कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh Korku Tribe Chhattisgarh

कोरकू जनजाति की उत्पत्ति 

कोरकू जनजाति मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र की जनजाति है। मध्य प्रदेश में कोरकू जनजाति का निवास विन्ध्य और सतपुड़ा पर्वतमाला का महाराष्ट्र सीमावर्ती क्षेत्र में पाया जाता है। मध्य प्रदेश के खंडवा, बैतूल, होशंगाबाद, देवास, खरगोन आदि जिलों में इनकी जनसंख्या पायी गयी है। मध्य प्रदेश में इनकी जनसंख्या 2011 की जनगणना में 730847 दर्शाई गई है। मध्य प्रदेश के रायसेन, सीहोर आदि जिले में इन्हें “कारकू” कहा जाता था।

जनगणना 2011 में छत्तीसगढ़ में कोरकू जनजाति की जनसंख्या 484 दर्शित है, जिनमें पुरुष 245 तथा स्त्रियाँ 239 थी। मध्य प्रदेश के कोरकू जनजाति परिवार छत्तीसगढ़ राज्य विभाजन में सरकारी कर्मचारी के रूप में आये हैं। कुछ केन्द्र शासन के कार्यालय में कर्मचारी के रूप में पदस्थ प्रतीत होते हैं। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

कोरकू जाति की उत्पत्ति के संबंध में ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध नहीं है। किंवदन्ती के अनुसार अपनी उत्पत्ति महादेव से मानते हैं। महादेव ने इनके पूर्वज को बनाया था। कोरकू जनजाति कोलारियन समूह की एक प्राचीन जनजाति है।

कोरकू जनजाति का रहन-सहन 

कोरकू जनजाति के घरों में 2-3 कमरों के साथ ही घर के सामने आंगन तथा पोछे निस्तार के लिये बाढ़ी होती है। आंगन के बाद उपरी होती है, बीच का कमरा सोने तथा अनाज रखने के काम में लाया जाता है। अंतिम कमरे में रसोई कक्ष व रसोई का सामान रखा जाता है। जानवरों के बाँधने का स्थान बाड़ी या घर के बगल में होता है। इनके घर की दीवारें मिट्टी की या बाँस के टट्टों में मिट्टी या गोबर लीपकर बनाई जाती है। उत घासफूस या कवेलू के होते हैं। फर्श मिट्टी का बना होता है। दीवारों को सफेद या पीली मिट्टी से पुताई करते हैं। मुख्य घर के दीवारों पर भित्ती चित्र भी बनाते हैं। घर के फर्श को गोबर से लीपा जाता है।

कोरकू जनजाति के लोग प्रतिदिन बबूल, करंज, रतन जोत या नीम दातुन से दाँतों की सफाई कर स्नान करते हैं। वस्त्रों पुरुष धोती, पंचा, बंढी, कुर्ता तथा सिर पर टोपी या पगड़ी पहनते हैं महिलायें सूती लुगदा, पोलका या अँगिया पहनती हैं। नवयुवतियाँ साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज पहनती हैं। पुरुष सिर के बाल छोटे-छोटे रखते हैं। महिलाएँ बालों में कंघी कर चोटी या जूड़ा बनाती हैं। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

महिलाओं के हाथ, पैर, चेहरे तथा माथे पर गोदना गुदाने का रिवाज है। माथे पर ” आकार का गुदना शुभ माना जाता है। इनके गहने सामान्यतः चाँदी, गिलट, नकली चाँदी आदि के बने होते हैं। सुहागिन स्त्रियों गले में गुरियां की माला, हंसली, चन्द्रहार, हाथ में काँच की चूड़ी, ककना, बोहटा, पैर में कड़ी या पैर पट्टी, पैड़ी, कान में टाप, नाक में लौंग पहनती हैं।

रसोई बनाने तथा खाने-पीने के लिये इनके घरों में एल्युमिनियम, पीतल, कांसे, लोहे तथा मिट्टी के बर्तन पाये जाते हैं। अनाज रखने की कोठी, चक्की, मूसल, कृषि उपकरण आदि पाई जाती है। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

इनका मुख्य भोजन कोदो, कुटकी या चावल का भात, पेज, मक्का या ज्वार की रोटी, उड़द, मूंग, बरबटी आदि की दाल तथा घर की बाड़ी में उगाई गई मौसमी सब्जी, जंगली कंदमूल, भाजी आदि है। मांसाहार में मुर्गा, बकरा, खरगोश, जंगली पक्षी, मछली आदि का मांस खाते हैं। त्योहारों, उत्सवों तथा विभिन्न सामाजिक व धार्मिक संस्कारों में महुए की स्वनिर्मित शराब पीते हैं।

कोरकू जनजाति का व्यवसाय 

कोरकू जनजाति के अधिकांश परिवारों की आय का प्रमुख स्त्रोत कृषि व मजदूरी है। कृषि में खरीफ की फसल ज्वार, धान, कोदो, कुटकी, मक्का की खेती करते हैं। खरीफ की फसल के उपरान्त ये लोग मजदूरी व लघु वनोपज जैसे तेंदू पत्ता, हर्रा, आंवला, अचार (चिरोंजी), गोंद आदि एकत्र कर बेचते हैं। पूर्व में शिकार करते थे, अब प्रतिबंध होने के कारण शिकार नहीं करते हैं। वर्षा ऋतु में अपने उपयोग हेतु मछली पकड़ते हैं।

कोरकू जनजाति उपजातियों में विभाजित है। इनकी प्रमुख उपजाति मवासी, बावरिया, रूमा, बोन्दया कोरकू आदि हैं। उपजातियाँ पुनः गोत्र में विभाजित है। इनके प्रमुख गोत्र दारपीया, शील, कासड़ा, अखंडी, साकोन, भावारी, कारा, जांबू, पान्जे तथा बारस्कार आदि होते हैं। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

कोरकू जनजाति के परम्पराए 

कोरकू जनजाति की गर्भवती महिलाएँ प्रसव के दिन तक अपनी आर्थिक व पारिवारिक कार्य करती हैं। संतान को ईश्वर की देन मानते हैं। कोरकू जनजाति की महिलाओं का प्रसव बुजुर्ग महिला व दाई की मदद से घर पर कराया जाता है। प्रसव के 6 दिन बाद छठी मनाई जाती है। प्रसूता एवं शिशु को स्नान करा सूर्य का दर्शन कराते हैं। रिश्तेदारों तथा समाज के लोगों का खान-पान होता है। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

इस जनजाति में विवाह उम्र लड़के हेतु 19-20 तथा लड़कियों की उम्र 17-18 मानते हैं। विवाह तय होने के बाद सगाई करते हैं। लड़के वाले लड़की को सूक के रूप में कपड़े व नगद रुपया देते हैं। वर पक्ष वाले बारात लेकर वधू पक्ष के घर आते हैं। मंडप गाड़ने के साथ ही विवाह की अन्य रीति-रिवाज किये जाते हैं, जिसमें भांवर मुख्य संस्कार होता है। ” भूमका” द्वारा सम्पन्न कराया जाता है।

घर जमाई प्रथा (सेवा विवाह) भी प्रचलित है। विधवा तथा त्याक्ता स्त्री को चूड़ी पहनाकर पुनर्विवाह की प्रथा पाई जाती है। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

मृत्यु होने पर मृत शरीर को दफनाया जाता है। सम्पन्न परिवार अग्नि संस्कार भी करने लगे हैं। तीसरे दिन तीसरा मानते हैं, जिसमें रिश्तेदारों को बुलाया जाता है। तथा मृत आत्मा की पूजा कुटकी के भात और मुर्गी के बच्चे की बलि देकर की जाती. है। मृत आत्मा को पूर्वजों में मिलाकर स्थापित किया जाता है तथा मृत्युभोज दिया जाता है।

कोरकू जनजाति की जाति पंचायत का मुखिया समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति होता है, जो समाज के वैवाहिक विवादों का निपटारा, देवी-देवताओं की पूजा व्यवस्था संबंधी कार्य करता है। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

कोरकू जनजाति के देवी देवता और त्यौहार 

इस जनजाति के प्रमुख देव महादेव, मुठुआदेव, दुल्हादेव, जोगनी, काल्हा बाबा, बाघदेव, हरदुललाला, भैंसासुर आदि है। पूजा में देवी-देवताओं को धूप, दीप, नारियल, नीबू तथा बलि में मुर्गी या बकरा अर्पित करते हैं। हिन्दू देवी-देवताओं में राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, दुर्गा आदि की भी पूजा करते हैं।

इनके प्रमुख त्योहार विदरी, नांगपंचमी, पोला, तीजा, नवाखानी, दशहरा, होली आदि हैं। भूत-प्रेत, जादू-टोना में भी विश्वास रखते हैं। झाड़-फूंक करने वाले व्यक्ति “भूमका” (पड़िहार) कहलाता है।” ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

कोरकू जनजाति विवाह में पुरुष स्त्रियां मिलकर नाचते गाते हैं। त्योहारों व अन्य सामाजिक अवसरों पर नाचते गाते हैं। होली पर फाग नृत्य, दिवाली में ठंढार नृत्य किया जाता है। विवाह गीत, फाग गीत, ढंढार गीत, सेवा गीत, भजन इनके प्रमुख लोकगीत हैं। इनके प्रमुख वाद्य यंत्र ढोल, मंजीरा, नगाड़ा ढफली आदि हैं।

2011 की जनगणना में इस जनजाति में साक्षरता 53.1 प्रतिशत दर्शाई गई है। पुरुषो की साक्षरता 59.7 प्रतिशत एवं स्त्रियों की साक्षरता 46.2 प्रतिशत थी। ( कोरकू जनजाति छत्तीसगढ़ Korku Janjati Chhattisgarh korku tribe chhattisgarh )

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source : Internet

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