छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path

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chhattisgarh ram van gaman path
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छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path

छत्तीसगढ़ के रोम रोम में है राम , यह बात ऐसे ही नहीं कहा जाता है , भगवान राम ने छत्तीसगढ़ वनवास काल के दौरान छत्तीसगढ़ के 74 स्थानों का भ्रमण किया था , और वे उनमे से 65 जगहों पर रुके भी थे । तो आईये आज हमारे साथ पड़ते है उन जगहों पर जहा भगवान राम रुके थे और उसी को आज हमारी छत्तीसगढ़ की सरकार छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ के नाम से विकसित कर रही है ।

छत्तीसगढ़ के पहले भगवान राम 

  1. प्रयागराज के आसपास का इलाका : अयोध्या से निकलने के बाद सबसे पहले राम, सीता और लक्ष्मण तमसा नदी पहुंचे थे। यहां से प्रयागराज होते हुए वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे थे जहां उनकी मुलाकात निषादराज गुहा से हुई थी। वर्तमान में यह स्थान सिंगरौर के नाम से जाना जाता है, यहीं से निषादराज की नाव में सवार होकर उन्होंने गंगा नदी पार की थी। नदी के दूसरी तरफ करई नाम की जगह पर उन्होंने कुछ देर विश्राम किया था।( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )
  2. चित्रकूट के आसपास का इलाका : प्रयाग के बाद भगवान राम मध्यप्रदेश के चित्रकूट पहुंचे थे। यहीं भरत, राजा दशरथ की मृत्यु का समाचार लेकर पहुंचे थे राम वापस चलने को तैयार नहीं हुए तो भरत उनकी चरण पादुका लेकर लौट गए थे। चित्रकूट के वन में अभि ऋषि का आश्रम था, जिनके सानिध्य में भगवान राम ने कुछ वक्त बिताए थे अत्रि ऋषि के आश्रम के बाद दंडकारण्य शुरू होता था।

 

छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ के प्रमाण  

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने 14 वर्ष वनवास में गुजारे, जिसके लगभग 12 साल उन्होंने छत्तीसगढ़ में बिताए थे। उन्होंने यहां 12 स्थानों पर चातुर्मास बिताया और भगवान शिव की आराधना की। यहां जंगल में रहने वाले साधु-संतों से मिले और ज्ञानार्जन किया।

साधु व साधकों को परेशान करने वाले राक्षसों का वध किया। दंडकारण्य वन को राक्षसों से मुक्त किया। यह बातें शोध में सामने आई हैं राम वन गमन शोध संस्थान की ओर से वर्षों तक किए गए गहन शोध में। संस्थान के 9 सदस्यों की समिति ने छत्तीसगढ़ में श्रीराम के प्रवेश से लेकर पंचवटी जाने के पहले तक के स्थानों का वर्णन किया है।

रीसर्च किया गया है लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता है की जो स्थान खोजे गए है उनमे अंतर न आ जाये , शोध में पहचाने गए स्थान में कुछ अंतर भी संभव है , हजारो वर्षो में टेक्टोनिक्स प्लेट में कई बार खिसकाव हुआ है , इसी कारन से उस वक्त के मूल स्थान और वर्तमान भारत के भगौलिक स्थिति में अंतर देखा जाता है ( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )

रिसर्च में श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में पदयात्रा करते हुए लगभग 1100 किमी की दूरी तय की। दर्जनों ऐसे स्थानों को ऐतिहासिक सबूतों के साथ चिन्हित किया गया है जहां राम ठहरे या जहां से गुजरे। बैसाख मास की शुक्ल पक्ष सीता नवमी  के दिन हम बता रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में वनवास के दौरान राम कहां-कहां रहे थे।

अगर ग्रंथो का प्रमाण देखा जाये तो उसमे बाल्मीकि रामायण में कुछ श्लोक आते है :-

प्रविश्य तू महारण्य दण्डकरण्यामत्वं ।
रामो ददर्श दुर्दर्श्तापैसाश्रममंडलम ।

जिसका अर्थ है :- दंडकारण्य नामक महा-वन में प्रवेश करके मन को वश में रखने वाले दुर्जय वीर श्री राम ने तपस्वियों और मुनियो के बहुत से आश्रम देखे ।

 

छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ का भगौलिक सीमा

आईये हम सभी जान लेते है , की भगवान राम ने कहा बिताये थे 12 चातुर्मास , वैसे भगवान राम ने तो शुरू के 3 साल ही अंबिकापुर  और सरगुजा में बिताये थे ।

Chhattisgarh ram van gaman path map
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प्रवेश द्वार :

भगवान राम ने छत्तीसगढ़ में सीतामढ़ी-हरचौका से प्रवेश किया। भरतपुर के पास स्थित यह स्थान मवई नदी के तट पर है। यहां गुफानुमा 17 कक्ष हैं जहां रहकर श्रीराम ने शिव की आराधना की।

हरचौका में कुछ समय बिताने के बाद वे मवई नदी से होते हुए रापा नदी पहुंचे। यहां से सीतामढ़ी घाघरा पहुंचे। कुछ दिन यहां रुकने के बाद घाघरा से कोटाडोल पहुंचे। यहां से नेउर नदी तट पर बने छतौड़ा पहुंचे, जहां भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने पहला चातुर्मास बिताया।

कोरिया , सीतामढ़ी :

यहाँ अनुसुइया माता ने सीता को नारी धर्म का ज्ञान दिया था । कोरिया जिले का सीतामढ़ी श्रीरामचन्द्र जी के वनवास काल का पहला पड़ाव माना जाता है। नदी के किनारे इस स्थान पर गुफाओं में 17 कक्ष हैं जो सीता की रसोई के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहीं पर अत्री मुनि के आश्रम में माता अनुसुइया ने सीता जी को नारी धर्म का ज्ञान दिया था। इस वजह से इस क्षेत्र को सीतामढ़ी के नाम से जाना जाता है।( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )

सरगुजा, रामगढ़ :

यहाँ भगवान राम रामगिरी पर्वत पर कुछ समय तक ठहरे, पौराणिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में रामगिरि पर्वत का उल्लेख आता है। सरगुजा जिले का यही रामगिरी रामगढ़ पर्वत है। यहां स्थित सीताबेंगरा- जोगीमारा गुफा की रंगशाला को विश्व की सबसे प्राचीन रंगशाला माना जाता है। वन गमन काल में श्रीरामचंद्र जी के साथ सीता जी ने यहां कुछ समय व्यतीत किया था। इससे इस गुफा का नाम सीताबेंगरा पड़ा।( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )

छतौड़ा आश्रम से देवसील होकर रामगढ़ की तलहटी से होते हुए तीनों सोनहट पहुंचे। यहां सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफा में दूसरा चातुर्मास बिताया। यहां हसदो नदी का उद्गम होता है। इसके किनारे चलते हुए तीनों अमृतधारा पहुंचे। यहां कुछ दिन रहने के बाद जटाशंकरी गुफा फिर बैकुंठपुर होते हुए पटना-देवगढ़ आए। आगे सूरजपुर में रेण नदी के तट पर पहुंचे। फिर विश्रामपुर होते हुए अंबिकापुर पहुंचे। पहले सारारोर जलकुंड फिर महानदी तट से चलते हुए ओडगी पहुंचे।

लक्ष्मणगढ़-धर्मजयगढ़ :

ओडगी के बाद हथफोर गुफा से होते हुए तीनों लक्ष्मणगढ़ पहुंचे। फिर महेशपुर में ऋषियों का मार्गदर्शन लेकर चंदन मिट्टी गुफा पहुंचे। रेणु नदी के तट से होते हुए बड़े दमाली व शरभंजा गांव आए। यहां से मैनी नदी व मांड नदी तट से होते हुए देउरपुर आए। रक्सगंडा में हजारों राक्षसों का वध किया। फिर किलकिला में तीसरा चातुर्मास बिताया फिर धर्मजयगढ़ पहुंचे। इसके बाद अंबे टिकरा होते हुए चंद्रपुर आए। इस तरह सरगुजा व जशपुर क्षेत्र में तीन साल बिताए।

जांजगीर-चापा, शिवरीनारायण

यही पर माता शबरी ने वात्सल्यवश राम को खिलाए थे मीठे बेर , जांजगीर-चांपा जिले में प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण शिवनाथ, जोंक और महानदी का त्रिवेणी संगम स्थल शिवरीनारायण है। इस विष्णुकांक्षी तीर्थ का संबंध शबरी और नारायण से होने के कारण इसे शबरी नारायण या शिवरीनारायण कहा जाता है। इसी स्थान पर माता शबरी ने वात्सल्यवश बेर चखकर मीठे बेर रामचंद्र जी को खिलाए थे। यहां कृष्णा वट वृक्ष के पत्ते दोने जैसे हैं।( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )

बलौदा बाजार , तुरतुरिया

यहाँ वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश का जन्म हुआ था । जिले में सघन वन क्षेत्र से घिरा बालमदेवी नदी तट पर बसा तुरतुरिया छोटा सा गांव है। जनश्रुति के अनुसार महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं था और तुरतुरिया ही राम-सीता के पुत्रद्वय लव-कुश की जन्मस्थली है। यहां पर नदी का पानी प्राकृतिक चट्टानों से होकर तुरतुर की ध्वनि के साथ प्रवाहित होता है, जिससे इस स्थान का नाम तुरतुरिया पड़ा।

वाल्मीकि आश्रम चंद्रपुर के बाद राम शिवरीनारायण पहुंचे। यहां चौथा चौमासा बिताया। इसके बाद खरौद  फिर यहाँ से मल्हार गए। यहां से महानदी के तट पर चलते हुए आगे बढ़े और धमनी, नारायणपुर होतुरंतुरस्थित वाल्मीकि आश्रम पहुंचे। कुछ दिन यहां बिताने के बाद सिरपुर आए। यहां से आरंग होते हुए फिश्वर के मांडव्य आश्रम पहुंचे।( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )

इसके बाद चंपारण्य होते हुए कमलक्षेत्र राजिम पहुंचे। यहां से पंचकोशी तो की यात्रा करते हुए आगे बढ़े और मगरलोड से सिरकट्टी आश्रम होते हुए मधुवन पहुंचे। यहां से देवपुर गए। फरक होते हुए अंतरमरा में अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचे। फिर रुद्री, गंगरेल होते हुए दुधावा होकर देवखुंट और फिर सिहावा  पहुंचे।

रायपुर , चंद्रखुरी

माता कौशल्या की. जन्मस्थली, मंदिर भी , चंद्रवंशीय राजाओं के नाम से चंद्रपुरी कहलाने वाला ग्राम चंदखुरी माता कौशल्या की जन्मस्थली और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का ननिहाल है। राजधानी रायपुर से 27 किमी की दूरी पर 126 तालाबों वाले इस गांव में जलसेन तालाब के बीच में भारत का एकमात्र माता कौशल्या का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। पुत्र रामचंद्र माता की गोद में बैठे हैं।

गरियाबंद, राजिम संगम

सियाराम ने लक्ष्मण के साथ महादेव के दर्शन किए, अपने वनवास काल में सियाराम ने आरंग से नदी मार्ग से चंपारण्य और फिर महानदी जल मार्ग से राजिम में प्रवेश किया। महानदी, सोंढूर और पैरी नदी के संगम के कारण छत्तीसगढ़ का प्रयागराज माना जाने वाला राजिम प्राचीन समय में कमल क्षेत्र पद्मावतीपुरा था। लोमश ऋषि के आश्रम में कुछ समय व्यतीत किया था। कुलेश्वर महादेव की स्थापना एवं पूजन कर पंचकोशी की यात्रा की थी।

धमतरी, सिहावा

श्रृंगी ऋषि ने कराया राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ, धमतरी से 65 किमी की दूरी पर घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ पवित्र स्थल सिहावा है। छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी पौराणिक महानदी का यह उद्गम क्षेत्र है। श्रृंगी ऋषि का आश्रम होने के कारण इसे सिहावा कहा जाता है। मान्यता है कि राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए सिहावा से श्रृंगी ऋषि को पुत्रेष्टि यज्ञ के लिए अयोध्या आमंत्रित किया था।( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )

सिहावा में ज्यादा समय: शोध के नेतृत्वकर्ता डॉ. मन्नूलाल यदु का दावा है कि धमतरी जिले के पास नगरी सिहावा में राम का सबसे ज्यादा समय बीता है। इसके पीछे उनका तर्क है कि सिहावा में रहने वाले ऋषिश्रृंगी दशरथ की दत्तक पुत्री शांता के पति थे। यह स्थान उनके जीजाजी का रहा है। यहां स्थित शांता गुफा इसका प्रमाण है।

 

राम वन गमन पथ के अंतर्गत किये जा रहे विकास कार्य

  • रामायणकालीन थीम पर निर्माण कार्य हो रहे है
  • विद्युतीकरण, लाईट एवं साउण्ड शो
  • व्यू पॉइण्ट, लैण्ड स्केपिंग
  • साइनेजेस/वेलकम गेट/कैंटीलीवर
  • राम वन गमन पथ पर वृक्षारोपण, जैव विविधता पार्क
  • सड़क निर्माण/मरम्मत कार्य
  • वाई-फाई सुविधा
  • ज्योत कक्ष
  • पार्किंग एरिया निर्माण
  • भगवान राम की मूर्ति निर्माण एवं दीप स्तंभ
  • भव्य प्रवेश द्वार
  • रामायण इंटरप्रिटेशन सेंटर/पर्यटन सूचना केन्द्र
  • कैफैटेरिया, मॉड्यूलर शॉप
  • घाट निर्माण एवं सौंदर्यीकरण
  • मंदिर जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण
  • पब्लिक टॉयलेट, पेयजल व्यवस्था
  • कॉटेज / डॉरमेटरी/टैण्ट निर्माण
chhattisgarh ram van gaman path vikas karya
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भूपेश बघेल क्या कहते है भगवान राम के बारे में ?

छत्तीसगढ़ श्रीराम की माता कौशल्या जी की जन्मस्थली है। इसलिए छत्तीसगढ़ वासियों का राम से मामा-भांजे का नाता है। छत्तीसगढ़ी परंपरा में भांजे को बहुत मान-सम्मान दिया जाता है। इसलिए भगवान राम जितने अयोध्या के हैं उतने ही छत्तीसगढ़ के भी हैं। छत्तीसगढ़ की पावन धरा में रामायण काल की अनेक घटनाएं घटित हुई, जिसका प्रमाण यहां की लोक संस्कृति, लोककला एवं जीवनशैली में मिलता है।( छत्तीसगढ़ राम वन गमन पथ | Chhattisgarh Ram Van Gaman Path )

हमारी परंपरा में सुबह शाम राम का ही नाम लिया जाता हैं। हमारे लिए राम केवल आस्था ही नहीं हैं, बल्कि वे जीवन की एक अवस्था और जीवन की आदर्श व्यवस्था भी हैं। अपने वनवास काल के लगभग 12 वर्ष प्रभु ने छत्तीसगढ़ में ही बिताए थे। छत्तीसगढ़ सरकार उन स्थलों को तीर्थ एवं पर्यटन स्थल (राम वनगमन पथ) के रूप में विकसित कर रही है। यह योजना हमारी संस्कृति और ‘भगवान श्रीराम को समझने में सहायक सिद्ध होगी। मेरा देशवासियों से आग्रह है कि वे भगवान श्रीराम के ननिहाल छत्तीसगढ़ एक बार अवश्य पधारें।

भूपेश बघेल, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

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