सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh Sahariya Tribe Chhattisgarh

सहरिया जनजाति का परिचय 

सहरिया मध्य प्रदेश की एक विशेष पिछड़ी जनजाति है। मध्य प्रदेश में 2011 की जनगणना में सहरिया जनजाति की जनसंख्या 614958 दर्शित है। इनमें पुरुषों की जनसंख्या 316541 तथा स्त्रियों की जनसंख्या 298417 थी। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

मध्य प्रदेश में सहरिया जनजाति सीहोर जिले से लेकर उत्तरी-पश्चिमी विदिशा, गुना, शिवपुरी और मुरैना के श्योपुर, विजयपुर, कराहल एवं ग्वालियर जिले में निवास करते हैं।

जनगणना 2011 में सहरिया जनजाति की जनसंख्या छत्तीसगढ़ में 165 दर्शाई गई है। इनमें पुरुष 92 तथा स्त्रियाँ 73 हैं। मध्य प्रदेश राज्य विभाजन में इस जनजाति के कुछ परिवार शासकीय कर्मचारी के रूप में छत्तीसगढ़ में निवासरत हैं, ऐसा प्रतीत होता है। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

सहरिया शब्द की उत्पत्ति फारसी के “सहर” शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है जंगल अर्थात् जंगल में रहने के कारण इन्हें सहरिया कहा गया है। इनकी उत्पत्ति संबंधी कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। किन्तु सहरिया की उत्पत्ति के संदर्भ में अनेक दंत कथायें प्रचलित हैं। संक्षिप्त लोक कथानुसार एक सहरिया व भील दो बहनों की संतान हैं। बड़ी बहन भोलनी से भील व छोटी बहन सीरिया से उत्पन्न संतान सहरिया कहलाई।

सहरिया जनजाति का रहन-सहन 

सहरिया जनजाति समतल मैदानी क्षेत्र में रहते हैं। जहाँ यह रहते हैं, वहाँ बसे घरों के समूह को ” सहराना” कहा जाता है। सहरिया अपनी बस्ती में घर अलग-अलग न होकर एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। मानों एक लम्बे घर की छत से जान पड़ते हैं। बड़े गाँवों में कई “सहराना” होते हैं। सहराने के मध्य एक गोलाकार बैठक का स्थान होता है। इसे बैठक या बंगला कहा जाता है। बंगला का उपयोग सामाजिक बैठकें, विवाद आदि निपटाने तथा अतिथियों के विश्राम के लिए किया जाता है।

इस जनजाति के लोग प्रातः बबूल या नीम के दातुन से दाँत साफ करते हैं तथा स्नान करते हैं। पुरुष सिर के बाल कटाते हैं। महिलाएँ चोटी या जूड़ा बनाती हैं। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

सहरिया पुरुष कुर्ता, कमीज (सलूको) तथा नीचे तक धोती पहनते हैं। सहरिया स्त्रियाँ घाघरा लुगड़ा, पोलका, ब्लाउज, अँगिया, पेटीकोट (नूरा) पहनती हैं। सहरिया महिलाएँ सिर पर बोर, राखड़ी, कान में पीपर पत्ता, गुड्डी, एरन, बाली, नाक में चांदी या पीतल की लौंग, गले में खेगवारी- (हंसली), खंगाड़ी, बजट्टी मोती व रुपयों की माला, कठला लढ़, भुजा पर बरा, बाजू कड़ा, हाथ में चूरा, बंगड़ी हार, पटेलिया, हथफूल, कमर में करधोनी, लछा, नेवरी, पायजेब, पैरों को उँगलियों में फोलरी, बिछिया पहनती हैं।

इनके आभूषण चाँदी, गिलट या नकली चाँदी के होते हैं। सहरिया बालिकाएँ 6 से 10 वर्ष की अवस्था से ही गुदना गोदवाना प्रारम्भ करती हैं। इनमें मान्यता है कि गुदना वह आभूषण है, जो मृत्यु के पश्चात् भी शरीर के साथ जाता है। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

इनके घरेलू वस्तुओं में मिट्टी के बर्तनों में पानी पीने का कुल्ला खाना खाने का शकरो, खाना बनाने के लिए मिट्टी की ढाण्डी तथा कुछ एल्युमिनियम व पीतल के बर्तन होते हैं। अनाज रखने की मिट्टी की कोठी (पेई) तथा सीमारी पेड़ की कच्ची पतली टहनियों से स्वनिर्मित डलिया होता है। कृषि उपकरण भी घर में पाये जाते हैं।

इनका मुख्य भोजन ज्वार, मक्का, गेहूँ की रोटी, मौसमी सब्जी, उड़द, चना, अरहर की दाल खाते हैं। मांसाहार में मुर्गा, बकरा, मछली आदि कभी-कभी खाते हैं। महुए की शराव बनाकर पीते हैं। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

सहरिया जनजाति का व्यवसाय 

सहरिया जनजाति के पास कृषि भूमि कम है। इसमें मक्का, ज्वार, उड़द आदि बोते हैं। इस जनजाति के अधिकांश लोग मजदूरी करते हैं। जंगल से लकड़ी काटकर उसके गठ्ठे बनाकर बेचना भी इनका प्रमुख कार्य है। बरसात में मछली पकड़ते हैं। पक्षियों को पकड़ने के लिए फन्दों का उपयोग करते हैं।

सफेद मूसली (जड़) महुआ एवं गुल्ली, गोंद एवं शहद एकत्र करना एवं तेंदू पत्तों का संग्रह, कंदमूल, फल आदि समीप के वनों से प्राप्त करते हैं। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

सहरिया जनजाति के उपजाति एवं गोत्र 

सहरिया जनजाति पितृवंशीय, पितृसत्तात्मक, पितृ निवास स्थानीय जनजाति है। इनमें उपजाति पाये जाने का उल्लेख नहीं मिलता। यह जाति विभिन्न बहिर्विवाही गोत्रों में विभक्त है। इनके गोत्रों में (1) अतरिया (अतर का पेड़), (2) डोंगिया (जंगल), (3) बदरेटिया (चरवाह) (4) बड़ोदिया (बड़ का पेड़), (5) सोलकिया (सलाई का पेड़). (6) बगुलिया (बगुला पक्षी), (7) बाजुल्ला (बाज पक्षी), (8) डोमरिया (महुआ का फूल), (9) पमार (एक प्रकार की घांस), (10) सेमलिया (सेमल का फूल), (11) खजूरिया (खजूर का पेड़), (12) कुसमोरिया (कुसुम का पेड़), (13) सिलोरिया, (14) कछवारिया, (15) सोलंकी, (16) चौहान, (17) डेगिया, (18) डोगिया, (19) रजोरिया, (20) मसूरिया गोत्र प्रमुख रूप से पाये जाते हैं।

सहरिया जनजाति के परम्पराए 

सहरिया जनजाति की गर्भवती महिलाएँ प्रसव के दिन तक अपनी आर्थिक तथा पारिवारिक कार्य करती हैं। गर्भावस्था में कोई संस्कार नहीं किया जाता। प्रसव के लिये घर या पड़ोस की सयानी औरतों को बुलाया जाता है शिशु की नाल (नार) काटकर के कोने में गड़ाते हैं। जन्म स्थान को गोबर से लीपा जाता है।

तिल्ली के तेल में अजवाइन को गर्म कर माँ व बच्चे की मालिश की जाती है। तीन दिनों तक सोर रहता है। चौथे दिन घर को लीपा जाता है। लगभग छः माह बाद बच्चे का नामकरण करते हैं। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

सहरिया जनजाति में विवाह उम्र लड़कों का 14-15 वर्ष तथा लड़कियों का वर्ष पायी जाती है। घर के पिता रिश्तेदारों से लड़की का पता ज्ञात कर लड़की देखने जाता है। पसंद आने पर सवा पांच रुपया नेग देता है। तत्पश्चात् सगाई करते हैं। इसमें तुगड़ा, पोलका, घाघरा वधू को दिया जाता है। अनाज व नगद रुपये वध मूल्य लिया जाता है। विवाह में दोनों पक्षों में हल्दी रस्म के बाद बारात वधू के घर जाती है। जाति के बुजुर्ग के मार्गदर्शन में फेरा का रस्म होता है। विवाह के 1-2 वर्ष बाद गौना होता है।

सहरिया में मृतक को जलाने व छोटे बच्चों को दफनाने की प्रथा है। शोक अवस्था में तीन दिन रसोई में खाना नहीं तीन दिन बाद शुद्धि हेतु घर लीपा जाता है। महिला मृत्यु पर 11वें दिन तथा पुरुष मृत्यु पर 13वें दिन तेरहवीं की जाती है। सहराना के लोगों तथा रिश्तेदारों को मृत्यु भोज कराते हैं। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

सहरिया जनजाति में परम्परागत जाति पंचायत पाई जाती हैं। जाति पंचायत प्रमुख जाति पटेल कहलाता है। इस पंचायत में विवाह, तलाक, अनैतिक संबंध आदि विवादों का परम्परागत तरीके से निर्णय किया जाता है।

सहरिया जनजाति के देवी-देवता और त्यौहार 

इनके मुख्य देवी-देवताओं में ठाकुर देव, भेरूबाबा, भूमिया देव, रामदेव, आसमानी माता, दुर्गा माता, नरसिंह देव, बड़ बाबा आदि हैं। हिन्दू देवी-देवता राम, कृष्ण, हनुमान, गणेश, शिव आदि की भी पूजा करते हैं।

त्योहारों में दिवाली, हरियाली, रक्षाबंधन, होली आदि प्रमुख हैं। जादू-टोना मंत्र, भूत-प्रेत पर विश्वास रखते हैं। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

लोकगीतों में होली में रसिया, फाग लहंगी रागनी फाग, विवाह में हल्दी गीत, भतैया गीत, जेवनार, बन्ना बन्नी, बरात अगवानी तथा गारगीत, बधाई, कन्हैया गीत, आदि प्रमुख है। नृत्य में तथा राई नृत्य प्रमुख है।

2011 की जनगणना अनुसार मध्य प्रदेश के सहरिया जनजाति में साक्षरता 42.1 प्रतिशत दर्शित है। पुरुषों में साक्षरता 51.7 प्रतिशत तथा महिलाओं साक्षरता 32 प्रतिशत थी। ( सहरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Sahariya Janjati Chhattisgarh sahariya tribe chhattisgarh )

छत्तीसगढ़ में निवासरत सहरिया जनजाति परिवारों में 2011 में साक्षरता 80.9 प्रतिशत दर्शित है। पुरुषों में साक्षरता 90.8 प्रतिशत तथा स्त्रियों में 68.3 प्रतिशत थी। इससे प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ में इस जनजाति के कर्मचारी परिवार मध्य प्रदेश से प्रवर्जित होकर नौकरी के लिए अपने परिवार के साथ निवासरत हैं।

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source : Internet

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Rajveer Singh
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