गोरखपुर की वनस्पति

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गोरखपुर की वनस्पति , Gorakhpur ki Vanaspati: गोरखपुर के उसकी वनस्पति पर गहरा प्रभाव पड़ा है। उन्नीसवीं जलवायु शताब्दी के अन्त तक नेपाल से लगी जनपद की उत्तरी सीमा से राप्ती रोहिणी के तटवर्ती भागों में होती हुई उनके संगम तक और उनके समान्तर पूर्व भी अबाध रूप से जंगलों की श्रृंखलायें चली आयी थीं।

उधर पड़रौना वनपट से आवेष्टित था और दक्षिण में भी छोटे-छोटे उपवन यत्र-तत्र फैले हुये थे। वनस्पति के विविध सौंदर्य से लदे हुये वन, उनके बाहरी भाग में हरी हरी गोचर भूमि, उसके उपरान्त लहराते हुये हरे खेत और उन्हीं के बीच में बसे हुये गाँव-यही जनपद के ग्रामीण ‘जीवन की झाँकी थी। परन्तु जनपद के ऊपर ईस्ट इंडिया कम्पनी का अधिकार


स्थापित होते ही यह प्रकृति मानव अथवा कानन गृह सामंजस्य का दृश्य बदलने लगा। वनों के रूप में भूमि का प्राकृतिक चीर मनुष्य के कुल्हाड़े से धीरे-धीरे कटने लगा। भावी प्रलोभनों का चित्र सामने रखकर जंगल ही नहीं, उपवन और अमराइयाँ भी काट डाली गयीं और धरती नंगी कर दी गयी। यह प्रक्रिया इस सीमा तक पहुँची कि जनपद के दक्षिणी भाग में उपवन और गोचरभूमि की कौन कहे, कहीं पचास- सौ पशुओं के खड़े होने का स्थान भी नहीं दखायी पड़ता है। निसन्देह इससे खेती का विस्तार बढ़ा है, किन्तु अन्न के अतिरिक्त और भी तो मनुष्य की आवश्यकतायें हैं? आज इनकी कमी कितनी खल रही है?

इस समय जो जंगल बचे हैं वे दो प्रकार के हैं। जंगल का वह भाग जिसका आर्थिक उपयोग अधिक है वह सरकार के अधीन है। इसकी रक्षा और प्रबन्ध के १ लिये एक विभाग स्थापित किया गया है जिसका नाम है ‘जंगल विभाग’। इस तरह के जंगल का क्षेत्रफल 173 वर्गमील अथवा 110926 एकड़ है। इन जंगलों के ऊपर जनता का कोई अधिकार नहीं। लोग निश्चित मूल्य देकर अपने पशु जंगल में चरा सकते हैं। सरकारी जंगल का विस्तृत भाग डोमखण्ड में है।

डोमखण्ड का प्रदेश नारायणी, पियास और रोहिणी से सींचा जाता है। इस जंगल की मुख्य उपज शाल वृक्ष है। किन्तु उत्तम शाल केवल सोनाडी के ही जंगल में ही मिलते हैं। नीची भूमि में, जो बरसात में जलमग्न हो जाती है, जामुन, पनियारी, पनियर आदि के वृक्ष पाये जाते हैं। जंगल के बीच नालों के किनारे घास के मैदान मिलते हैं। नगवा के जंगल में मिश्र उपज पायी जाती है। यहाँ पर उपयोगी वृक्ष जामुन, खैर, सेमल, झिंगना, महुआ, शीशम आदि हैं।

डोमखण्ड में भी 600 एकड़ भूमि में शुद्ध खैर के वृक्ष पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इन जंगलों में बाँस, जलाने की लकड़ी और घर पर छप्पर डालने के फूस बहुतायत से मिलते हैं। जंगलों से सरकार को कई रुपये वार्षिक आय है।

सरकारी के अतिरिक्त लगभग 78596 एकड़ जंगल ऐसे हैं जो बड़े-बड़े जागीरदारों और जमींदारों की व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं। ऐसे जंगल विशेषकर सदर, महराजगंज और पडरौना तहसील में हैं। गोरखपुर के पास कुसुम्ही के जंगल में शालवृक्ष उत्पन्न होते हैं जो आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन जंगलों में गाचरभूमि की अधिकता है जिसमें असंख्य पशुओं को चारा मिलता है। वानस्पतिक उपज में दूसरा स्थान उपवनों और वृक्ष वाटिकाओं का है।


जनपद के आँकड़े देखने से पता लगता है कि कुछ दिन पहले पूरे क्षेत्रफल की 2.32 प्रतिशत भूमि (68121 एकड़) बगीचों से ढकी हुई थी। इन बगीचों में अमराइयों का आधिक्य था। बाँसगाँव तहसील में सबसे अधिक बगीचे हैं, देवरिया का दूसरा स्थान है और महराजगंज का तीसरा इन बगीचों का विस्तार भी दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है। लोग इनको काट कर खेत बनाते जा रहे हैं। इनकी रक्षा भी एक समस्या हो रही है। जैसा कि पहले कहा गया है, बगीचों में आम के बगीचे अधिक है।

जंगलों के निकट के बगीचों में महुआ और जामुन भी काफी संख्या में मिलते हैं। गोरखपुर के पास अमरूद के भी बड़े बड़े बगीचे पाये जाते हैं। उपवन और वाटिका लगाने की प्राचीन प्रथा धीरे-धीरे मन्द पड़ गयी हैं, किन्तु उसके स्थान पर अभी आधुनिक ढंग की फल- खेती की चलन सामूहिक रूप से शुरू नहीं हुई है।

जनपद में कई प्रकार के अन्न उत्पन्न होते हैं। ऋतु की दृष्टि से दो प्रकार की फसलें होती हैं। आषाढ़ से अगहन तक शरद में कट जाने वाली फसल को खरीफ और बसन्त में कटने वाली फसल को रबी कहते हैं। खरीफ की फसल रबी की अपेक्षा अधिक भूमि में बोयी जाती है।

महराजगंज में खरीफ की खेती दूनी होती है। पडरौना और हाटा में भी अपेक्षाकृत खरीफ की फसल अधिक होती है। बाँसगाँव, देवरिया और सलेमपुर में यह अन्तर बहुत कम रह जाता हैं। खेत से वर्ष में प्राय: दो फसलें तैयार की जाती हैं, किन्तु बाँसगाँव में खरीफ की फसल संदिग्ध और प्रायः निराशाजनक रहती है।

धान खरीफ की सबसे प्रधान उपज है। महराजगंज में तो विशेष कर इसी की पैदावार होती है। लगभग 85 प्रतिशत भूमि में वहाँ धान की खेती होती है । हाटा में आधी खेती धान की होती है। देवरिया और सलेमपुर में 28 प्रतिशत भूमि में धान की खेती होती है। बाँसगाँव में धान की खेती सबसे कम होती है। धान के बाद खरीफ के फसल में कोदो का स्थान है।

यह सबसे अधिक सदर और पड़रौना में उत्पन्न होता है। मक्का की उपज पड़रौना, देवरिया और सदर तहसील में पर्याप्त होती है। मक्का का प्रधान क्षेत्र भाठ है। खरीफ की फसल में आर्थिक दृष्टि से ईख का महत्व अधिक है। पडरौना में भाठ के कारण सिंचाई नहीं करनी पड़ती है। इसलिये वहाँ लोग सबसे अधिक ईख बोते हैं। देवरिया, सलेमपुर और हाटा में भी किसान कठिन परिश्रम करके ईख उत्पन्न करते हैं। ईख की खेती का इतना अधिक विस्तार हो गया है कि जनपद की आर्थिक अवस्था बहुत अंश में ईख के


ऊपर अवलम्बित हैं। गोरखपुर जनपद हिन्दुस्तान का ईंख उत्पन्न करने वाला सबसे बड़ा • क्षेत्र है। खरीफ की एक दूसरी महत्वपूर्ण फसल (जो रबी में कटता हैं) अरहर है। महराजगंज को छोड़कर और जगह इसकी खती मिश्र होती है, विशेष कर कोदो के साथ। अरहर का उत्तम उपज बाँसगाँव के कछार में होता है, किन्तु बाढ़ के कारण यह फसल अनिश्चित सी ही रहती है।

खादरां को छोड़कर अन्य स्थानों में सर्वत्र अरहर की उत्पत्ति होती है। नील की खता पहले अच्छी होती थी किन्तु अब यह खेती बिल्कुल नष्ट हो गयी। सं० 1914 वि० के विप्लव के पहले 35000 एकड़ भूमि में नील बोया गया था। नील से रंग तैयार करने के यहाँ पर कारखाने बने हुये थे। रासायनिक ढंग से रंग तैयार होने लगने के बाद नील की कृषि जनपद से उठ गयी।

खरीफ के फसल में और भी कई एक छोटे मोटे उत्पन्न होते हैं जैसे, मडुवा, ज्वार, बाजरा, मूँग, तिल, उड़द, साँवाँ, टागुन आदि। इन अन्नों का केवल स्थानीय महत्त्व है और जनपद की गरीब जनता इनके ऊपर अपना निर्वाह करती हैं।

जनपद के दक्षिणी भाग में अपेक्षाकृत रबी की फसल अधिक होती है। गेहूँ रबी की मुख्य उपज है और पूरे जनपद में उत्पन्न होता है। परगना हवेली, बाँस गाँव और पडरौना में गेहूँ की खेती अधिक होती है। हाटा, देवरिया और सलेमपुर में भी इसकी खेती उत्तरोत्तर बढ़ायी जा रही है। गेहूँ के बाद रबी का दूसरा प्रधान अन्न जव (जौ) है। रबी की भूमि के 14.5 प्रतिशत में जौ बोया जाता है।

सलेमपुर और देवरिया में सबसे अधिक इसकी खेती होती है। रबी के अन्नों में मटर का तीसरा है। इसकी सबसे अधिक खेती सलेमपुर में होती है। चना और तेलहन की खेती साधारणत: पूरे जनपद में होती है। मसूर, लतरी, बोरो, चेन आदि की गणना भी रबी की फसल में की जा सकती है। बोरो को शरद ऋतु का धान कहना चाहिये। यह थोड़ा बहुत नदियों के किनारे और तालों में दक्षिणी भाग में भी होता है, किन्तु इसका प्रधान क्षेत्र पडरौना तहसील है।

आर्थिक दृष्टि से अफीम और तम्बाकू की चर्चा भी आवश्यक है। अफीम की खेती कुछ दिनों तक बीच में बन्द हो गयी थी, परन्तु इधर फिर होने लगी है। सलेमपुर तहसील में विशेषरूप से इसकी खेती होती है। तम्बाकू, जो आजकल गोरखपुर की विशेष चीज मानी जाती है, जनपद में कम उत्पन्न होता है। तिरहुत से तम्बाकू मँगाकर उसका खमीरा तैयार किया जाता है।

फल –

गोरखपुर में आम, लीची, महुआ, इमली, कटहल, बेल, केला, नीबू, नारंगी, अमरूद और अनानास इत्यादि फल होते हैं। इनमें से कटहल, अनानास और अमरूद प्रसिद्ध हैं।

 

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Rajveer Singh
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