कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh

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पहाड़ी कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Pahadi korva janjati chhattisgarh pahadi korva tribe chhattisgarh
कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़  korva janjati chhattisgarh korva tribe chhattisgarh

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh  के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa Janjati Chhattisgarh korwa Tribe Chhattisgarh

कोरवा जनजाति की उत्पत्ति 

कोरबा छत्तीसगढ़ की जनजाति है। इनकी जनसंख्या बिहार में भी पाई जाती है। 2011 की जनगणना अनुसार इनकी छत्तीसगढ़ में 129429 दर्शित है। इनमें पुरुष 64866 तथा स्त्रियाँ 64563 थी। राज्य में कोरवा जनजाति मुख्यतः सरगुजा, बलरामपुर, जशपुर, रायगढ़ तथा कोरबा जिले में निवासरत है। ( कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh )

कोरवा जनजाति के उत्पत्ति के संबंध में ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है, किन्तु कोलारियन समूह से निकली जाति माना है। किवदन्तियों के आधार पर अपनी उत्पत्ति राम-सीता से मानते हैं। वनवास काल में राम, सीता व लक्ष्मण धान के एक खेत के पास से गुजर रहे थे।

पशु-पक्षियों से फसल की सुरक्षा हेतु एक मानवाकार पुतले को धनुष-बाण पकड़ाकर खेत के गेंद से खड़ा कर दिया था। सीता जी के मन में कौतुहल करने की सूझी। उन्होंने राम से उस पुतले को जीवन प्रदान करने को कहा। राम ने पुतले को मनुष्य बना दिया। इसी को कोरवा जनजाति का पूर्वज माना जाता है। ( कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh )

कोरवा जनजाति का रहन-सहन 

कोरवा जनजाति मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है। कुछ मैदानी ग्रामों में ये कंवर, उरांव, नगेसिया, मुण्डा आदि जनजातियों के साथ भी रहने लगे हैं। इनका घर सामान्यतः मिट्टी का बना होता है जिस पर घास फूस की छप्पर होती है। कुछ कोरवा जो पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं, उनके घर की दीवार लकड़ी व बाँस से निर्मित होता है। घर का फर्श मिट्टी का बना होता है, जिसे 8-10 दिन में एक बार मिट्टी या गोबर से लीपते हैं। पर प्रायः एक कमरे या दो कमरे का होता है।

घरेल वस्तुओं में भोजन बनाने का कुछ बर्तन तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, कुछ बाँस के टोकरे आदि होते हैं। पुरुष व महिलाएँ सप्ताह में एक-दो बार ही स्नान करते हैं। महिलाएँ एवं पुरुष सिर के बाल को लम्बे रखते हैं। मैदानी क्षेत्र के कोरवा पुरुष सिर के बाल कटाने लगे हैं। बालों को पीछे की ओर बाँध लेते हैं। स्त्रियों बालों में गुल्ली या मूंगफली का तेल लगाकर अब कंघी करने लगी हैं। ( कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh )

स्त्रियाँ गिलट के कुछ गहने जैसे हाथ में कड़े, ऍठी, नाक में – फूली, कान में लकड़ी या गिलट के आभूषण पहनती हैं। पुरुष सामान्यतः कमर क नीचे पंछाा तथा ऊपर बंडी पहनता हैं। स्त्रियाँ लुगड़ा, पोरका पहनती हैं।

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कोरवा जनजाति के कृषि और व्यवासय 

इनका प्रमुख भोजन कोदो, कुटकी, गोंदली की पंज है। कभी चावल का भात व जंगली कंदमूल, भाजी, मौसमी सब्जी खाते हैं। मांसाहार में मुर्गी, सभी प्रकार के पक्षी, मछली, केकड़ा, बकरा, हिरण, सुअर आदि का मांस खाते हैं। महुआ से शराब बनाकर पीते हैं। पुरुष बीड़ी पीते हैं। ( कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh )

पूर्व में इस जनजाति का आर्थिक जीवन मुख्यतः वनोपज एवं शिकार पर आधारित था। वर्तमान में जो कोरवा परिवार नीचे मैदानी क्षेत्र में आकर बस गये हैं, कोदो कुटकी, गोंदली, महुआ, मक्का, उड़द, मूंग, कुलथी आदि की खेती करने लगे हैं। असिंचित व पथरीली जमीन होने के कारण उत्पादन बहुत कम होता है।

जिनके पास कम कृषि भूमि है, वे अन्य जनजातियों खेतों में मड कम होता है जि क वनोपज में मुख्यतः कंदमूल, भाजी, महुआ, चार, गोंद, तेंदू पत्ता, तेंदू, शहद, आँवला आदि एकत्र करते हैं। गोंद, तेंदू पत्ता, चार, शहद, आंवला को स्थानीय बाजारों में बेचते हैं। कंदमूल, भाजी, बोड़ा आदि को घर में भोजन के रूप में खाते हैं। ( कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh )

पुरुष तथा बच्चे पक्षियों का शिकार तीर-धनुष से करते हैं। पुरुष व महिलाएँ मछली, केकड़ा, घोंघा भी वर्षा ऋतु व अन्य ऋतु में छोटे नदी नाले से पकड़ते हैं। इसे घर में स्वयं खातं हैं।

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कोरवा जनजाति के कुछ अन्य बात 

कोरवा जनजाति वर्तमान में दो बहिंविवाही उपजाति के रूप में कोरवा और कोड़ाकू के रूप में विभक्त है। कोरवा पुनः इनके निवास एवं विकास के आधार पर दो भागों में क्रमशः पहाड़ में रहने वाले पहाड़ी कोरवा तथा मैदानी क्षेत्र (डीह अर्थात् गाँव) में रहने वाले डिहारी कोरवा में विभक्त हैं। इनमें चार बहुविवाहो गोत्र पाये जाते हैं, जैसे हंसदा, इंडिगो, मुण्डी और सामत प्रत्येक गोत्र के टोटम पाये जाते हैं। ( कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh )

इस जनजाति की गर्भवती महिलाएँ प्रसव के पूर्व तक प्रार्थिक एवं पारिवारिक सभी कार्य करती हैं। शिशु जन्म को भगवान की देन मानते हैं। प्रसव के लिये पत्तों से निर्मित अलग झोपड़ी बनाते हैं, जिसे “कुम्बा” कहते हैं। प्रसव इसी झोपड़ी में स्थानीय दाई जिसे “ढोंगिन” कहते हैं की सहायता से कराते हैं। बच्चे का नाल तीर के नोक या चाकू से काटते हैं। नाल झोपड़ी में ही गढ़ाते हैं। ( कोरवा जनजाति छत्तीसगढ़ Korwa janjati chhattisgarh korwa tribe chhattisgarh )

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source : Internet

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