महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ | Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh

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Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev
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विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ | Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh , Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Samman के बारे में तो चलिए शुरू करते है ।

 महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ | Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh

रामानुज प्रताप सिंहदेव का जन्म 8 दिसंबर सन् 1901 ई. को छत्तीसगढ़ के उत्तर में स्थित कोरिया रियासत की राजधानी बैकुंठपुर में हुआ था। पता शिवमंगल अत्यंत न्यायप्रिय तथा | कर्तव्यनिष्ठ राजा थे। पिताजी के | देहावसान के बाद मात्र आठ वर्ष में रामानुज राजगद्दी पर नाबालिग होने के कारण कोरिया को न्यायिक अभिरक्षा के अंतर्गत ले लिया गया।

राज्य की शासन व्यवस्था रायपुर स्थित पोलिटिकल एजेंट द्वारा अपने अधीक्षक के माध्यम से होने लगी प्रारंभिक शिक्षा बैकुंठपुर में पूरी कर आगे की पढ़ाई के लिए 1911 ई. में रायपुर के राजकुमार कॉलेज में भर्ती हो गए। 1920 ई. चीफ कालेज का डिप्लोमा में उन्होंने पूरे भारत में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसी वर्ष छोटा नागपुर की राजकुमारी | (   महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh , Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Samman Maharaja Ramanuj pratap singhdev award )

दुर्गादेवी के साथ उनका विवाह हुआ। बाद इलाहाबाद के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लिए। 1922 ई. में इंटरमीडिएट पास कर इलाहाबाद विश्व विद्यालय में प्रवेश लिया तथा 1924 में बी.ए की। नागपुर में आयोजित चतुष्कोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दू दल में वे आरंभिक बल्लेबाज के रूप में महान खिलाड़ी सी. के. नायडू के साथ पारी की शुरूआत करते थे।

इलाहाबाद में पं. मदनमोहन मालवीय उनके स्थानीय अभिभावक थे। यहीं वे पं. मोतीलाल नेहरू, पं. जवाहरलाल नेहरू तथा डी. पी. मिश्रा के संपर्क में आए। पाँच जनवरी सन् 1925 ई. को मध्यप्रांत एवं बरार के तत्कालीन गवर्नर सर फेंकस्लाई ने रामानुज प्रताप सिंहदेव को संपूर्ण प्रशासनिक अधिकार सौंप दिए। तत्पश्चात् बैकुंठपुर में उनका विधिवत् राजतिलक हुआ। राज्य की जिम्मेदारी संभालने आगे बढ़ाया।

रामानुज प्रताप सिंहदेव के प्रयासों से सन् 1946 ई. में कोरिया राज्य में प्रौढ़ शिक्षा के 64 केंद्र संचालित थे। रामानुज प्रताप सिंहदेव ने बैकुंठपुर में एक हाईस्कूल खोला जो आज शासकीय बहु-उद्देशीय उच्चतर माध्यमिक कहा जाता है। सभी विद्यालयों में उन्होंने एक-एक लघु ग्रंथालय की स्थापना की। इसमें किताबों की अदला-बदली कर स्कूली विद्यार्थियों को पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाएँ उपलब्ध कराई जाती थी।(   महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh , Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Samman Maharaja Ramanuj pratap singhdev award )

उन्होंने कई ऐसे छात्रावास खोले, जहाँ गरीब बच्चों को निःशुल्क, भोजन, वस्त्र एवं पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती थी। राज्य के बाहर उच्च शिक्षा के लिए जाने वाले विद्यार्थियों को विशेष | छात्रवृत्ति दी जाती थी। उन्होंने राज्य में कई तालाब तथा कुएँ खुदवाए। बैकुंठपुर, मनेंद्रगढ़, सोनहत तथा चिरमिरी में चिकित्सालय खोले। सन् 1945 ई. में आयुर्वेदिक दवा निर्माण केंद्र की स्थापना की।

रामानुज प्रताप सिंहदेव ने सन् 1925 ई. में सहकारिता आंदोलन के समय किसानों को यथा संभव सहायता की। उन्होंने अपने राज्य में छह राजकीय कृषि फार्म बनवाए। यहाँ से किसानों को धान, गेहूँ, तिलहन एवं दलहन के उन्नत बीजों का विकास कर कृषकों को दिया जाता था। किसानों को न्यूनतम ब्याज पर कृषि उपकरण एवं पशु खरीदने के लिए ऋ उपलब्ध कराया जाता था।(   महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh , Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Samman Maharaja Ramanuj pratap singhdev award )

रामानुज प्रताप सिंहदेव के प्रयासों से सन् 1928 ई. में क्षेत्र की पहली कोयला खदान का खरसिया एवं चिरमिरी में शुभारंभ किया गया। यहाँ कामगारों के हित एवं सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए। उन्हीं के प्रयासों से सन् 1928 ई. में बिजूरी से चिरमिरी तक रेल्वे लाइन बिछाने का कार्य आरंभ हुआ। सन् 1930 ई. में मनेंद्रगढ़ तक रेलसेवा एवं सन् 1931 ई. में चिरमिरी रेलसेवा प्रारंभ हुआ।

सन् 1931 ई. में लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधीजी के नेतृत्व में सम्मिलित कांग्रेस दल में भारतीय शासकों का प्रतिनिधित्व रामानुज प्रताप सिंहदेव ने ही किया । रामानुज कुशल वक्ता होने के साथ-साथ एक अच्छे लेखक भी थे। अपने महल में एक समृद्ध ग्रंथालय की स्थापना की यहाँ बैठकर पढ़ते-लिखते वे सन् 1931 से सन् 1941 तक अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के उपाध्यक्ष थे। (   महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh , Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Samman Maharaja Ramanuj pratap singhdev award )

सन् 1942 ई. में उनके राज्य में अकाल पड़ा। तब उन्होंने बर्मादेश (वर्तमान म्यंमार) से चावल आयात कर गरीबों में वितरित करने की व्यवस्था की। 15 दिसंबर सन् 1947 ई. को उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल के समक्ष मध्यप्रांत एवं बरार में कोरिया के विलयन अनुबंध पत्र हस्ताक्षर किया। उन्होंने सन् 1948 ई. में मध्य प्रांत, बरार द्वारा नियुक्त प्रषासक को महल को छोड़कर सारे भवन और कोरिया स्टेट खजाने की 1.20 करोड़ रूपये की राशि जमा करा दी। बाद में वे कोलकाता फिर पुणे चले गए। अब उनका अधिकांश समय चित्रकारी एवं फोटोग्राफी में बीतने लगा। 6 अगस्त सन् 1954 ई. को मुंबई में उनका देहावसान हो गया।

छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में श्रम एवं उत्पादकता वृद्धि के क्षेत्र में अभिनव प्रयत्नों के लिए राज्य स्तरीय महाराज रामानुज प्रताप सिंहदेव सम्मान स्थापित किया है।(   महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव छत्तीसगढ़ Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Chhattisgarh , Maharaja Ramanuj Pratap Singhdev Samman Maharaja Ramanuj pratap singhdev award )

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Rajveer Singh
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