गोरखपुर की भूमि किस प्रकार की है ? क्या गोरखपुर की भूमि उपजाऊ है ?

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गोरखपुर की भूमि के प्रकार , Gorakhpur ki Bhumi ke prakar गोरखपुर की भूमि किस प्रकार की है ? क्या गोरखपुर की भूमि उपजाऊ है ? Gorakhpur ki bhumi kis prakar ki hai , kya Gorakhpur ki bhumi upjau hai : दोस्तों हम आपको बताने जा रहे है गोरखपुर के भूमियो के प्रकार आईये देखते है

भूमि के प्रकार:

जैसा कि पहले बतलाया गया है जनपद में अनुवर और अनुपयोगी भूमि कम है। यहाँ 76 प्रतिशत भूमि खेती के योग्य है। केवल 24 प्रतिशत भूमि ऐसी है जिसमें खेती नहीं हो सकती। इसमें से लगभग 127153 एकड़ भूमि पानी में है-नदी, ताल और झील के रूप में। 285458 एकड़ भूमि रेलवे द्वारा फँसा ली गयी है। इस तरह केवल 29418 एकड़ भूमि ऐसी है जिसको खेती के लिये अनुपयुक्त कहा जा सकता है। इसमें भी अधिकतर वह भाग सम्मिलित है जो बालुकारूप में सरयू के किनारे है- विशेषतः धुरियापार, चिल्लूपार और सलेमपुर परगनों में। परन्तु स्मरण रखने की बात है कि खेती योग्य सभी भूमि अभी काम में नहीं लाई गयी है। लगभग 64647 एकड़ भूमि हलके वनों से ढकी है। 100539 एकड़ भूमि ऐसी है जिसमें खेती हो सकती है, किन्तु थोड़ी कठिनाइयों के कारण नहीं जोती जाती। इसके अतिरिक्त 235256 एकड़ भूमि जो महराजगंज, पडरौना और सदर तहसील में ऊसर कहकर छोड़ दी गयी है उसका अधिकांश जंगलों से आच्छादित है। कुछ भूमि ऐसी है जिसकी जुताई चिरकाल से बन्द है और वह इस कारण से अनुर्वर हो गयी है। इसका क्षेत्रफल 100000 एकड़ है। यह झाड़ी, जंगल, घास आदि से ढक गयी है। फिर भी जितनी भूमि में खेती हो रही है, वह पर्याप्त है। खेतीयोग्य भूमि अधिकतर जनपद के दक्षिण भाग में है जहाँ बस्ती घनी हो गयी हैं। यदि उचित सहायता पहुँचाकर इस विस्तृत भूमि को कृषियोग्य बना दिया जाय तो जनपद की आर्थिक दशा सुधर सकती है। यद्यपि • जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ अनुर्वर भूमि भी उपयोगी बनायी जा रही है, किन्तु इसके लिये कोई योजनापूर्ण सामूहिक प्रयत्न नहीं हो रहा है।


उपज और बनावट की दृष्टि से जनपद की भूमि तीन प्रकार की है-भाट, बाँगर और कछार पडरौना तहसील का सम्पूर्ण भाग लिये, देवरिया और सलेमपु का उत्तरी भाग सभी भाठ है। भाठ का निर्माण नारायणी, छोटी गंडक और उनक सहायक नदियों की लाई हुई मिट्टी से हुआ है। भाठ की मिट्टी सफेद होती है जिसका कारण मिट्टी में अनुपात से अधिक चूना का होना है। इस मिट्टी में जल धारण करने की शक्ति धिक होती है, इसलिये इसमें बराबर नमी बनी रहती है। यहीं कारण है कि यहाँ खेती के लिये सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि नेपाल की सीमा पर ठूंठीवारी से भाँटपार स्टेशन तक एक रेखा खींची जाय तो भाव की भूमि पूर्व की ओर अलग हो जायेगी। यद्यपि पैदावार की दृष्टि से यह भूमि महत्त्वपूर्ण है परन्तु मानव जीवन के लिये बहुत उपयुक्त और शक्तिसम्पन्न नहीं है। परन्तु धीरे-धीरे यह भूमि पुनः शुष्क और मानव बस्तियों के अनुकूल हो रही है।

कछार की भूमि का विस्तार भी बड़ा है। राप्ती और उसकी सहायक नदियाँ की पाश्र्ववर्ती भूमि में लम्बा चौड़ा कछार स्थित है। जनपद के सुदूर उत्तर-पूर्व में नारायणी के बगल में भी कछार का एक खण्ड है। सरयू नदी के किनारे दक्षिण-पश्चिम भाग में भी कछार की एक पेटी है। इनमें राप्ती का कछार ही सबसे अधिक उपजाऊ है, जिसमें प्रतिवर्ष बाद के साथ नयी मिट्टी आती है और भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती रहती है। सरयू और नारायणी के कछार की मिट्टी में बालू की अधिकता है, इसलिये उनकी उत्पादकशक्ति राप्ती के कछार से कम है।

भाठ और कछार के अतिरिक्त जो खेती योग्य भूमि है वह भिन्न प्रकार की है। उसे बाँगर कहते हैं। एक पतली पेटी बाँगर की पडरौना में भी है किन्तु यह जनपद के और बाँगरों से भिन्न है-इसका धरातल नीचा है। जिस प्रकार भाठ की मिट्टी के दो प्रकार-धूसी भाठ और चउर भाठ हैं उसी प्रकार बालू का अंश कम या अधिक होने से बाँगर की भूमि के तीन प्रकार हैं-मटियार, दोमट आर बलुई। बाँगर में ही जहाँ वर्षा का पानी इकट्ठा हो जाता है, उसे खादर कहते हैं।.

खेतीयोग्य भूमि का विभाजन उपर्युक्त तीन प्रकार की भूमियों भाठ, कछार और बाँगर में किया गया है। परन्तु उत्तर में तराई का भूमि का अलग उल्लेख करना आवश्यक जान पड़ता है। उत्तरी सीमा पर लगभग 10 मील चौड़ी भूमि की पेटी है जिसको तराई कहा जाता है। यह नेपाल की तराई का ही सिलसिला है। वास्तव में बाँगर का ही एक परिवर्तित रूप तराइ है। यहाँ भी सिंचाई की आवश्यकता


पड़ती है। लोग छोटे छोटे नालों द्वारा, जिसे कुला कहते हैं, सिंचाई का प्रबन्ध करते हैं।

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Rajveer Singh
Rajveer Singh

Hello my subscribers my name is Rajveer Singh and I am 30year old and yes I am a student, and I have completed the Bachlore in arts, as well as Masters in arts and yes I am a currently a Internet blogger and a techminded boy and preparing for PSC in chhattisgarh ,India. I am the man who want to spread the knowledge of whole chhattisgarh to all the Chhattisgarh people.

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