सत्यभामा आदिल का जीवन परिचय | Satyabhama Adil ka Jivan Parichay

सत्यभामा आदिल का जीवन परिचय | Satyabhama Adil ka Jivan Parichay

सत्यभामा आडिल का जन्म दुर्ग जिले के ग्राम पुन्दर में 1 जनवरी, सन् 1944 को हुआ था। आपने 1965 में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से एम. ए. हिन्दी की उपाधि धारण की।

सन् 1972 में आपने पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। म. प्र. शासन पंचायत विभाग द्वारा सन् 1976 में आपका ‘क्वॉर की दुपहरी’ काव्य पुरस्कृत हो चुका है। आपको पंडित शारदा प्रसाद तिवारी सम्मान तथा ‘ग्राम भारती’ सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है।

आपकी छत्तीसगढ़ी रचनाओं में छत्तीसगढ़ की घरा की सोंधी महक है। उसमें अपने समाज को समझने, समझाने और सुन्दर रूप में परिवर्तित करने का प्रयास दिखता है।

 

रचनाएँ  प्राकृतिक साहित्यिक कृतियाँ
काव्य (हिन्दी) : निःशब्द सृजन, क्वॉर की दुपहरी, काला सूरज
उपन्यास (हिन्दी) : प्रेरणा बिन्दु से निर्वेद तट तक, एक पुरुष।
नाटक (हिन्दी) : बुतखाना , वंशनाम, अभिशप्ता।
छत्तीसगढ़ कथा साहित्य : गोठ, सउत कथा। :
शोध प्रबन्ध : संत धर्मदास व्यक्तित्व व कृतित्व – निर्देशक डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र।
सन्दर्भ ग्रन्थ : 1. छत्तीसगढ़ लोक साहित्य और नव जागरण।
2. छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की ‘जमीन’ ।
3. छत्तीसगढ़ी भाषा एवं साहित्य ।

गवेषणात्मक और विवेचनात्मक शैली में रचे गए आपके निबन्ध पूर्ण मौलिक हैं। उनमें आपके व्यक्तित्व की छाप दिखाई देती है। आपका सम्पूर्ण साहित्य निबन्ध और आलोचना के रूप में ही है।

आप छत्तीसगढ़ी की स्वछंदतावादी और मुक्तक समीक्षक कही जाती हैं। आपके निबन्धों में आपका स्वच्छंदवादी दृष्टिकोण सभी स्थानों पर दृष्टिगोचर होता है। आपकी समीक्षा शैली मधुर और सशक्त है।

पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर आपके उच्चकोटि के गवेषणात्मक और विवेचनात्मक निबन्ध छपते रहे हैं। आपने प्रायः सभी निबन्ध साहित्यिक विषयों पर ही रचे हैं। कुछ निबन्ध ही दार्शनिक, सामाजिक और पात्र सम्बन्धी विषयों पर मिलते हैं, इनमें आपका व्यक्तित्व सामने आ गया है।

मौलिकता और स्पष्टता आपके निबन्धों और आलोचनाओं के प्रमुख गुण है। कठिन से कठिन विषय को भी आप सरल शब्दों में भली प्रकार प्रस्तुत कर देती हैं। इसका प्रमुख कारण आपका अध्यापकीय व्यक्तित्व है।

निबन्धों और आलोचनाओं में आपकी निजी अनुभूतियाँ और स्वतन्त्र निर्णय की शक्ति अपना विशेष स्थान रखती हैं आपकी चिन्तनधारा में सूक्ष्म और पैनी दृष्टि भी पाई जाती है।

आपने छत्तीसगढ़ी गद्य और पद्य दोनों ही प्रकार के साहित्य की प्रश्नावली रचना व समीक्षा की है। आधुनिक काव्यधाराओं में आपने छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद आदि का तात्विक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। इनमें प्रयोगवाद पर आपने बड़े ही सुन्दर विचार प्रकट किए हैं।

आडिल जी अध्ययनशील विचारधारा की है। जीवन के प्रारम्भ में ही उनका रुझान साहित्य सेवा की ओर परिलक्षित होता है। छात्र जीवन में ही इन्होंने निबन्ध लिखना प्रारम्भ कर दिया था।

इनका यह कार्य हिन्दी की अद्वितीय सेवा के रूप में चिरस्मरणीय रहेगा। इनके अलावा आपने स्वतन्त्र मौलिक ग्रन्थों की रचना भी की है। इन्होंने कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों में काएँ भी रची हैं। आप आलोचकों के रूप में प्रसिद्ध हैं। आडिल जी के कृतित्व को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं- मौलिक, सम्पादित और संकलित।

भाषा एवं शैली – आडिल जी गम्भीर प्रकृति की रचनाकार हैं। अतः उनकी प्रकृति के अनुरूप उनकी भाषा भी है। उनकी भाषा में छत्तीसगढ़ी तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग है, किन्तु वे क्लिष्ट नहीं हैं।

वे सरस और कोमल हैं, उनमें एक साहित्य सौष्ठव के दर्शन होते हैं, उनके वाक्य छोटे-छोटे, योजनाबद्ध और शुद्ध हैं। उनमें प्रवाह सौष्ठव, भाव व्यंजकता के दर्शन सभी जगह दिखाई देते हैं।

आडिल जी की शैली गम्भीर, प्रवाहमयी, सरस और भावाभिव्यंजक है। इनकी शैली दो रूप दिखाई देते हैं

व्याख्यात्मक शैली और विवेचनात्मक शैली– आपने शुक्ल जी की समीक्षा शैली से ऊपर उठने का भी प्रयत्न किया है तथा उससे अपनी मौलिकता प्राप्त है। सत्यभामा की शैली के तथ्य निरूपण का ढंग विशिष्ट होता है।

उनका तथ्य निरूपण स्पष्ट एवं प्रभावपूर्ण है। वह क्रमिक और विकासात्मक है। कहीं-कहीं वह तुलनात्मक भी दिखाई देता है। भाव-विभोर के भी दर्शन यत्र-तत्र होते हैं, व्यंग्य करने से भी वे नहीं चूकती।

शैली में रचनाकार के व्यक्तित्व की पूर्ण अभिव्यक्ति होती है। आपके व्यक्तित्व की गुरुता और गम्भीरता के कारण आपकी शैली भी बड़ी गम्भीर है। उसमें कहीं भी शैविल्य और हल्कापन नहीं है।

आपकी शैली सर्वत्र सशक्त और प्राणमयी रही है। उसमें ओजस्विता और स्पष्टता दिखती है। आपका व्यक्तित्व स्वच्छन्दतावादी होते हुए भी सर्वत्र मर्यादित और सन्तुलित रहा है।

आपने प्राचीन समीक्षा सिद्धान्तों और रूढ़ियों के प्रति विद्रोह व्यक्त किया है। नवीन-युग के अनुरूप नई मान्यताओं की स्थापना करने का आपका अभिनव प्रयास दिखाई देता है।

 

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