छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh

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छत्तीसगढ़ के शासको के अभिलेख | Chhattisgarh ke Shasako ke Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh

तिथिलेखन तकनीक का इतिहास

प्राचीन भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण भाग है। पुरालेखीकीय, अर्थात पुरालेखों की लेखन तकनीक पुरालेखों के इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है, कि मानवीय भावनाओं के अभिव्यक्ति के लिये प्रतीक चिन्हों के अंकन के साथ ही लेखन कला का उदभव भी हुआ होगा।

पुरालेखीय तकनीक में हुए क्रमिक विकास में अभिलेखों की ऐतिहासिकता तथा प्रमाणिकता को सिद्ध करने वाले अनेक महत्वपूर्ण कारक हैं, जिसमें तिथि अंकन तकनीक या तिथि लेखन प्रविधि का महत्वपूर्ण स्थान है।

प्राचीन भारत में अभिलेखों में तिथि अंकन सकता है तकनीक का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि इसका सर्वप्रथम प्रयोग मार्यवंशीय प्रतापी शासक अशोक के अभिलेखों में राज्यवर्ष लेखन के रूप में मिलता है।

जिसका क्रमशः विकास सातवाहन शक कुषाण, गुप्त वाकाटक एवं पूर्व मध्य कालीन शासकों द्वारा जारी किये अनेक अभिलेखों में राज्य वर्ष, वंश वर्ष, तिथि, दिन, पक्ष, नक्षत्र, मास, ऋतु एवं संवत्सरों के रूप में अनेक प्रकार से तिथि अंकित किया गया है .( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )

छत्तीसगढ़ में तिथिलेखन का विकासक्रम

अंकन तकनीक का प्रयोग समय-समय पर किए गया। है। जिसका वंशक्रम एवं कालक्रम की दृष्टि से विकासक्रम भिन्न रहा है। इन्हीं तथ्यों का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत शोध-पत्र में किया गया है।

क्षेत्र से ई. पू. द्वितीय शताब्दी से तेरहवी शताब्दी ई. के मध्य में जारी और अब तक प्राप्त विभिन्न दान अनुदान एवं निर्माण के उपलक्ष्य में किये गये अभिलेखों को संख्या लगभग 175 है।( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )

इनमें से लगभग 75 प्रतिशत लेख किसी न किसी प्रकार से तिथि अंकित है। जिनका विकासक्रम का कालक्रमानुसार विश्लेषण करने पर मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

प्रथम वर्ग

इस वर्ग के अंतर्गत छत्तीसगढ़ क्षेत्र से प्राप्त प्रारंभिक अभिलेखों को लिया गया है। जिन्हें विषयवस्तु की दृष्टि से दो भागों में विभाजित गया-

  1. छत्तीसगढ़ क्षेत्र से प्राप्त प्रारंभिक लेख मौर्य कालीन ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं। जिसमें किसी भी प्रकार के तिथि अंकन तकनीक का प्रयोग नहीं किया।
  2. छत्तीसगढ़ क्षेत्र में तिथि अंकित प्रथम अभिलेख सातवाहन कलीन ब्राह्मी लिपि के हैं जो कुमारवरदत्त द्वारा जारी और गुंजी से प्राप्त शिलालेख के रूप में दिवान का उल्लेख हुआ। इसमें यह स्पष्ट नहीं होता। है कि इसमें उल्लेखित 6 संवत्सर का संबंध किस संवत् से है और इसका क्या अभिप्राय है। इसी प्रकार दिवस 6 से भी किसी निश्चित तिथि का ज्ञान नहीं होता

द्वितीय वर्ग

इस वर्ग के अंतर्गत पांचवी से आठवीं शताब्दी ईसवी के मध्य स्थानीय राजवंश के शासकों द्वारा जारी किए गए अभिलेखों को रखा गया है।

छत्तीसगढ़ के शासको के अभिलेख

नलवंशीय शासकों के अभिलेख

छत्तीसगढ़ में शासन करने वाले स्थानीय शासकों के क्रम में प्रथम स्थान नलवंशीय शासकों का रहा है। इस वंश के शासकों द्वारा जारी और अब तक प्राप्त अभिलेखों की संख्या चार है। जिसमें से तीन हुआ है। अभिलेखों में तिथि अंकित किया गया है और उसमें निम्नलिखित तिथि अंकन प्रविधि का प्रयोग हुआ है।

  • नलवंशीय शासकों के अभिलेखों में शासकों ने राज्य वर्षों का तो उल्लेख किया है किन्तु इनके अभिलेखों में किसी मानक संवत् का प्रयोग नहीं किया गया है।( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )
  • भवदत्तवर्मा के ऋद्धिपुर ताम्रपत्र में एकादसराज्यवर्षे कार्तिकमासस्यबहुल सप्तम्याम् शब्द का उल्लेख किया गया है। अर्थपति के कैंसरीबेड़ा ताम्रपत्र में संत्वसर 7 मार्गशीर्षमास अमावस्या का उल्लेख है। स्कन्दवर्मन के पोंडागढ़ शिलालेख में बारहवें राज्य वर्ष माघ मास और सत्ताइसवी तिथि का उल्लेख किया है।
  • नलवंशीय शासकों के अभिलखों में संवत्सर तथा तिथि का अंकन शब्द एवं अंक दोनों में किया गया है।
  • इनके द्वारा जारी तीन अभिलेख में से केवल एक में पक्ष (बहुल अर्थात् कृष्णपक्ष) का उल्लेख है।

राजर्षितुल्य कुल के अभिलेख

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में शासन करने वाले स्थानीय शासकों के क्रम में द्वितीय स्थान राजर्षितुल्य कुल के शासकों का है। इस वंश के शासक भीमसेन द्वितीय द्वारा जारी और अब तक प्राप्त केवल एक ही ताम्रपत्र है जो आरंग से प्राप्त हुआ है। इस ताम्रपत्र सर्वप्रथम गुप्त संवत् का उल्लेख किया गया और गुप्तानां सम्वत्सर शते 200 802 (282) भाद्र दि 108 (18) का उल्लेख किया गया है।

  • छत्तीसगढ़ क्षेत्र से प्राप्त यह केवल अकेला अभिलेख है जिसमें स्पष्ट रूप से गुप्त संवत् का प्रयोग हुआ है।
  • इस अभिलेख में सैकड़ा, दहाई और ईकाई के लिये अलग-अलग अंकों का प्रयोग किया गया है। किन्तु पक्ष, नक्षत्र एवं दिन के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है।

शरभपुरीय शासकों के अभिलेख

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में शासन करने वाले स्थानीय शासकों के क्रम में तृतीय स्थान शरभपुरीय राजवंश के शासकों का है। इस वंश के शासकों द्वारा विभिन्न दान के अवसर पर जारी अब तक प्राप्त अभिलेखों की संख्या 20 है। इसमें 174 ताम्रपत्रों में तिथि अंकन तकनीक का प्रयोग किया गया है। जिसमें तिथि अंकन के लिये अनेक प्रविधियों का उपयोग किया गया है।

  • शरभपुरीय शासकों के अधिकांश ताम्रपत्रों में प्रवर्द्धमानविजयसंवत्सर 7 भाद्रपद दिवस 10 जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया है। जिसमें स्पष्ट रूप से राज्य वर्ष और तिथि का अंकन अंक में किया गया है। केवल नरेन्द्र के कुरुद ताम्रपत्र और जयराज के मल्लार ताम्रपत्र में राज्य वर्ष का उल्लेख शब्द एवं अंक दोनों में किया गया जैसे प्रवर्द्धमान विजय सत्वत्सर पंच, 5 कार्तिको 5 जैसे शब्द उत्कीर्ण हैं।
  • सभी अभिलेखों में तिथि का उल्लेख अंक में (1 से 30) के कम में किया गया जिसमें पहले दहाई का। अंक लिखा गया फिर इकाई का अंक उत्कीर्ण है। जैसे, सुदेवराज का आरंग ताम्रपत्र में वैशाख दि 209 अंक उत्कीर्ण है
  • शरभपुरीय शासकों के अभिलेखों में संवत्सर के बारह महीनों में लगभग सभी माह में दान देने का उल्लेख है जैसे वैशाख, माघ, कार्तिक, मागशीर्ष, ज्येष्ठ,. श्रावण, भाद्र (द्विभाद्र) तथा पौष मास आदि का उल्लेख है। यहां पर द्विभाद्र का आशय अधिक मास (मल मास) से है।( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )
  • शरभपुरीय अभिलेखों में दिन एवं मास के नामों का पूरा उल्लेख न कर संक्षिप्तिकरण भी किया गया है। इनके अभिलेखों में भी किसी मानक संवत् एवं नक्षत्र तथा दिन के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है।

मेकल पाण्डुवंशी शासकों के अभिलेख

शरभपुरीय शासकों के पश्चात् इस क्षेत्र में शासन करने वाले मेकल पाण्डुवंशीय शासकों द्वारा जारी और अब तक प्राप्त अभिलेखों की संख्या तीन हैं। जिसमें निम्न तिथि अंकन प्रविधि का प्रयोग किया गया है-

  • मेकल पाण्डुवंशीय शासकों के अभिलेखों में राज्यवर्ष का उल्लेख शब्द एवं अंक दोनों में किया गया है।
  • इनके अभिलेखों में राज्य वर्ष, मास, पक्ष (कृष्ण एवं शुक्ल), नक्षत्र, तिथि एवं दिन या वार का नाम का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया गया है। जैसे- प्रवर्द्धमान विजयराज्यसवत्सर अष्टमे कार्तिक कृष्ण पक्षे एकाश्या पूर्व फाल्गुण्यां बुधदिनेनाति ।
  • पक्ष एवं तिथि तथा दिन के नाम के उल्लेख में विविधता है। जैसे कहीं प्रथम पक्ष कहा तो कहीं कृष्ण पक्ष कहा गया है। इसी प्रकार तिथि के साथ दिन के नाम का भी उल्लेख किया गया है।( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )
  • इस क्षेत्र से प्राप्त मेकल के पाण्डुवंशीय शासकों के अभिलेखों में सर्वप्रथम नक्षत्र के नामों का उल्लेख •मिलता है। जैसे पुष्य, पूर्व, फाल्गुणी, उत्तर भाद्रपद इनके अभिलेखों में भी किसी मानक संवत् का उल्लेख नहीं किया गया है।

कोसल के पाण्डुवंशी शासकों के अभिलेख

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में शासन करने वाले स्थानीय शासकों के क्रम में चौथा और महत्वपूर्ण स्थान कोसल के पाण्डुवंशीय शासकों का है। इस वंश के शासको द्वारा जारी और अब तक प्राप्त अभिलेखों कि संख्या लगभग 50 है •जिसमें से लगभग 60 प्रतिशत अभिलेखो में तिथि अंकन तकनीक का प्रयोग किया गया है। जिसका स्वरूप निम्न रहा है।

  • पाण्डुवंशीय शासकों के अभिलेखों में राज्य वर्ष, मास, तिथि, पक्ष, दिन एवं नक्षत्र के नामों का उल्लेख पूर्व के समान ही मिलता है। किन्तु संवत्सर एवं तिथि तथा दिन का अंकन शब्द एवं अंक दोनों में किया गया है। जो कभी साथ-साथ और कभी अलग अलग मिलता है। जिसमें प्राय: पहले दहाई की संख्या फिर इकाई की संख्या का उल्लेख किया गया है।
  • पाण्डुवंशीय शासकों के कुछ अभिलेखों में मास, तिथि एवं दिन का अंकन अभिलेख के मध्य एवं अंत दोनों स्थान पर किया गया है। जैसे इस प्रकार उल्लेख का प्रारंभ पाण्डुवंशीय शासकों के अभिलेखों से होता है।
  • अंत दोनों स्थान पर किया गया है। इस प्रकार का उल्लेख का प्रारम्भ पाण्डुवंशीय शासकों के अभिलेखों से होता है।( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )
  • इनके अभिलेखों में प्रथम बार अभिलेख जारी करने के पर्वो एवं अवसरों का उल्लेख किया गया है। जैसे अडभार ताम्रपत्र में भाद्र पद कृष्ण द्वादश्यां सकांतो मल्लार ताम्र पत्र आषाढा मावास्या सूर्यग्रहोपरागे तथा सिरपुर ताम्रपत्र में माघ मासो उत्तरायण विसुसकान्त आदि का उल्लेख है।
  • इनके अभिलेखों में भी किसी मानक संवत् का प्रयोग नहीं किया गया है।

तृतीय वर्ग

इस वर्ग के अंतर्गत दसवीं से लेकर के चौदहवीं शताब्दी के मध्य जारी किये गये अभिलेखों को रखा गया है।

कलचुरि कालीन अभिलेख

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में शासन करने वाले स्थानीय शासकों के कम में अंतिम और अति विशिष्ट स्थान रतनपुर एवं रायपुर शाखा के कलचुरि शासकों एवं उनके अधीनस्थ शासकों का रहा है। इनका शासन काल दसवीं शताब्दी ई. से चौदहवीं शताब्दी ई. तक रहा है। इन वंश के शासकों द्वारा दान एवं निर्माण के अवसर पर जारी किये गये और इस क्षेत्र से प्राप्त अभिलेखो कि संख्या लगभग 80 है। जिसमें से लगभग 70 प्रतिशत अभिलेखों में तिथि अंकन तकनीक का प्रयोग किया गया है। जिसमें तिथि अंकन के विविध प्रविधियों का उपयोग हुआ है।

  • कलचुरि शासकों एवं उनके अधीनस्थ शासकों द्वारा जारी किये गये तिथि अंकित अभिलेखों में मानक संवत् का प्रयोग किया गया। जिसके तीन अलग अलग प्रकार मिलते हैं, प्रथम अधिकांश अभिलेखों में कलचुरि चेदि संवत् का प्रयोग किया गया है। द्वितीय कुछ अभिलेखों में विक्रम संवत् का प्रयोग हुआ है और तृतीय कुछ अभिलेखों में शक संवत् का प्रयोग किया गया है।( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )
  • रतनपुर के कलचुरि शासकों के अभिलेखों में के जिस संवत् का उल्लेख किया गया है उसकी गणना 821 अर्थात् (249 ई) से प्रारम्भ होता है जैसे संवत् 821878880, 900, 915, 969 आदि का उल्लेख है। केवल पृथ्वीदेव द्वितीय के कुगदा, राजिम एवं रतनपुर अभिलेखों में तथा रत्नदेव द्वितीय के पारागांव ताम्रपत्र एवं गोपाल देव के शिवरीनारायण शिलालेख में अभिलेखों में कलचुरि संवत्सरे, 885, 893 एवं 910 का उल्लेख है।
  • जाजल्लदेव द्वितीय के शिवरीनाराण शिलालेख एवं रत्नदेव तृतीय खरीद शिलालेख में चेदि संवत् 919 एवं 933 का उल्लेख है।
  • कलचुरि शासक बाहर एवं हरिब्रह्म देव के अभिलेखों में श्री संवत् 1552 समये, संवत् 1570 विक्रम नाम संवत्सरे, श्री संवतु 1458 वर्षे साके 1322 समये सर्वजितनाम संवत्सरे, श्रीसंवत 1470 वर्षे शाके 1334 षष्टयाव्ययोमध्ये प्लवनाम संवत्सरे का उल्लेख है।
  • कलचुरि कालीन अधिकांश अभिलेखों में संवत् का अंकन, अभिलेख के अंत में अंकों में किया गया है।
  • कलचुरि कालीन अधिकांश अभिलेखों में संवत् के साथ-साथ मास, तिथि एवं दिन के नामों का भी उल्लेख किया गया है। जैसे संवत् 205 आस्विन सुदि, 6 भौमे एवं चेदीस संवत् 831 फाल्गुन कृष्ण ससम्या रवि दिने एवं कलचुरि संवत्सरे 896 माघे मास शुक्ल पक्षे रथाष्टाम्या बुद्धदिने जैसे उल्लेख मिलते हैं।
  • तिथि का उल्लेख पक्ष के कम में किया गया. जिसके लिये शुक्ल एवं कृष्ण तथा उसका संक्षिप्त रूप शुद्धि एवं बंदि शब्द के रूप में प्रयोग किया गया है। तिथि लेखन के लिये शब्द एवं अंक दोनों विधियों का प्रयोग किया गया है।
  • अधिकांश अभिलेखों में दान के अवसर जैसे राहूग्रस्ते राजनितिलक, सूर्यग्रहण पर्वाणि संक्रांति समय एवं चैत्रे सोमग्र आदि का उल्लेख अभिलेख के मध्य में और संवत् तिथि, माह, दिन का उल्लेख अभिलेख के अंत में किया गया है।
  • बस्तर के छिंदक नागवंशी शासकों के अधिकांश अभिलेखों में शक संवत् का प्रयोग किया गया है। जैसे- शक् 1246 रक्ताकेशरी संवत्सर चैत्र शुदि 12 •एवं शक् नृप काल तिथि दश शत तृषतम अधिक 921 संवतसर कार्तिक पूर्णिमाया बुद्धवार का उल्लेख है।
  • फणिनागवंशी शासकों के अभिलेखों में कलचुरि चेदि संवत् का प्रयोग किया गया है।
  • कांकेर के सोमवंशी शासकों के अभिलेखों में शक् संवत् एवं कलचुरि चेदि संवत् का प्रयोग किया गया है। जैसे, पम्पराज के तहनकापार ताम्रपत्र में संवत्सरे कार्तिक मासे चित्रारिक्षे रविदिने सूर्योपरागे एवं संदर्भ सूची संवत् 965 भाद्र पदे मृग सिरे सोम दिने एवं भानुदेव के कांकेर शिलालेख में संवत् 1242 रौद्रसंवत्सरे ज्येष्ठ यदि पंचम्या का उल्लेख है।

छत्तीसगढ़ क्षेत्र से प्राप्त अभिलेखों में तिथि लेखन का जो विकास कम मिलता है, उसका ऐतिहासिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है, कि इस क्षेत्र से प्राप्त प्रारंभिक अभिलेखों में किसी प्रकार का तिथि अंकन प्रविधि एवं तिथिलेखन का प्रयोग नहीं किया गया है।

तिथि लेखन का प्रारंभ सर्वप्रथम इस क्षेत्र में सातवाहन कालीन लेखों में मिलता है। द्वितीय चरण का प्रारंभ पांचवी से नवीं शताब्दी के मध्य स्थानीय शासकों के द्वारा जारी किये गये अभिलेखों में से होता है। जिसमें किसी मानक संवत् का प्रयोग नहीं करते हुए केवल शासकों के व्यक्तिगत राज्य वर्षों का ही उल्लेख किया गया है। अपवाद स्वरूप केवल राजर्षितुल्य कुल के शासक द्वारा जारी आरंग ताम्रपत्र में गुप्त संवत् का उल्लेख किया गया है।( छत्तीसगढ़ शासको के प्राप्त अभिलेख | Chhattisgarh Shasako ke Prapt Abhilekh | Records of the rulers of Chhattisgarh )

तृतीय चरण में मानक संवत् का प्रयोग सर्वप्रथम इस क्षेत्र में रतनपुर के कलचुरि शासकों के शासनकाल में में प्रारंभ हुआ और उनके अधिकांश अभिलेखों में कलचुरि चेदि संवत् का ही प्रयोग किया गया है। कलचुरि वंश के अंतिम शासक एवं इनके अधीनस्थ शासकों के अभिलेखों में मानक राष्ट्रीय संवत् शक् एवं विक्रम संवत् का भी प्रयोग प्रारम्भ हो गया।

इस प्रकार छत्तीसगढ़ क्षेत्र के अभिलेखों में तिथिलेखन के प्रयोग एवं परंपरा में शास्त्रीय एवं स्थानीय प्रभाव साथ-साथ दिखाई पड़ता है। इन तिथि अंकित अभिलेखों का छत्तीसगढ़ क्षेत्र के स्थानीय राजवंश के इतिहास पुर्नलेखन एवं शासकों के कालक्रम के निर्धारण में विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान है।

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विद्रोह :-

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