जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम क्या है ? Jalgrahan Prabandhan Karyakram Kya hai

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जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम क्या है ? Jalgrahan Prabandhan Karyakram Kya hai

जलग्रहण प्रबंधन

जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम क्या है ? Jalgrahan Prabandhan Karyakram Kya hai : समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (IWDP), सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP), मरूभूमि विकास कार्यक्रम (DDP ) एवं एकीकृत जलग्रहण प्रबन्धन परियोजना (IWMP)

ग्रामीण विकास मंत्रालय का भूमि संसाधन विभाग जलग्रहण कार्यक्रमों का संचालन बेकार पड़ी जमीनों/कम उपजाऊ भूमियों के विकास के लिए कर रहा है। इन कार्यक्रमों में शामिल है

1. समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (IWDP),
2. सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) तथा
3. मरूभूमि विकास कार्यक्रम (DDP)

ये पहले उनके अपने अलग अलग मार्गदर्शी सिद्धातों, मानदण्डों, वित्त पोषण पद्धति के आधार पर कार्यान्वित किये जा रहे थे। हनुमंत राव समिति की सिफारिशों के आधार पर इन क्षेत्र विकास कार्यक्रमों को 1 अप्रैल, 1995 से समान मार्गदर्शी सिद्धांतों के अनुसार कार्यान्वित किया गया।

भूमि संसाधन विभाग ने एक नई पहल हरियाली 2003 से शुरू की जिसका उद्देश्य जलग्रहण क्षेत्र विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका को बढ़ाना था। इस पहल में एकीकृत बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (IWDP), सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) और मरुस्थल विकास कार्यक्रम (DDP) आदि को पंचायती राज संस्थाओं (PRI) द्वारा क्रियान्वित करने का प्रावधान किया गया।

01 अप्रैल 2008 को भारत सरकार ने सभी जलग्रहण विकास कार्यों के क्रियान्वयन हेतु नये निर्देश जारी किए। इस समान मार्गदर्शी सिद्धांत वर्ष 2008 के आधार पर वर्ष 2009-10 में समेकित जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP) प्रारंभ की गई।

जलग्रहण विकास संबंधी सिद्धान्तों के उद्देश्य-

  • ग्राम समुदाय के लिए आय के सतत् स्रोत सजित करने हेतु सिंचाई, वृक्षारोपण, बागवानी, पुष्प कृषि, चरागाह विकास, मत्स्य पालन, तथा पेयजल आदि के लिए वर्षा की प्रत्येक बूंद का संग्रह करना।
  • ग्राम पंचायतों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास को सुनिश्चित करना।
  • गांवों में जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रमों को लागू करने की जिम्मेदारी माइक्रो वाटरशेड समिति को दी गई है
  • ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, गरीबी उपशमन, सामुदायिक अधिकार तथा आर्थिक संसाधनों का विकास।
  • फसल, मानव, पशुधन पर सूखे और मरूस्थलीकरण जैसी जलवायु स्थितियों के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना। पारिस्थितिकीय संतुलन को पुनः कायम करना।
  • जल संग्रहण क्षेत्र में सृजित परिसम्पत्तियों के प्रबंधन एवं अनुरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों की शक्यता के विकास हेतु ग्राम समुदाय को प्रोत्साहित करना। साधारण, सरल और सस्ते तकनीकी उपाय, संस्थागत व्यवस्था तथा स्थानीय तौर पर उपलब्ध तकनीकी ज्ञान और उपलब्ध सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देना।

शामिल कार्यक्रम

सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम

सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम ( DPAP – DROUGHT PRONE AREAS PROGRAMME)

सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) केन्द्र सरकार ने उन क्षेत्रों, जहां पर लगातार भयंकर सूखे की स्थिति बनी रहती है, की विशेष समस्याओं को हल करने के लिए वर्ष 1973-74 में शुरू किया था। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य फसलों के उत्पादन, पशुधन तथा भूमि की उत्पादकता, जल और मानव संसाधनों पर पड़ने वाले सूखे के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना है तथा इसके द्वारा अंततः प्रभावित क्षेत्रों को सूखे के प्रभाव से मुक्त कराना है।

मरू विकास कार्यक्रम (DDP)

मरूभूमि विकास कार्यक्रम (DDP) को राजस्थान में वर्ष 1977-78 में शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम की परिकल्पना भूमि, जल, पशुधन और मानव संसाधनों के संरक्षण, विकास और इन्हें उपयोग में लाकर पारिस्थितिकीय संतुलन की बहाली के लिए एक दीर्घकालिक उपाय के रूप में की गई थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण समुदाय के आर्थिक विकास को बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में समाज के संसाधनहीन गरीब लोगों और समाज के | उपेक्षित वर्गों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है।

समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम

समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (IWDP) ( IWDP— Intergrated wasteland development project ) जो केन्द्र द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम है, वर्ष 1989-90 से कार्यान्वित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत बंजरभूमि और अवक्रमित भूमि के विकास से सभी स्तरों पर लोगों की भागीदारी को बढ़ाए जाने के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों के सृजन में वृद्धि होने की आशा की जाती है जिससे भूमि के सतत विकास और लाभों के समान वितरण में सहायता मिलती है।

एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन परियोजना (IWMP)

भारत सरकार द्वारा जलग्रहण विकास कार्यक्रमों की क्रियान्वयन हेतु समान दिशा-निर्देश जारी किये गये है, जलग्रहण परियोजनाओं के लिए भारत सरकार द्वारा जारी समान मार्गदर्शी सिद्धांत वर्ष 2008 (संशोधन 2011) के आधार पर वर्ष 2009-10 में समेकित जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP) प्रारंभ की गई। \\^

  • ये परियोजनाएं, परियोजना कार्यान्वयन एजेंसियों (PIA) के माध्यम से जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों/ जिला परिषद (डीआरडीए/जेडपी) द्वारा कार्यान्वित की जाती हैं। PIA राज्य सरकार का कोई विभाग, पंचायती राज संस्था या एक प्रतिष्ठित NGO हो सकती है।
  • यह भारत सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रमों में से एक है जो 28 राज्यों में संचालित है। एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम चीन के बाद विश्व का द्वितीय सबसे बड़ा वाटरशेड कार्यक्रम है।

छत्तीसगढ़ में जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन

राज्य के लिए वाटरशेड परियोजनाओं का बहुत ही महत्व है, खास कर राज्य के उत्तरी एवं दक्षिणी भागों में जहां कृषि योग्य भूमि का अधिकांश हिस्सा वर्षा आधारित है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में बढ़ती गरीबी, पेयजल की कमी, भू-जल स्तर में तेजी से गिरावट, कृषि व भूमि की उत्पादकता, वर्षा जल के उपयोग की कम क्षमता, चारे की अत्यधिक कमी, पशुधन से अत्यंत कम उत्पादन, जल उपयोग की क्षमता में कम निवेश, सुनिश्चित और लाभकारी व्यावसायिक अवसरों की कमी इत्यादि गंभीर समस्याओं से ग्रस्त राज्य के गरीब ग्रामीणों के लिए वाटरशेड की योजनाएं उपयुक्त हैं।

इनके माध्यम से वर्षा सिंचित क्षेत्रों में सतत आधार पर आय, उत्पादकता को बढ़ाने तथा कृषि प्रणालियों को छोटी-छोटी जल संरक्षण के लिए निर्मित संरचनाओं के माध्यम से सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने एवं गरीबों के लिए आय के अन्य साधन जुटाने का प्रयास किये जा रहे हैं।

( वाटरशेड प्रबंधन के अन्तर्गत अवक्रमित भूमि, वर्षा-सिंचित कृषियोग्य भूमि को विकसित करने को उच्च प्राथमिकता दी गई है। )

महत्वपूर्ण तथ्य

  • वर्ष 2015-16 से एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन परियोजनाएं (IWMP) प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जलग्रहण क्षेत्र विकास के नाम से संचालित है।
  • IWMP की एक परियोजना (मिनी वाटरशेड) का उपचार योग्य क्षेत्रफल लगभग 5000 हेक्टेयर के आसपास होता है।
  • एकीकृत जल संग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम की माइक्रोवाटरशेड इकाई का क्षेत्रफल (लगभग) 500 हेक्टेयर होता है।
  • भारत सरकार, भूमि संसाधन विभाग द्वारा सामान्य जिलों में ₹12,000 प्रति हेक्टेयर और IAP जिलों में ₹15,000 प्रति हेक्टेयर की दर से परियोजनाओं की लागत निर्धारित की गई है।
  • एकीकृत जल ग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम कोष से प्राप्त होने वाले आवंटन का 90% 15. केन्द्र सरकार एवं 10% राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है।
  • जलग्रहण समिति का गठन ग्राम सभा करती है। ग्राम पंचायत द्वारा वाटरशेड समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की जाती है। यह वाटरशेड समिति की विशेषता है।
  • परियोजनाओं की पूर्णता अवधि 4 से 7 वर्ष तक होती है। परियोजनाओं के विभिन्न गतिविधियों का क्रियान्वयन निम्नानुसार 3 चरणों में पूरा करना होता है

प्रारंभिक चरण–>1 से 2 वर्ष
वाटरशेड कार्य चरण –>2 से 3 वर्ष
समेकन और निवर्तन चरण–>1 से 2 वर्ष

  • जलग्रहण परियोजनाओं के लिए भारत सरकार द्वारा जारी समान मार्गदर्शी सिद्धांत वर्ष 2008 (यथा संशोधित 2011) के आधार पर वर्ष 2009-10 में समेकित जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP) प्रारंभ की गई। राज्य में IWMP अंतर्गत वर्ष 2009-10 से 2014-15 तक कुल 263 परियोजनाओं की स्वीकृति प्राप्त की गई। इन परियोजनाओं की लागत रू. 1498.04 करोड़ एवं उपचार क्षेत्रफल 11.97 लाख हेक्टेयर है।

‘नीरांचल’ राष्ट्रीय वाटरशेड परियोजना

बढ़ती जनसंख्या व घटते जल संसाधनों को देखते हुए जल संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसके दृष्टिगत वर्ष 2009-10 में एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। केंद्र सरकार ने जल के उचित उपयोग एवं संरक्षण के लिए 8 फरवरी 2016 से राष्ट्रीय वाटरशेड प्रबंधन परियोजना ‘नीरांचल’ का शुभारंभ किया है।

  • अक्टूबर, 2015 में मंत्रिमंडलीय समिति ने विश्व बैंक से सहायता प्राप्त ‘नीरांचल’ परियोजना को अनुमोदित किया।
  • 2016 में भारत सरकार व विश्व बैंक ने राष्ट्रीय वाटरशेड प्रबंधन परियोजना ‘नीरांचल’ के लिए एक ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • 8 फरवरी 2016 से राष्ट्रीय वाटरशेड प्रबंधन परियोजना ‘नीरांचल’ का शुभारंभ किया है।
  • परियोजना की अवधि 1 अप्रैल 2016 से 31 मार्च 2022 तक 6 वर्षों की होगी।
  • विश्व बैंक भारत को 178.50 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण प्रदान करेगा। परियोजना की संपूर्ण लागत 2142.30 करोड़ रूपये है जिसमें भारत सरकार 50% वहन करेगी जबकि शेष विश्व बैंक से ऋण द्वारा पूर्ति की जाएगी।
  • नीरांचल राष्ट्रीय वाटरशेड परियोजना के माध्यम से वर्षा आधारित ग्रामीण क्षेत्रों में जल प्रबंधन किया जाएगा।
  • नीरांचल परियोजना के माध्यम से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के प्रभावी कार्यान्वयन को भी सहायता मिलेगी।
  • विश्व बैंक द्वारा परियोजना को प्रदत्त ऋण प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा व राजस्थान के चुने हुए क्षेत्रों में वाटरशेड गतिविधियों में सहायता करेगा।
  • नीरांचल परियोजना में छत्तीसगढ़ का कांकेर एवं जशपुर जिला शामिल है।

विविध

  • समुदाय विकास कार्यक्रम का उद्घाटन 2 अक्तूबर, 1952 को किया था।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक सुधार का लाभ समाज के सभी क्षेत्रों को प्राप्त हो हेतु पांच सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचे चिन्हित किये गए, ये हैं- पेयजल, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़कें। इन क्षेत्रों में सरकार ने प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (PMGY) योजना शुरू की थी। ग्रामीण विकास मंत्रालय को पीने के पानी, आवास, ग्रामीण सड़क की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

 

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