गोरखपुर की झीले , गोरखपुर के ताल

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गोरखपुर की झीले , गोरखपुर के ताल , Gorakhpur ki Jheele , Gorakhpur ke Tal : दोस्तों हम बताने जा रहे है आपको गोरखपुर की झीले और ताल जो कुछ इस प्रकार है |

झील और ताल

जनपद की दूसरी प्राकृतिक सम्पत्ति जिसका यहाँ के निवासियों के ऊपर प्रभाव पड़ता है झील और ताल हैं। हरे हरे खेतों, अमराइयों और घने वनों के बीच उनकी स्थापना प्रकृति की एक अनुपम देन है। प्रकृति का यह प्रसाद इस प्रांत के कम जनपदों को प्राप्त है। आप जनपद के एक छोर से दूसरे छोर तक चले जाइये; बनारस और आजमगढ़ जैसी ऊसर भूमि कहीं दिखाई नहीं पड़ेगी। कहीं लहलहाते खेत और उनके बीच में जलाशय, कहीं जलपूरित नदियाँ, कहीं कोसों तक विस्तृत वन और कहीं जल से भरे हुये विशाल झील और ताल दृष्टि को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं।

ये ताल और झील प्रायः नदियों के छोड़नों से बने हैं। नदियों के छोड़न बन जाने पर उनमें आस-पास से स्थल स्रोत और नाले आकर मिले। पीन के बाहर निकलने का कोई रास्ता था नहीं। इसलिये उन छोड़नों का आकार बढ़ता गया। कालान्तर में वे विशाल ताल बन गये, यद्यपि नदी और आस पास की मिट्टी आकर उनको धीरे धीरे उथला बना रही है। तालों के अतिरिक्त झील भी हैं, जो संभवतः भौगर्भिक कारणों से पृथ्वी के दब जाने से बने हैं जिनका जल गर्मियों में कम हो जाता है और किसी-किसी का कुछ भाग सूख जाता है। ऐसे तालों और झीलों की संख्या अधिक है। उनमें से मुख्य मुख्य का परिचय दिया जायेगा। रामगढ़ ताल

गोरखपुर के पास उसके दक्षिण-पूर्व दिशा में यह ताल स्थित है। जनता में यह जनश्रुति प्रचलित है कि प्राचीन काल में ताल के स्थान में एक विशाल जनाकीर्ण नगर था जो किसी ऋषि के शाप से धस गया और उसमें जल भर जाने


के कारण ताल बन गया। इस जनश्रुति में सत्यांश यह है कि इस के किनारे कोलियों के रामजनपद की राजधानी रामग्राम स्थित था। संभवतः राप्ती पहले इसी दिशा में कुछ दूर तक बहती थी फिर उसने अपना मार्ग बदल लिया और उसके छोड़न से ताल बन गया।

पहले इस ताल का किनारा घने नरकुल के वृक्षों से ढका रहता था जिसका प्रभाव नगर के स्वास्थ्य पर बुरा पड़ता था। म्युनिसपैलिटी ने इन वृक्षों को कटवा डाला और ताल का कुछ पानी निकाल देने के लिये उसका एक कृत्रिम नाल के राप्ती नदी से मिला दिया। किन्तु इसका परिणाम उल्टा ही हुआ। इससे बरसात के दिनों में नदी का पानी ताल में भर जाता है जो दक्षिण-पूर्व से नगर को घेर लेता है। इससे ताल के तटस्थ गाँवों में हानिकर बाद भी आ जाती थी अत: ग्रामीणों ने इस नाले को बन्द कर दिया और म्युनिसपैलिटी ने भी एक बाँध के द्वारा नदी के जल को ताल में जाने से रोकने का प्रयत्न किया है। इस ताल में कमल के फूल, जलकुम्भी और मछलियाँ बहुत पायी जाती हैं। इसके किनारे मधुओं और मल्लाहों के कई गाँव बसे हुये हैं।

नरही ताल

रामगढ़ से थोड़ी ही दूर दक्षिण-पूर्व में नरही ताल राप्ती के कछार में ही है। गुर्रा नदी ने इसको रामगढ़ ताल से मिला दिया है। यह गर्मियों में प्रायः सूख जाता है और तब एक विशाल चारागाह का काम देता है। डोमिनगढ़ और करमैनी ताल

ये दोनों ताल गोरखपुर नगर के पश्चिम ओर हैं। वास्तव में ये दोनों ताल कभी एक ही थे। पीछे बीच में एक ऊँची भूमि आ जाने के कारण अलग-अलग हो गये। वर्षा ऋतु में इनका जल लगभग सात मील भूमि पर फैल जाता है, परन्तु गर्मियों में इनका विस्तार संकीर्ण हो जाता है और इनके किनारे गोचरण होता है। नन्दौर ताल –

गोरखपुर से लगभग छ: मील दक्षिण नन्दौर ताल है। यह भी राप्ती के एक पुराने प्रवाह का छोड़न है। यह तीन मील की लम्बाई में बहुत सुन्दर बना हुआ है। इसके किनारे कड़ी मिट्टी के बने हुये हैं जो बरसात में नहीं टूटते। इसमें गहरा जल बराबर बना रहता है। मछलियों के लिये यह प्रसिद्ध है।


अमिथर ताल

नन्दौर के थोड़े और दक्षिण में आमी नदी के छोड़न से अमियर ताल बना हुआ है। यह ताल बहुत बड़ा है किन्तु गर्मी में इसका अधिकांश भाग सूख जाता है जो खेती और चरागाह के काम आता है।

भेंडी ताल

सरयू और राप्ती के बीच में चिलुआपार परगना में भेंडीताल है। इस ताल को तरैना नदी के छोड़न ने बनाया है। वर्षा में इसका जल पाँच मौल के घेरे में फैल जाता है, परन्तु गर्मियों में इसका विस्तार कम हो जाता है। गर्मी की फसल में यह घास और अन्न की खान है। इसमें मछलियाँ और सीप भी काफी मिलती हैं। इसके बीच में देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ शिवरात्रि को मेला लगता है। चिलुआताल –

यह ताल गोरखपुर से सात मील उत्तर हवेली परगना में स्थित है यह रोहिणी की सहायक नदी चिलुआ से बना हुआ है। इसके बीच में एक द्वीप है जिस पर स्थानीय जनश्रुति के अनुसार प्राचीन काल में किसी राजा का दुर्ग था। इसमें मछली का आधिक्य होने के कारण इसके किनारों पर मल्लाहों की बस्तियाँ बस गयी हैं। रोहिणी और राप्ती के बीच में जमुआर, लिखिया, कोयल, कोमार, तारू और सखा नाम के अन्य ताल हैं जो वर्षा ऋतु में पानी से भर जाते हैं किन्तु जाड़ों में सूखने लगते हैं। इन दिनों अनेकों प्रकार की पहाड़ी चिड़ियाँ हिमालय से इन तालों में उत्तर आती हैं और शिकारियों के लिए आकर्षण पैदा करती हैं। रामभार ताल

कसया के समीप कसया देवरिया सड़क के पश्चिम में यह ताल है। खनुआ नदी की बाढ़ से इस ताल का विस्तार बरसात में बहुत बढ़ जाता है और कभी-कभी इसका पानी कसया को चारों तरफ से घेरकर उसको टापू बना देता है। परन्तु गर्मियों में यह क्षीण होकर लगभग आधे मील के फैलाव में रह जाता है। इसका उपयोग सिंचाई और मछलियों के लिये किया जाता है। इस ताल का नाम कोसल के राजा रामचन्द्र के नाम पर पड़ा है। उनके लड़के कुश के नाम पर कुशावती (कुशीनगर) नगरी बसायी गयी थी और उसके पास का तला उनके नाम


पर रामसंभार कहलाया। इसके ही किनारे कुशीनगर के मल्ल राजाओं का


मुकुलबन्धन होता था। भगवान् बुद्ध का शव इसके किनारे जलाया गया था। मल्लों ने इसीके किनारे उनके अवशेष पर स्तूप बनवाया जिसका भग्नावशेष आज भी वर्तमान है।

जनपद के पूर्वीभाग में बड़े तालों की संख्या कम है। इसका कारण है इस भाग में नदियों की कमी। फिर भी छोटी गंडक और बड़ी गंडक के छोड़नों से कहीं-कहीं ताल बन बये हैं। इनमें से (कुशेश्वर), चकहवा, दुमरनी, गडेरताल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन सभी तालों में न केवल मछलियाँ और सीपें पायी जाती हैं किन्तु इनके किनारे बड़े पैमाने पर पशुचारण भी होता है। खेतों की सिंचाई के लिये भी ये ताल अच्छे साधन हैं।

 

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Rajveer Singh
Rajveer Singh

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