डोमकच नृत्य | Domkach Nritya | Domkach Dance

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डोमकच नृत्य | Domkach Nritya | Domkach Dance 

खुशी और उल्लास की समवेत मधुरिम गीत ध्वनि से विवाह मण्डप भीग रहा है। बहनें आरती की स्निग्ध दीप मालाओं से भाई की आरती उतारती हुई बारात को विदा कर रही हैं। सुरमई शाम ढल चुकी है। घर गाँव के लगभग सभी पुरुष समाज बारात के साथ बेटा ब्याहने जा रहे हैं।

घर में सिर्फ औरतें है। ऐसे में रात भर जागकर गाँव-घर की रक्षा का प्रश्न उनके सामने खड़ा हो गया है। मनोरंजन के साथ रात बिताने अथवा किसी प्रकार के बाहरी भय से त्राण पाने के लिए परम्परा पोषित रतजगा भारत की धरती पर अरण्यक काल से चली आ रही है।

सामाजिक मर्यादा सामाजिक व्यवस्था के साथ-साथ जब परिवार विस्तार के स्वाभाविक धर्म के लिए एक दूसरे परिवार से जुड़कर शुरू हुई, तो दो परिवारों के बीच संबंध स्थापना के लिए विवाह की मर्यादित परंपरा की शुरूआत हुई। विवाह की यही आदिम परंपरा अरण्यक काल से अपने-अपने सामाजिक संस्कार, तौर-तरीके से चलती चली आ रही है।

वैदिक काल तथा अरण्यक काल में स्वच्छंद रमण करने की परंपरा, गन्धर्व विवाह की परंपरा, स्त्रियों को उपहार स्वरूप दान देने की परंपरा, स्त्रियों को चुराकर लूटकर जबरन विवाह की परंपरा के अनेक उदाहरण धर्म, पुराण, इतिहास से हमें प्राप्त है।

आगे चलकर रामायण, महाभारत काल में स्वयंवर की परंपरा देखने को मिलती है। इस काल तक आकर विवाह परंपरा एक मर्यादित, अनुशासित बंधन के रूप में कठोर रूप से परिचालित हुई, तब से विवाह की परंपरा हमारे संस्कार में बँधकर हमारी संस्कृति की अभिन्न अंगर बन गयी।

तभी से खुशी और उल्लास से पूर्ण पुत्र विवाह मे बारात सजान की क्षेत्रीय परंपरा की शुरूआत हुई। घर के पुरूष वर्ग पुत्र ब्याहने लड़की वाले के घर-गाँव भर के पुरूषों के साथ गाजे-बाजे, ढोल-ताशा, पिपही – बाँसुरी बजाते, नाचते-गाते जाने लगे।

लेकिन बारात विदा करने के बाद सूने पड़े घर-गाँव में रातभर जागकर गुजारने का प्रश्न घर स्त्रियों के समक्ष खड़ा हुआ। इसी के निदान स्वरूप निर्विघ्न होकर रात गुजारने के लिए मनोरंजन से भरपूर रतजगे का आयोजन शुरू हुआ। अस्तु पुत्र की बारात विदा करने के पश्चात रतजगे के रूप मे नृत्य-गीत

पूर्ण यही मनोरंजन आनंद डोमकच कहलाया। डोमकच शब्द से स्पष्टतः भाषित होता है कि यह स्वांगपूर्ण नृत्य-गीत डोम जाति व्दारा प्रस्तुत होता था। डोमकच का इतिहास बहुत पुराना है।

विद्वान डोमकच का संबंध सिध्द एवं नाथ परंपरा तथा वज्रयान परंपरा से जोड़कर देखते है। विक्रम की नवीं शताब्दी में भारत में विद्यमान डोमिनी के आव्हान गीत में स्वांग का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है-

नगर बहिरे डोंबि तोहारि कुड़िया
छड़ छोड़ जाइतो ब्राम्हा नाड़िया
आलो डोंबि चोय संग करबेय सांग
निधिण कहल कपाली जोड़ लाग ।।
एक सौ पद्मा चौसटिठ तेहि चाढ़ि
नाचय डोंबि वापुरा ।।

इस तरह यही नृत्य पूर्ण स्वांग शैली में परंपरागत रूप से विस्तारित होकर पूरे उत्तर भारत में प्रचलित हो गया। डोमिनियों का यह स्वांग स्त्रियों के मध्य होता रहा, जिसमें | डोमिनियाँ पुरूष वेश धारण करके चुहलपूर्ण स्वांग भरती रही है। डोमिनियों का यह लोक प्रचलित स्वांग राजाओं जमींदारों और नवाबों के काल में गाँव घर की औरतों के बीच खुलकर लोकप्रिय हुआ।

लेकिन यहाँ भी डोम डोमिनी का स्वांग, उनके गीत, उनके जीवन की घटनाएँ, उनका दर्द डोमिनी की वियोग ही खेला जाता रहा है आजतक । आज भी इस नृत्यपूर्ण स्वांग में महिलाओं के ‘बीच कोई डोमिन बनती है तो कोई डोम और फिर नृत्य गीतात्मक स्वांग आरंभ होता है।

शादी-ब्याह के अवसर पर या फिर अन्य शुभ अवसरों पर, सामाजिक समारोहों में डोमिनियों, पमरियों, हिजड़ों नटुओं आदि व्दारा मनोरंजक स्वांग की प्रस्तुति होती रही। फलस्वरूप नेगाचार के रूप में अन्न, वस्त्र, आभूषण, नगद रूपये तक प्राप्त कर लेती थीं। यह सब इनके जीवकोपार्जन का एक अहम साधन था।

स्त्री प्रधान डोमकच प्रसंग पूर्ण नृत्य गीतात्मक प्रदर्शन है, जिसमें स्त्रियाँ पुरुष वेशधारण कर तरह-तरह के चुटीले-भड़कीले, हास्यपूर्ण भौड़े स्वांग प्रस्तुत करती है। इस प्रकार यह पूर्णरूपेण स्त्री प्रधान स्वांग है। इस नृत्यपूर्ण स्वांग के माध्यम से स्त्री-पुरुष की वैवाहिक मर्यादा, वंशवृध्दि का उल्लास, सामाजिक नैतिकता के साथ ही कई तरह की सामाजिक, पारिवारिक एवं आर्थिक त्रासदी की गीतात्मक प्रस्तुति की जाती है, साथ ही पुरुषों की हास्यपूर्ण नकल भी उतारी जाती है।

इस स्वांग नृत्य में उच्च तथा निम्न वर्ण के भेद नहीं होता है। घर की औरतों के साथ नौकरानी, डोमिन तथा गमारिन भी नृत्य-गीतमय स्वांग प्रस्तुत करती है। डोमकच के माध्यम से सामाजिक जीवन व्यवस्था, छोटे-बड़े, उच्च-निम्न सभी वर्गों का · एक- दूसरे के साथ की अनिवार्य सहभागिता, सहकारति का भी परिच. मिलता है। यह सभी जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, समाज में रहते हुए हर सुखद दुख:द कार्य में सबकी जरूरत होती है।

चाहे वह शादी ब्याह, जन्मोत्सव, उपनयन अथवा मृत्युगत संस्कार ही क्यों न हो, सभी तबकों की अपनी अहमियत होती है। जिनके बिना ये सारे परंपरा पोषित संस्कार सम्भव ही नहीं होते हैं ब्याह के पुनीत अवसर पर मंडप निर्माण के लिए हरे-हरे बाँस, मण्डप छाजन के लिए खरही, बंशारोपन का करची, सूपमौनी, डगरा-दौरी, हाला-डाला, पौती- पीटारी, अटवासी- पटवासी, केशी-डोरी डोम- डोमिन बनाकर लाते है।

सबकी अनिवार्यता आज भी समाज में बरकरार है। डोमकच में सभी जातियों की अनिवार्य भूमिका रहती है। डोमकच के एक प्रसंग मे डोमिनी के भावपूर्ण नृत्य गीत व्दारा परदेश गये अपने पति के लिए विरह-संताप बड़े ही मनोहारी ढंग से अभिव्यक्त होता है। प्रस्तुत स्वांग में डोम-डोमिन, धोबी, गमारन, चूड़ीहारिन, चूड़ीहारा,…

मालकिन, नौकर तथा मालिक की भूमिका प्रमुख होती है। डोमकच के सारे प्रसंग नृत्य-गीत के माध्यम से ही प्रस्तुत होते हैं। डोमकच के सभी गीत प्रश्नोत्तरी शैली में प्रस्तुत में किए जाते हैं जिससे नृत्य की प्रभावशीलता और भी उत्तेजक हो जाती है। प्रत्येक लोक नृत्य की तरह डोमकच में भी ग्राम्य संस्कृति की सुन्दर झलक तथा ग्रामीण जीवन के स्वाभावगत भोलेपन की सुन्दर अभिव्यक्ति मिलती है।

इस प्रकार डोमकच जीवन व्यवहार, संस्कार एवं दाम्पत्य जीवन के छुए अनछुए प्रसंगों पर आधारित नृत्य पूर्ण स्वांग है, इस रसपूर्ण प्रसंग नृत्य मे डोमकच का कोई मंचीय विधान नहीं है, यहाँ न कोई प्रतिबंध, दृश्यबंध घूमता हुआ दर्शकों के साथ चलता है रंगमंच मात्र घर का कमरा, आँगन-बरामदा और नृत्य के साथ थिरकता स्त्रियों का स्वांगमय नृत्य ।

इस तरह यह पूर्णत: स्त्री प्रधान लोकनृत्य पूर्ण स्वांग है। अत: यहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित है वैसे अब यह प्रतिबंध नहीं के बराबर है। क्योंकि वृहत एवं राष्ट्रीय मंचों पर स्त्री-पुरुष सभी के बीच यह एक विशिष्ट लोकोत्सव की तरह प्रस्तुत प्रशंसित होने लगा है।

डोमकच में प्रकाश व्यवस्था का विशेष प्रावधान नहीं है। घर के माहौल में प्रस्तुत यह रतजगा जहाँ घर की बिजली, बत्ती, गैस, लैंप सब कुछ सामान्य रूप से चलता है। पुरुष वेश धारण करने के लिए पुरुषों व्दारा व्यवहत सामान्य वस्त्र, धोती, कुर्ता, बंडी, शर्ट-पैंट, हेट, मुरेठा, गमछा पात्रानुकुल व्यवहार में लाये जाते हैं नकली दाढ़ी मूंछ के लिए काजल का उपयोग किया जाता है। ब्याह के घर में जिस तरह के सामान्य वस्त्र पहने जाते है, स्त्री उसी तरह सजी होती है। अतः किसी चीज को जुटाना नहीं पड़ता है।

अवध क्षेत्र में प्रचलित नकटौरा की उत्पत्ति का मूल केन्द्र छत्तीसगढ़ माना जाता है। सवानिनों (स्त्रियाल) व्दारा बारातियों का स्वागत हास-परिहास के साथ किया गया तथा साथ में गाली गीतों, भड़ैती गीतों से भरपूर नाच के साथ बारातियों के साथ छेड़-छाड़ भी की गयी, जो इस प्रकार है-

अरे बरतिया आये रे, थोथना लय तोर भाय रे
आये बरतिया चुप्पे-चुप्पे
दुल्हा डौका के तीन-तीन भाय
नकटा नाक और चमेठा से
बहरा बहिनी फूफू मन नाचत होती नकटा रे

अर्थात तुम सभी बेशर्म नकटी औरतों के पुरुष हो, तुम्हारी बहन फु आ नकटी होकर नकटा नाच नाचती होगी। कौशल प्रदेश में भी नृत्य गीत पूर्ण डोमकच की चर्चा कुछ इस प्रकार है –

नकटी के डौका नकटा मन
तिरिया चरित ने जानय रे
नकटा सन के नकटा नाचल
सुन के अचरित मानय रे
हमरा त टुटली मड़इया अहा दइया………

शहरी मानसिकता के प्रभाव स्वरूप संस्कृति का पतन जिस तरह हो रहा है, उसी तरह हमारे संस्कार पूर्ण रीति रिवाज भी समाप्त हो रहे हैं। इस तरह की प्रस्तुतियाँ अब सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित रह गयीं है। आज जीवन व्यवहार की यह पुरातन परम्परा हमारे बीच से  विलुप्त हो रही है।

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