छत्तीसगढ़ के जनजाति आदिवासी | Chhattisgarh Ke Janjati Adiwasi Tribe

छत्तीसगढ़ की जनजाति परम्परा | Chhattisgarh Ki Janjati Parampara

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छत्तीसगढ़ में जनजातीय संस्कृति अपने अनूठे तरीकों और साधनों के साथ काफी विशाल और विविध है। संस्कृति की अपनी विशिष्टता है। यदि आप विभिन्न आदिवासी संस्कृतियों और उनके विभिन्न तरीकों और साधनों के बारे में जानने के प्रति झुकाव रखते हैं, तो छत्तीसगढ़ में रहने का सही स्थान है और छत्तीसगढ़ में जनजातीय संस्कृति का अध्ययन काफी दिलचस्प होगा।

यदि आप छत्तीसगढ़, भारत में जनजातीय संस्कृति के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं, तो आप दंतेवाड़ा में गामावाड़ा के स्मृति स्तंभ, बस्तर में मारिया मेंहिर और बस्तर में मानव विज्ञान संग्रहालय का दौरा कर सकते हैं।

छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध जनजातियाँ गोंड जनजाति, भुंजिया जनजाति, बैगा जनजाति, बिसनहोर मारिया जनजाति, पारघी जनजाति, मुरिया जनजाति, हल्बा जनजाति, भतरा जनजाति, पारबे जनजाति, धुर्वा जनजाति, मुरिया जनजाति, डंडामी मरिया जनजाति, डोरला जनजाति, धनला जनजाति, कोल जनजाति, कोरवा जनजाति, राजगोंड जनजाति, कावार जनजाति, भैयाना जनजाति, बिंझवार जनजाति, सावरा जनजाति, मांजी जनजाति, भयना जनजाति, कमर जनजाति, मुंडा जनजाति और अबुझमारिया जनजाति।

छत्तीसगढ़ में जनजातीय संस्कृति के बारे में बात करने के लिए, प्रत्येक जनजाति का अपना समृद्ध इतिहास और संस्कृति है। उनके नृत्य, संगीत, पोशाक और भोजन के विभिन्न रूप एक-दूसरे से भिन्न हैं।एक जनजाति के प्रमुख को ‘सरपंच’ कहा जाता है, जो विवादों और अन्य महत्वपूर्ण मामलों के दौरान मुख्य सलाहकार और मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है।

मुख्य को 5 सलाहकारों की एक टीम द्वारा सहायता प्रदान की जाती है, जिनमें से प्रत्येक को पंच कहा जाता है। जनजातियाँ अपने सरपंच और 5 पंचों का बहुत सम्मान करती हैं। जनजातियों के भीतर बहुत अधिक एकता है।

आमतौर पर जनजाति के भीतर शादियां होती हैं। मृतकों को या तो दफनाया जाता है या अंतिम संस्कार किया जाता है। दाह संस्कार में महंगे बहु-अनुष्ठानों के कारण, यह बहुत लोकप्रिय नहीं है। लेकिन महत्वपूर्ण बड़ों का हमेशा अंतिम संस्कार किया जाता है।.

छत्तीसगढ़ जनजाति परमपरा से सम्बंधित कुछ मूल बाते

  • भारत की कुल जनसँख्या का 8.6% जनजाति है पुरे भारत में ।
  • पुरे भारत की सबसे बड़ी जनजाति समूह  गोंड है ।
भारत में सर्वाधिक ST भारत में कम ST
1.मध्यप्रदेश  1.पंजाब 
2.झारखण्ड   
3.ओड़िशा   
4.छत्तीसगढ़   

 

% में अधिक जनजाति  % में कम  जनजाति 
1.मिजोरम  1.पंजाब 

प्रजाति के आधार पर :-
  • ओड़िसा में कुल 62 प्रजातियां पाई जाती है ।
  • छत्तीसगढ़  में कुल 42 प्रजातियां पाई जाती है ।

छत्तीसगढ़ में भाषा :-

  • छत्तीसगढ़ में कुल 162 भाषा बोली जाती है ।
  • छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाएँ :-
  • 1.छत्तीसगढ़ी ( प्राचीन काल में कोसली )  2.गोंडी  3.हल्बी( सर्वाधिक जनजाति बोली ) 4.कुरुख 
  • छत्तीसगढ़ी भाषा को सरकारी भाषा बनाए के लिए भाषा आयोग का गठन किया गया है ।
  • रामायण का गोंडी भाषा में अनुवाद महादेव आयतुराम ने किया था ।
  • खेलकूद को गोंडी भाषा में कर्सना कहते है ।

छत्तीसगढ़ में जनजातीय :-

  • कुल जनसँख्या का 30.6% जनजाति है ⇒ 78 लाख 
  • 30.6% के साथ सबसे बड़ा जाती ⇒ जनजाति 
  • छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जनजाति समूह ⇒ गोंड ( सबसे छोटा- बैगा )
  • छत्तीसगढ़ का सबसे पिछड़ा जनजाति ⇒ अबुझमाड़िया 
  • आर्थिक दृष्टि से विकसित  जनजाति⇒ हल्बा
  • छत्तीसगढ़ में सबसे साक्षर जनजाति ⇒ उराव 
  • सांस्कृतिक रूप में समृद्ध जनजाति ⇒ मुड़िया 
  • सामाजिक दृष्टि से आगे ⇒ भतरा 

जनजाति वर्गीकरण :-

  1. गोंड :- 56%
  2. हल्बा :- 5%
  3. उराव :- 3%
  4. सवार :- 3%

जिलों में जनजाति :-

  • सर्वाधिक ⇒ जशपुर 
  • न्यूनतम ⇒ बेमेतरा 
  • % में सर्वाधिक ⇒ सुकमा 
  • % में न्यूनतम ⇒ रायपुर 

क्या आप जानते है ?

अनुसूची 5 के त्तहत्त राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ के निम्न जनजातियों को विशेष पिछड़ी जनजाति घोसित किया था ।

  1. अभुझमाड़िया 
  2. कमर 
  3. पहाड़ी कोरवा 
  4. बैगा 
  5. बिरहोर 
  6. भुंजिया – इन्हे राज्य सरकार ने किया था ।
  7. पंडो – इन्हे राज्य सरकार ने किया था ।


छत्तीसगढ़ जनजातियों के देवी देवता 

क्र जनजाति  छत्तीसगढ़ी देवी देवता 
1. गोंड  दूल्हा देव , सलना देवी , मेघनाथ 
2. बैगा  बूढ़ा देव , ठाकुर देव( साजा वृक्ष ) 
3. उराव  सरना देवी , धर्मेश देव ( साल वृक्ष )
4. मुड़िया  लिंगोपेन ( घोटुल ) 
5. भतरा  शिकार देवी ( माटी देव )
6. बिंझवार  विंध्यवासिनी देवी , 12 भाई बेटकर
7. कमर  छोटे भाई , बड़े भाई 
8. कवर  सगरा खंड 
9. कोरवा  खुड़िया रानी , गोरिया देव 
10. येरुंग पेंग  7 देवतावो का पूजा 
11. सारंग पेंग  6 देवतावो का पूजा 
12. सयुंग पेंग  5 देवतावो का पूजा 
13. नालूंग  पेंग  4 देवतावो का पूजा 
14. करम सैनी  कर्मा लोक नृत्य की इष्ट देवी 
15. शिव  हर तालिका का देवता 
16. आंगा देव  मंडई का देवता शिव 
17. दंतेश्वरी देवी  दशहरा  की देवी 
18. कोरकू  सिगरी देवी 
19. परधान  परसा पेन 
20. खड़िया  बंदा देव 
21. भरिया  बाघेश्वर देव , भीमसेन देव 
22. परजा / धुरवा  निशान मुंडा 
23. गरबा  बूढी देवी , ठकुरानी माता 

 

छत्तीसगढ़ जनजाति युवा गृह 

घोटुल ⇒ मुड़िया जनजाति का 

धूम कुरिया ⇒ उरॉव जनजाति का  

गीतोआना ⇒ बिरहोर जनजाति का 

घसर वसा ⇒ भुइया जनजाति का 

रंग बंग ⇒ भरिया जनजाति का 

धांगा बक्सर ⇒ परजा / धुरवा जनजाति का 

छत्तीसगढ़ जनजातियों का पेय पदार्थ 

गोंड ⇒ पेज पीते है ।

बैगा ⇒ ताड़ी  ( ताड व छिंद पेड़  से ) पीते है।

कोरवा ⇒ हंडिया पीते है ।

मुरिया / माड़िया ⇒  सल्फी ( ताड पेड़ से ) पीते है। 

उराव ⇒ कोसमा पीते है।

 

जनजातियों की कृषि पद्धत्ति 

जनजातियों की कृषि को झूम कृषि ( स्थानांतरित कृषि) कहते है । दो तीन वर्ष बाद दूसरे खेत में फसल उगते है ।

गोंड ⇒ धारिया पद्धत्ति 

बैगा ⇒ बेवर पद्धत्ति  

अभुझमाड़िया ⇒ पेद्दा  पद्धत्ति 

कमार/भतरा ⇒ दाहिया पद्धत्ति 

कोरवा ⇒ देवारी पद्धत्ति 

परजा/धुरवा ⇒  डोंगर , घड़ा , बेडा  पद्धत्ति 

भरिया ⇒ दाहिया पद्धत्ति 

छत्तीसगढ़ जनजातियों के कार्य 

क्र जनजाति  जनजातियों के कार्य 
1. बैगा  झाड़-फुक, मेडिसिन मन ऑफ़ बैगा ( पुजारी )   
2. हल्बा  कृषि कार्य करते है .
3. भतरा  सेवक का कार्य करते है .
4. कमार  बांस शिल्प कला का कार्य करते है ।
5. खैरवार  कत्था  का कार्य करते है ।
6. कोल कोयला का कार्य करते है ।
7. कंदरा  बांस से घरेलु सामान बनाते है । जैसे ( झउवा, टुकनी )
8. कवर  सैन्य का कार्य करते है ( कौरौवो के वंसज )
9. पारधी  पक्षी का शिकार करते है । ( मुख्यतः काली रंग की पक्षी )
10. अगरिया  लौह शिल्प का कार्य करते है ।
11. कोरकू  भूमि खोदने का कार्य करते है ।
12. खड़िया  पालकी ढ़ोने का कार्य करते है ।

छत्तीसगढ़ के जनजातियों के त्यौहार 

क्र त्यौहार/पर्व   जनजाति  महत्वा
1. आमा खाई  गोंड  आम फलने के बाद पूजा होता है ।
2. नावा खाई  गोंड  नया फसल आने के बाद ( भादो पूर्णिमा में )
3. माटी त्यौहार  गोंड  पृथ्वी देवी की पूजा होती है ।
4. मेघनाथ त्यौहार  गोंड  फाल्गुन माह में होता है ।
5. आमा   खाई  परजा , धुरवा  आम पकने के बाद किया जाता है ।
6. मंडई त्यौहार  मुड़िया/माड़िया  आंगादेव का पूजा किया जाता है ।
7. दियारी त्यौहार  माड़िया  पशुओ को खाना दिया जाता है ।
8. सरहुल त्यौहार  उराव  साल वृक्ष में फूल आने पर किया जाता है ।
9. धनकुल त्यौहार  हल्बा , भतरा  तीजा में होता है ।
10. कोरा , घेरसा , बीज बोनी  कोरवा  कृषि के समय होता है ।
11. रसनवा  बैगा  सभी पर्व में किया जाता है ।
12. अरवा तीज  सभी जनजाति  अविवाहित लड़कियों द्वारा बैशाख माह में होता है ।


बस्तर
का दशहरा

यह छत्तीसगढ़ का अद्वितीय सांस्कृतिक गुण है। राज्य के स्थानीय लोगों द्वारा पर्याप्त उत्साह के साथ मनाया जाता है, दशहरा का त्योहार देवी दंतेश्वरी की सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक है। दशहरा के दौरान, बस्तर के निवासी जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर में विशेष पूजा समारोह आयोजित करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि महाराजा पुरुषोत्तम देव ने पहली बार दशहरे के त्योहार की शुरुआत 15 वीं शताब्दी में की थी। इस । इस अवसर के पूरे दस दिनों के दौरान, बस्तर के सम्मानित राज परिवार पूजा सत्रों की व्यवस्था करते हैं जिसमें देवी दंतेश्वरी के प्राचीन हथियारों को दिव्य तत्वों के रूप में माना जाता है।

बस्तर दशहरा के निहित लक्षणों में से एक यह है कि राज्य का नियंत्रण औपचारिक रूप से जमींदार और समान महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों को गवाह के रूप में रखते हुए दीवान को हस्तांतरित किया जाता है।

कुंवर अमावस्या दशहरा का पहला दिन है। पहले दिन की रात नियंत्रण का प्रथागत हस्तांतरण होता है। इस समारोह की एक रहस्यमय विशेषता यह है कि दीवान को सत्ता सौंपने से पहले, माना जाता है कि आध्यात्मिक शक्तियों को रखने वाली लड़की से अनुमति मांगी जाती है।

इस लड़की को लकड़ी की तलवार के साथ देखा जाता है और युद्ध जैसी मुद्रा में खड़ा किया जाता है। दशहरे के दूसरे दिन को प्रतिपदा कहा जाता है जिसके बाद आरती और सलामी होती है।

नौवें दिन, बस्तर के राजा देवी दंतेश्वरी का स्वागत करते हैं जो डोली या पालकी में शहर के प्रवेश द्वार पर आती हैं। त्योहार के दसवें दिन को दशहरा कहा जाता है जब राजा एक दरबार का आयोजन करते हैं जहां लोग आते हैं और अपने अनुरोध पेश करते हैं।

यहाँ त्यौहार बस्तर के हिन्दुओ की आस्था का प्रतिक है जिसका डंका पूरी दुनिया में बजता है , इसे सभी हिन्दू चाहे वो ब्राह्मण हो या दलित या आदिवासी सभी हिन्दू इसे धूमधाम से मनाता है।

जनजाति विशेषताएं:-

  • छत्तीसगढ़ की जनजाति पितृ  सत्तामक है ।
  • छत्तीसगढ़ की जनजाति गोत्र ( गण चिन्हो , टोटम ) में बाटे होते है ।
  • गोत्र का विभाजन विब्भिन देवी देवताओ के हिसाब से किया जाता है ।
  • टेबू – धार्मिक निषेध है मत करो .
  • टेबू – अधिवासी समाज का यह अलिखित निषेधात्मक  कानून है ।
  • छत्तीसगढ़ में भूत  को मिर्चक कहते है ।
  • जनजातियों का समाज संयुक्त समाज होता है ।
  • बच्चो का नाम प्रकृति पर रखा जाता है ।
  • वृक्षों को जनजातीय समाज में माता पिता के समतुल्य मन जाता है ।

बोंगवाद :-

  • अदृश्य शक्ति  पर विश्वास किया जाता है ।
  • यहाँ मंत्र तंत्र का प्रयोग करते है ।
  • बोंगवाद को पवित्र आत्मा मन जाता है ।
  • बोंगवाद को बुराई पर अच्छाई की जीत मन जाता है ।

मृतक संस्कार :-

  • जनजातियों में मृतक को दफ़नाने व जलाने दोनों का प्रथा प्रचलित है ।
  • गोदो में चेचक व कोढ़ से मरने वालो को दफनाया जाता है ।
  • गोदो में पांच  वर्ष  से कम   उम्र  के बच्चे  को मृत्युपरांत  महुवा  वृक्ष के निचे  दफनाया जाता  है ।
  • मृतक गर्भवती महिला होने पर मृतक संस्कार शमशान घाट से दूर किया जाता है ।
  • मृतक संस्कार को कोरवा जनजाति नवाधावी कहते है ।

गोदना :-

  • गोदना को चिरसंगिनी आभूषण मन जाता है ।
  • गोदना जन जातियों का प्रमुख श्रृंगार है ।
  • गोदना के बिना  स्त्रियों का जीवन  अधूरा  माना जाता   है ।
  • महिलाओ को विवाह  के पूर्वा गोदना गोंडवाना  अनिवार्य है ।
  • घोटुल सदस्यों में गोदना श्रृंगार अधिक किया जाता है ।
  • बैगा विश्व की सर्वाधिक गोदना प्रिय  जनजाति है ।
  • माना जाता है की गोदना मृत्यु  पश्चात्  साथ में जाता है ।
  • गोदान गोदवाने से स्वर्गो में स्थान प्राप्त होता है ।
  • सुन्दर गोदना को ससुराल  में सौभाग्यशाली मन जाता है ।
  • गोदना के कारण महिलाओ को बाड़ी व गठिया रोग  नहीं होता है ।
  • देवा , बंजारा , कंजर लोग गोदना गोदने का कार्य करते है ।
  • कमार जनजाति सर्वाधिक गोदना  गोदवाने वाला जाती है ।

वाद्य यन्त्र :-

  • जनजातियों का 4 वाद्य यत्र होता है :- 1.तत वाद्य यन्त्र 2.वितत वाद्य यन्त्र  3.धन वाद्य यन्त्र  4.सुषिर वाद्य यन्त्र 
  • माँ दंतेश्वरी  मंदिर में पूजा के समय रायगढी वाद्ययंत्र बजाय जाता है ।
  • रायगढी पीतल का बना डमरू आकर का होता है ।
  • रायगढी के दोनों तरफ बकरे का चमड़ा गधा होता है ।
  • माँ दंतेश्वरी  मंदिर में पूजा के समाया नेफी , करतल व निरकाहली सुषिर बजाय जाता है ।
  • घंटी को गोंडी में मुयांग कहते है ।
  • मंजीरे नुमा वाद्ययंत्र को चित कुल कहते है ।
  • तिरडुड़ी  धन वाद्ययंत्र को मंदरी नृत्य  में महिलाये  बजती है ।
  • बिरिया ढोल का प्रयोग मंदरी नृत्य के दौरान किया जाता है ।

शिल्पकला :-

  • धरवा कला  शिल्प बस्तर के धरवा जनजाति द्वारा बनाई जाती है ।
  • भ्रष्ट मोम पद्धति का प्रयोग धरवा कला में होता है ।
  • इस  कला  में  धरवा, झारा, मलार,  कसर अदि जनजाति दक्ष  है ।
  • ढोकरा  कला  में मोम व् क्षय संयोजन  पद्धति से मूर्ति  निर्मित   की जाती है ।
  • भित्ति शिल्प में मिटटी व रंगो से घर  के दिवार को सजाया जाता है ।
  • काष्ठ कला में कौड़ी का प्रयोग करके शिल्प किया जाता है । 1.मिटटी शिल्प  2.कंघी शिल्प  3.बांस शिल्प  4.कोसा शिल्प  5.पत्ता शिल्प अदि शिल्प प्रचलित है ।
  • शिल्प गुरु राष्ट्रीय पुरस्कार तीन लोगो को मिला है ,  1.जयदेव बघेल   2.सोना बाई   3.गोविन्द राम झारा 


जनजातीय विवाह 

  • जनजातीय गोत्र बहिर्विवाह  का पालन करते है ।
  • एकल विवाह ( मोनोगेमि ) बहुविवाह ( पोलोगेमी ) दोनों मान्य है ।
  • सह गोत्री विवाह नहीं किया जाता है ।
क्र विवाह  जनजाति  महत्वा 
1. पयसोतूर/ अपहरण  गोंड  लड़कियों  का अपहरण करके विवाह किया जाता है ।
2. लमसेन सेवा चारधिया  गोंड  लड़का  पूरा  उम्र  लड़की के घर में गुजारता  है ।
3. पठौनी विवाह  गोंड  लड़की बारात  लेकर  लड़का के घर जाति है ।
4. दूध लौटावा विवाह  गोंड  ममेरे फुफेरे  के बच्चो  का विवाह होता है ।
5. भगेली विवाह  माड़िया  लड़की प्रेमी के घर रात में आकर रहने लगती   है ।
6. तीर विवाह  बिंझवार  लड़की का विवाह तीर के साथ किया जाता है ।
7. गन्धर्वा विवाह/ हरिबोल  परजा/ धुरवा    परजा धुरवा का यहाँ प्रेम विवाह है ।
8. हठ विवाह  सभी  जनजाति  सभी जनजाति लड़की  प्रेमी के घर में घुस जाति है ।
9. पैठुल विवाह  बैगा  एक प्रकार से प्रेम  विवाह है । 
10. ढुकु विवाह  कोरवा  एक प्रकार से प्रेम  विवाह है ।
11. क्रय विवाह सभी  जनजाति  लड़के  को उपहार  देकर  विवाह होता है ।
12. उर/ ऊना विवाह सभी  जनजाति  विधवा  विवाह होता है ।
13. पाटो विवाह सभी  जनजाति  पुनर्विवाह होता है ।
14. गुरावत/विनिमय  सभी  जनजाति  भाई बहनो  के बीच विनिमय होता है ।
15. पोता विवाह  कोरकू  अपने ही जाति में विवाह करना 

जनजाति गीत 

क्र गीत  जानकारी
1. छेरता गीत बस्तर अंचल छेर-छेरा (पौष पूर्णिमा) पर्व पर लड़को द्वारा किया जाता है  ।
2. तारा गीत बस्तर अंचल छेर-छेरा (पौष पूर्णिमा) पर्व पर लड़कियों  द्वारा किया जाता है  ।
3. रीलो गीत मुड़िया जनजाति द्वारा विवाह के अवसर पर गया जाता है ।
4. कोटनी गीत मुड़िया जनजाति को छोड़कर अन्य जनजाति द्वारा विवाह के अवसर पर गाया जाता है ।
5. करमा गीत कर्म देव  को  प्रसन्न  व  नै  फसल की ख़ुशी  में जनजाति द्वारा गया जाता है . 
6. चैत्य परब गीत बस्तर अंचल में चैत्र माह में गाया जाने वाला श्रीनगर प्रधान गीत है 
7. लेजा  गीत हल्बी जनजाति द्वारा किसी भी अवसर में गाया जाता है ।
8. धनकुल/जगार गीत  

हल्बी, भतरी, जनजाति द्वारा भादो, तीज  में गाया  जाता है ।  .

यहाँ हल्बी भाषा में होता है ।

9. भैना गीत   यहाँ भैना जनजाति द्वारा तंत्र मंत्र पर आधारित गीत है ।


जनजाति लोक नाट्य 

भतरा लोक नाट्य :-

  • भतरा जनजाति द्वारा किया जाता है (ग्रीष्म ऋतु में )
  • इसे उडीया नाट्य भी कहते हैं।
  • यह पौराणिक गाथा पर आधारित होता है।
  • इसमें मंचन होता है (युद्ध प्रधान)
  • इसमें पुरूष लोग महिला जैसे श्रृंगार करके मंचन करते हैं (सारे पुरूष होते है)
  • इसमें 20 से 40 कलाकार होते है।

मावोपाटा लोकनाट्य:-

  • यह मुड़िया जनजाति का शिकार नाट्य हैं।
  • इसमें टिमकी, कोटाइका, रस्सी का प्रयोग किया जाता है।
  • अंत में शिकार का भोजन बनाया जाता है।

खम्ब स्वांग लोक नाट्य :-

  • कोरकू जनजाति द्वारा क्वांर से कार्तिक माह तक मेघनाथ खम्ब के चारों ओर मंचन किया जाता है।
  • इसमें रावण पुत्र मेघनाथ की पूजा होती है।
  • कोरकू जनजाति मेघनाथ को अपना रक्षक मानते है।

दहिकांदो लोक नाट्य :-

  • बस्तर अंचल में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर किया जाता है।
  • यह करमा व रासलीला का मिश्रित रूप है।

कोकटी लोक नाट्य :-

  • जात्रा नृत्य के दौरान कोकटी-घोड़ा लोक नाट्य प्रचलित है।
  • इसे कोकटी-घोडा एक दूसरे से युद्ध करते है।
  • इसमें घोड़ा को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

नकटा-नकटी लोक नाट्य :-

  • छेरता गीत के दौरान नकटा नकटी लोक नाट्य प्रचलित हैं।
  • लड़का नकटा व लड़की नकटी की भूमिका निभाते हैं।

चीते मुखौटा लोक नाट्य :-

  • यह अबुझमाड़िया जनजाति द्वारा किया जाता है।

साम्भर लोक नाट्य :-

  • इसमें एक लड़का चील, एक लड़की मुर्गी बनता है।
  • शेष लड़के मुर्गी को घेरकर चील से रक्षा करते हैं।

पुत्तलिका लोक नाट्य :-

  • यह तारा गीत के दौरान लड़कियाँ घास से बनी पुतली को टोकरी में रख कर नाट्य करते हैं।


जनजाति लोकनृत्य

मांदरी नृत्य : (मुड़िया)

  • यह मुढ़िया जनजाति द्वारा किया जाता है।
  • यह गीत विहीन नृत्य है (वाय यंत्र-मांदर)

घोटुल क्या है :-

  • 12 वर्ष से कम उम्र के अविवाहित लड़का व लड़कियों को सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक परम्परा से सिंचित करना ।
  • महिलाओं को मोटियारिन व मुखिया को बेलोसा कहते है।
  • पुरूषो को चेलिस व मुखिया को सिरेदार कहते है।
  • गाँव में एक स्थान होता है जहाँ सभी उपस्थित होते हैं। इसी स्थान को घोटुल कहते हैं।
  • घोटुल को गोंगा स्थल भी कहते है।
  • घोटुल की स्थापना लिंगोपेन ने किया था।

ककसार नृत्य :- (मुड़िया)

  • यह नृत्य लिंगोपेन देव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
  • जीवन साथी प्राप्ति के लिए विशेष नृत्य किया जाता है।
  • इस नृत्य को जात्रा नृत्य भी करते है।

हुलकी पाटा नृत्य :- (मुड़िया)

  • यह सभी अवसर पर किया जाता है।

घोटुल पाटा नृत्य :- (मुड़िया)

  • यह मृत्यु के अवसर पर किया जाता है।
  • यह गोंडी भाषा में होता है।

एबलतोर नृत्य :- (मुड़िया)

  • मड़ई में आगा देव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।

गैंडी/डिटोंग नृत्य :- (मुड़िया)

  • इसमें केवल पुरूष भाग लेते है।
  • गेडी, हरेली त्यौहार में बनता है और नारबोद में ठंडा किया जाता है।

डंडारी नृत्य : (मुड़िया)

  • बस्तर अंचल में होली के पर्व में किया जाता है।

पूस कोलांग/ पूस कलंगा नृत्य :-

  • यह बस्तर अंचल का प्रसिद्ध नृत्य है।

गौर/बायसन नृत्य :- ( दण्डामी माड़िया)

  • इसमें बायसन हार्न के सींग को सिर में बाँधकर नृत्य किया जाता है।
  • इस नृत्य को येरियर एल्विन ने विश्व का सबसे सुंदरतम नृत्य कहा है।
  • बस्तर दशहरा में रथ के सामने यही नृत्य होते हुए आगे बढ़ता है।

करमा नृत्य : (बैगा)

  • यह नये फसल आने पर कर्म देव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
  • यह 4 प्रकार से होता है, 1. करमा खरी  2. करमा खाप 3. करमा लड़की  4. करमा लनी

बिल्मा नृत्य :- (बैगा)

  • दशहरा के अवसर पर किया जाता है।

सैला/डंड्रा नृत्य :- (बैगा)

  • कार्तिक  पूर्णिमा से फाल्गुन  पूर्णिमा तक किया जाता है।
  • यह मुख्यतः सरगुजा जिले में होता है।
  • इस नृत्य के दौरान लड़कियाँ मन पसंद जीवन साथी चुनते हैं।

सरहुल नृत्य :- (उरांव)

  • यह चैत्र पूर्णिमा में जैसे ही साल वृक्ष में फूल आते हैं पूजा-अर्चना के साथ नृत्य होता है।

सोहर /बार नृत्य :- ( कंवर)

  • यह किसी भी अवसर में किया जाता है।

थापड़ी नृत्य : (कोरकू)

  • यह बैशाख माह में लड़के पंचा व लड़कियाँ चितकोटा बजाते हुये नृत्य किया जाता है।
  • इसे ढांढल नृत्य भी कहते है।

दमनच नृत्य :- (कोरवा )

  • यह भयोत्पादक नृत्य होता है।
  • इसे विवाह के अवसर पर किया जाता है।

परब नृत्य :- (धुरवा)

  • इस नृत्य में पिरा मिड का निर्माण किया जाता है।
  • यह सैन्य नृत्य है ।
  • इसमें लड़के व लड़की दोनो रहते है।

कोल दहका नृत्य : (कोल)

  • यह किसी भी अवसर में किया जाता है।

दोरला / पैडुल नृत्य :- (दोरला)

  • यह विवाह के अवसर पर किया जाता है।

गांडा नृत्य :(गांडा)

  • यह सरगुजा जिले में अधिक प्रचलित है।
  • गांडा नृत्य विवाह के अवसर में लोग किराये पर ले जाते है।

भड़म नृत्य :- (भारिया)

  • यह सबसे लंबी समय तक चलने वाली नृत्य है।


जनजाति पुस्तक

क्र. रचनाकार पुस्तक
1. बेरियर एल्विनद
  • मुड़िया एण्ड देयर घोटुल ।
  • द अगरिया।
  • द गौर।
  • द बैगास।
2. चरण दुबे द कमार।
3.

P.V. नायक

द भील |
4. दयाशंकर नाग द ट्राईबल इकॉनामी।
5. M.C. राय द बिरहोर।
6. जार्ज ग्रियर्सन द माड़ियां गॉड्स ऑफ बस्तर।

 

जनजातियों को संवैधानिक अधिकार

क्र  अनुच्छेद प्रावधान
1. 164 (A) 

छ.ग., मध्यप्रदेश, उड़ीसा में अनुसूचित क्षेत्रों के राज्यों में

जनजाति मंत्री का प्रावधान है।

2. 244 6 वीं अनुसूची के तहत् स्वशासन का प्रावधान
3. 275 जनजातियों को अनुदान का प्रावधान।
4. 330 जनजातियों को लोकसभा में आरक्षण का प्रावधान।
5. 332 जनजातियों को विधानसभा में आरक्षण का प्रावधान।
6. 335 UPSC, PSC के पदों में आरक्षण का प्रावधान। 
7. 338(A) राष्ट्रीय जनजाति आयोग का गठन का प्रावधान
8. 342 जनजातियों पर राष्ट्रपति का अधिकार।

जनजाति प्राधिकरण

क्र  प्राधिकरण स्थापना

मुख्यालय

1. बिरहोर विकास प्राधिकरण 1978 जशपुर
2. अबुझमाड़िया विकास प्राधिकरण 1978 नाराणपुर
3. पहाड़ी कोरवा 1978

कोरबा

4. बैगा विकास प्राधिकरण 1990 कवर्धा
5. यस्तर/दक्षिण विकास प्राधिकरण 2004 जगदलपुर
6. सरगुजा उत्तरी /विकास प्राधिकरण 2004 अम्बिकापुर
7. पण्डो विकास प्राधिकरण 2005 अम्बिकापुर
8. भुजिया विकास प्राधिकरण 2005 रायपुर
9. कमार विकास प्राधिकरण 2006 गरियाबंद 
10. आदिम जाति शिक्षण संस्थान 2006 रायपुर
11. दण्डकारण्य विकास प्राधिकरण छ.ग., महाराष्ट्र, उड़ीसा, तेलंगाना का संयुक्त प्राधिकरण है।  

जनजातियाँ

आदिम जाति

केन्द्र सरकार द्वारा:-

1. अबुझमाड़िया

2. कमार

3. बिरहोर

4. बैगा ( पुरोहित )

5. कोरवा ( पहाड़ी )

राज्य सरकार द्वारा:-

1. भुंजिया

2. पण्डो

अबुझमाड़िया:-

  • यह बीजापुर जिला में सर्वाधिक पाया जाता है।
  • इसे हिल माड़िया भी कहते है। अबुझमाड़ की पहाड़ी में निवास करते है।
  • इनका निवास क्षेत्र परगना में बटा होता है। परगने के मुखिया को मांझी कहते है ।
  • अबुझमाड़िया अपने आप को मेटाभूम कहते है।
  • अबुझमाड़िया का अर्थ अज्ञात लोग
  • भारत सरकार नक्सलियों के कारण निवास क्षेत्रों का सर्वे नहीं कर पाया है।

बैगा :-

  • यह मैकाल श्रेणी में पाया जाता है।
  • यह गोड़ो की पुजारी का काम करता है।
  • बैगा जनजाति का भोजन
  • सुबह बासी।
  • दोपहर पेज।
  • रात्रि बियारी।
  • महिलाओं के वस्त्र को कपची कहते है।
  • खेत में हल नहीं चलाते क्योकि धरती माँ का सीना फट जाता है।
  • बैगा बच्चों के लिए विशेष स्कूल > उड़ान खोला गया है।
  • नक्सल प्रभावित बच्चों के लिए >प्रवास खोला गया है।

कोरवा (पहाड़ी) :-

  • अपना घर पेड़ के ऊपर बनाते हैं, जिसे मचान कहते है।
  • जमीन में सोना अशुभ मानते है।
  • कोरवा सिंगली व कोरबोर बोली बोलते है।
  • इनके पंचायत को मयारी कहते है।
  • पांच वर्ष होने पर लड़के के हाथ में 10 से 16 निशान आग से बनाते है, जिसे दरहा कहते है।
  • इनकी दो उपजाति है :- 1. पहाड़ी कोरवा 2. दिहाड़ी कोरवा

कमार :-

  • इनका मुख्य कार्य बाँस शिल्प तैयार करना है।
  • इनका शिल्प विश्व में प्रसिद्ध है।
  • इनके पंचायत को कुरहा कहते है।
  • धोड़े को छुना व दूसरे जाति से बाल कटवाना अपराध मानते है।
  • (मुखिया को कुरहा कहते है)
  • अपने आप को कौरवों का वंशज मानते हैं।
  • घर में मृत्यु होने पर घर का त्याग करते है। कमार की दो उपजाति है 1. मकाड़िया 2. बुधरजिया।
  • मकाड़िया चंदर का माँस खाते हैं। (बुंधरसिया नहीं)

बिरहोर :-

  • यह छ.ग. की विलुप्त होने वाली जनजाति है।
  • यह मुख्यतः झारखण्ड की जनजाति हैं।
  • बिरहोर का अर्थ> बनचर होता है।

भुंजिया:-

  • यह रोगो का उपचार तपते लोहे से करते हैं।
  • इसकी दो उपजाति है 1. छिन्दा भुंजिया 2. चौखटिया भुंजिया
  • रसोई घर को “लाल बंगला” कहते है।

पण्डो :-

  • पाण्डवों को अपना वंशज मानते है।
  • इसे रूढ़िवादी जनजाति मानते है।

गोड़ :-

  • छ.ग. में इसकी 30 शाखाएँ पायी जाती है।
  • घर के दीवारों पर नोहडेरा चित्रकारी करते है।
  • मेघनाथ को अपना देवता मानते है।
  • गोड़ की 41 उपजाति छ.ग. में पायी जाती है।
  • गोड़ की दो उपवर्ग है 1. राजगोड़ 2. धुरगोड़ गोड़ बस्तर संभाग में अधिक पाये जाते है।
  • गोड़ जाति का मूल नाम कोईतोर है।
  • गोड़ शब्द की उत्पत्ति तमिल भाषा से हुई हैं।

हल्बा :-

  • हल वाहक होने के कारण हल्बा नाम पड़ा।
  • इनमें टोडम (एक रस्म) को बरग कहते है।
  • यह जनजाति अधिकतर कबीर पंथी होते है।
  • यह सर्वाधिक सम्पन्न जनजाति है।

दण्डामी माड़िया :-

  • जंगल में पृथक झोपड़ी बना कर रहते हैं, जिसे सिहारी कहते है।
  • इनका मकान पाँच भागों में बटा रहता है।
  • 1. अहगी 2. अहपानी 3. आगता, 4.मेंटम 5 बेडूकुरमा
  • मृतक स्तंभ का प्रयोग करते है।

मुड़िया / मुरिया:-

  • मुड़िया शब्द की उत्पत्ति मुड़ शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ पलास वृक्ष होता है।
  • मुड़िया संस्कृति को राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पहचान प्राप्त है।
  • मुड़िया जनजाति लकड़ी शिल्पकला में पारंगत होती है।

उराव :-

  • यह जनजाति सर्वाधिक शिक्षित है।
  • इस जनजाति में सर्वाधिक धर्मांतरण हुआ है।
  • इनकी प्रमुख भाषा कुरुख हैं
  • नृत्य के मैदान में अखाड़ा करते है।
  • इसके प्रमुख देवता धर्मेश है जिसे सूर्य देव का रूप माना जाता है।
  • इसके पूजा स्थल को बगिया कहते है।
  • घुमकुरिया के मुखिया को थांगर महतो कहते है।
  • विरह गीत गाते है।
  • ग्राम के प्रमुख को मांझी कहते है।
  • पारंपरिक पोशाक को करेया कहते हैं
  • राजमहल की पहाड़ियों में निवास करते है।

भतरा :-

  • भतरा शब्द की उत्पत्ति भृत्य शब्द से हुई है।
  • इसका प्रमुख कार्य सेवक व नौकर कार्य करना।
  • यह जनजाति उड़ीसा से प्रेरित है।
  • अन्नमदेव के साथ वारंगल से बस्तर आये थे।

बिंझवार :-

  • तीर इनका जाति चिन्ह है।
  • इनके महासभा को कोटा सागर कहते है।
  • बिंझवार जनजाति बालाघाट के लाफा से आये है।
  • शबरी बोली बोलते है।

कोरकू :-

  • इसमें पोटा विवाह प्रचलित है।
  • जातीय संस्कार को पोथड़िया कहते है।

परधान :-

  • इन्हें पटरिया भी कहते है।
  • यह जनजाति गोड़ राजाओं के प्रशस्ति गीत गायक थे।

सौंता :-

  • एकमात्र कटघोर तहसील में है।
  • यह विलुप्त होती जनजाति है।

सांवरा :-

  • सांप पकड़ने के कारण सांवरा कहते है।
  • अपना पूर्वज शबरी को मानते है।

कँवर :-

  • शबरी बोली बोलते है।
  • अपने आप को कौरवों का वंशज मानते है।
  • इनका पैतृक समूह को गोटी कहते है।
  •  महिलाएँ सीने में कृष्ण का रूप गोदना गोदवाते है ।

अगरिया :-

  • लोहे गलाने के कारण अगरिया नाम पड़ा है।
  • इनमें उड़द दाल का विशेष महत्व होता है।

नगेशिया :-

  • शबरी बोली बोलते है।

विवाह के दौरान वर के पैर में तेल, सिंदर लगाते हैं।

खैरवार :-

  • खैर के पेड़ से कत्था बनाने का कार्य करते है।

पारधी :-

  • पारधी मराठी शब्द पारधू से है।
  • केवल काले पक्षियों का शिकार करते है।

खड़िया :-

  • पालकी उठाने का कार्य करते है।

बिरजिया :-

  • इस जनजाति को “जंगल का मछली” कहते है।

भारिया :-

  • इनके निवास स्थल को ढाना कहते है।
  • लकड़ी के दरवाजे में शिल्पकारी करने में इन्हें महारत हासिल है।
  • बाघ न खाए कहकर बापेश्वर देव की पूजा करते है।
  • भीम सेन देव को विवाह का वरदान मानते है।
  • गांव के सीमा पर मुठया चबुतरा बनाया जाता है।

कंध :-

  • इसे खोड़ या कोण्ड जनजाति कहते है।

कोल :-

  • यह विलुप्त होती जनजाति है।
  • कोयला का कार्य करते है।

धनवार :-

  • इन्हें धनुवर भी कहते है।
  • धनुष चलाने में निपुण होते है।

गदबा / गड़वा :-

  • बोझा ढोने का कार्य करते है।
  • अपने आप को गुडन कहते है।

परजा / धुरवा :-

  • इनके पंचायत को वेरना मुण्डा कहते है।
  • ग्राम मुखिया को मडुली कहते है।
  • धार्मिक कार्य के लिए प्रसिद्ध है।
  • परजा जाति का प्रिय व्यसन गुड़ाखू करना है।
  • ग्राम वैध  (बैंगा) को दिसारी व गुरमेन कहते हैं।
  • शुद्धीकरण करने वाले को महानायक कहते है।

भैना :-

  • यह बैगा व कंवर का मिश्रित प्रजाति है।
  • यह सिर्फ मुंगेली जिला में पाया जाता है।

दोरला / कोया / कोयतूर:-

  • यह सुकमा के गोदावरी क्षेत्र में निवास करती है।

मंझवार :-

  • गोड़, मुण्डा, कंवर की मिश्रित जनजाति है।
  • इन्हे मांझी व माझिया भी कहते है।

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