरनारायण सिंह आदिवासी संग्रहालय निर्मित किया जाएगा।

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