छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh

Share your love
4/5 - (1vote)

छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh

गोदना एक प्राचीन कला है। विश्व भर में इसे आदिवासी संस्कृति का अंग माना जाता है। गोदना शब्द का अर्थ है किसी सतह को बार बार छेदना, अर्थात अनेक बार छिद्रित करना। समूचे भारत की भांति छत्तीसगढ़ में भी गोदना, यहाँ की आदिवासी एवं ग्रामीण संस्कृति का अभिन्न अंग है।

छत्तीसगढ़ में गोदना की इसकी जड़े वहाँ के समाज, संस्कृति, लोक मान्यताओं और धार्मिक आस्थाओं में रची-बसी हैं। छत्तीसगढ़ में विभिन्न जनजातीय और दूसरे समुदायों में अपनी-अपनी लोक मान्यताओं और धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप गोदने गुदवाए जाते हैं,

पौराणिक है गोदना का इतिहास

हिन्दू धर्म में लगभग सभी जातियों में गोदना प्रथा का प्रचलन है। अपने हाथों में नाम लिखवाना या फिर कोई धार्मिक शब्द लिखवाना इस प्रथा को बल देता है। रामायण और महाभारत काल में भी इसका जिक्र आता है। कृष्ण लीला में गोदना गोदनी का जिक्र आता है, कृष्ण नटीन के रूप में गोपियों के हाथों पर गोदना गोदा करते थे। इसके अलावा वैष्णव संप्रदाय के लोग भी सदियों से अपने हाथों पर शंख, गदा, कमल ओर चक्र का गोदन गोदवाते आ रहे हैं। वहीं शैव संप्रदाय वाले त्रिशूल गुदवाते हैं।

छत्तीसगढ़ में सर्वमान्य मान्यता यह है कि गोदना स्त्रियों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आभूषण हैं। मृत्यु के बाद सारे आभूषण इसी संसार में रह जाते हैं, केवल गोदना ही देह के साथ परलोक तक साथ जायेगा। इस विश्वास के चलते गोदना को स्थानापन्न गहनों की भांति शरीर के उन अंगों पर बनवाया जाता है जहाँ अन्य आभूषण पहने जाते हैं। ( छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh )

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

गोदने का चिकित्सकीय उपयोग भी किया जाता है, बच्चों के अपंग होने पर उनके हाथ-पैर पर किसी विशेष स्थान पर गोदना कराया जाता है जिससे वह अंग क्रियाशील हो सके। चीन में जैसे सुई शरीर में चुभाकर एक्यूपंचर कई बिमारीयाँ दूर करते हैं, उसी तरह गोदना भी शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करती है।

गोदने स्त्री को माँ बनने के दौरान होने वाली प्रसव पीड़ा को सहने की क्षमता प्रदान करते हैं। स्त्रयों के बच्चे न होने पर नाभि के ‘नीचे गोदना करवाकर उनकी कोख खुलवाई जाती है। इस गोदना प्रथा सब के अतिरिक्त कई लोग अपना स्वयं का, अपने प्रिय का, अपने मित्र का, अपने इष्ट देवी देवता का नाम अथवा चित्र गुदवाते हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि गोदना के कारण आत्मायें क्षति नहीं पहुँचा सकती।

गोदना की परंपरा लेकर लोक मान्यताएँ, जनश्रुतियाँ एक बैगा कथा के अनुसार जब सृष्टि की रचना की गई तो वह देवताओं के बीच विवाद होने से नाराज होकर भगवान इंद्र चले गए। भगवान शंकर और पार्वती पृथ्वी की सेवा करने वाले नागा बैगा और नागा बैगिन के पास गए और उनसे आग्रह किया कि वे भगवान इंद्र के पास जाकर उन्हें पृथ्वी पर बरसात करने के लिए राजी करें। ( छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh )

बैगा बैगिन चिंता में पड़ गए कि वे बिना श्रृंगार के भगवान इंद के दरबार में कैसे जाएँ। भगवान शंकर और पार्वती ने उनकी इस चिंता का निदान करते हुए गोदना गोदने वाले दंपती. बादी बदनिन को गढ़ा। बदनिन ने बैगिन के शरीर को गोदने से गोदकर श्रृंगारित किया। इसके बाद सज-धजकर ‘बैगा-बैगिन के साथ भगवान इंद्र के दरबार में पहुँचा और उनसे विनती की कि पृथ्वी लोक पर पानी न बरसने के कारण बड़ी बुरी स्थिति हो गई है।

भगवान शंकर बरसात की उम्मीद में खेत जोतने के लिए हल चलाने लगे। भगवान शंकर का हल चलाना था कि खेत में दुबका बैठा मेढक टर्र-टर्र करने लगा। मेढक की आवाज सुनकर पहले मोर फिर दूसरे पशु-पक्षी एक सुर में आवाज लगाने लगे। इस संवेत शोर को सुनकर भगवान इंद्र को लगा कि कहीं सारे जीव-जंतु इंद्र लोक पर धावा न कर दें, इसलिए वे धरती पर बारिश करवाने के लिए तैयार हो गए। ( छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh )

एक मान्यता है कि गोदना गुदवाने से स्वर्ग में स्थान मिलता है। इसलिए इसे स्वर्ग जाने का पासपोर्ट भी कहा जाता है। एक मान्यता प्रचलित है की हथेली के पीछे में गोदना नहीं रहने से मरने के बाद स्वर्ग में अंजलि से पानी गिर जाता और व्यक्ति प्यासा रह जाता है। जनजातीय मान्यता अनुसार बिना गोंदना गुदवाए नारी को मरने के बाद भगवान के सामने सब्बल से गुदवाना पड़ता है। मरने के बाद गोदना ही पैसा के रुप में साथ जाता है। रमरमिहा जाती में मान्यता प्रचलित है की भगवान गोदना से ही सच्चे भक्त की पहचान करते हैं।

गोदने वाली जातियां

इस कला में सबसे ज्यादा निपुण वादी, देवार, भाट, कंजर, बंजारा, और मलार माने जाते हैं। गोदने वाली महिलायें पारम्परिक रुप से ये कला अपनाती आ रही हैं। इनका बहुत आदर होता है। गोदने के लिये उन्हें लोग घर में आमंत्रित करते हैं। कभी-कभी गांव-गांव में, एक घर से दूसरे घर पैदल घुमती है गुदने वाली महिलाये – उनके सर पर बाँस की टोकरियाँ होती हैं जिसमें गोदने की सामग्री होती है।

गोदना गुदवाना उत्सवपूर्ण परंपरा की तरह होता है। पहले गोदना गोदने वाले बादी बदनिन गांव-गांव ‘जाकर गोदना गोदते थे, लेकिन वे अब मेले और मढई के दौरान अपनी दुकानें लगाने में ज्यादा सुविधा महसूस करते हैं। इस प्रक्रिया में बादी और बदनिन पूरी तौर पर अभ्यस्त होते हैं।

बादी अपने आप को मूलतः गोंड मानते हैं। गोदना काम करने के कारण गोंड भी इन्हें निम्नं मानाने लगे हैं। वे इनका बनाया खाना नहीं खाते, इनका छुआ पानी भी नहीं पीते। बादी कहते हैं सीकरी देव हमारा सबसे बड़ा देव है. इसके साथ हम बूढ़ी माई और बूढ़ा देव की पूजा करते हैं। इनका वास साजा झाड़ में मानते हैं। ( छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh )

साजा झाड़ के नीचे देवल बनाते हैं जिसे सरना कहते हैं। सींकरी देव की वार्षिक जात्रा भादो माह की एकादशी को होती है, इस दिन उसे काली मुर्गी चढाई जाती है। घर के अंदर इनका स्थान रसोई में माना जाता है। गोदना के काम में स्त्रियों के मासिक धर्म का बहुत ध्यान रखते हैं उस समय कोई बादी स्त्री गोदना नहीं करती। यदि उसने ऐसा किया तो गोदना के जख्म पक जाते हैं।

इसे पुनः पवित्र करने के लये सिंकरी देव की पूजा करनी पड़ती है गोदना का रंग गोदने के लिए भिलवां रस, मालवन वृक्ष रस या रमतिला का तेल जलाकर काजल तैयार किया जाता है। इसी काजल को पानी में घोलकर गोदने की स्याही बनाई जाती है बहुत पहले बबूल के कांटे को बलोर के रस में डूबोकर गोदना गोदा जाता था।

प्रक्रिया – गोदना गोदने के लिए सुईयों का प्रयोग होता है सुईयों की संख्या गोदने की आकृति के अनुसार उपयोग में लाई जाती है। कम चौडी गोदना के लिए चार सुईयां और अधिक चौडी के लिए छ:- सात सुईयों का यूज होता है। हाथ, पैर, पीठ और माथा गोदनों के प्रमुख स्थान होते हैं बैगा गोदनों में आकृतियाँ मोटी रेखाओं से मिलकर आकार ग्रहण करती हैं, पच्चीस मोटी सुइयों को एक साथ बाँधकर बनाए जाते हैं।

वहीं अन्य जनजातियों में गोदने छोटे होते हैं। गोदने एक से लेकर तीन सुइयों से गोदे जाते हैं। पहले बाँस की काड़ी के जरिए शरीर पर आकृति बनाई जाती है, फिर उसी आकृति को विभिन्न आकार-प्रकार की सुइयों के संयोजन से गोदा जाता है। इस दौरान दर्द होता है। ( छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh )

गोदना गुदवाने के दौरान खून की बूँदें बाहर आ जाती हैं जिन्हें पोंछकर फिर यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है, बाद में गोदना गुदवाने के स्थान को गोबर पानी, हल्दी, रंगतीला का तेल लगाकर साफ किया जाता है। बरसात के महीने में गुदना नदी गुदवाते है। बैगा पुरुष कभी गुदना नहीं गुदवाते । पर वे अपने हाथ की कलाई में निशान जरुर दागते हैं।

गोदना गुदवाने का विषय-सभी जनजाति में अलग-अलग है। गोदना के रूप में सामान्यतया फूल, झाड़ू बावड़ी, मुर्गा जोड़ी, सीता चौक, रथ, अन्न के ढेर, चूल्हे में आग, खड़ी फसल और भगवान के नाम व चित्र का अंकन किया जाता है कुछ आकृतियां सभी जनजाति के लोग गुदवाते हैं मोर की आकृति सभी जनजातियों में गुदवाने का तरीका भिन्न-भिन्न होता है। इसी तरह राम-सीता की रसोई।

नाम की गोदना लगभग सभी जनजातियों में प्रचलित है। गोदना के अन्य विषय बिच्छू, सूर्य, चन्द्रमा, तारा, ‘सिंहासन, धरती, अप्व और फूल-पत्तियां प्रचलित हैं। माथे पर गोदना का अंकन आदिकाल से चला आ रहा है। इस गोदने को देखकर जनजातियां की पहचान आसानी से की जा सकती है। ( छत्तीसगढ़ में गोदना प्रथा | Chhattisgarh me Godna Pratha | Tattooing practice in chhattisgarh )

इसी तरह हाथ, पैर, जांघ, कोहनी, खुरुवा, सुपली, ठोडी, नाक, कान, गला, अंगूठा, कलाई और पंजा सहित शरीर के प्रत्येक अंगों में गोदना गुदवाये जाते हैं। महिलायें प्रायः शरीर के प्रत्येक अंगों में गुदवाती हैं। पुरुषों में यह कम देखने को मिलता है। वे केवल एक दो बिन्दी या नाम गुदवाते हैं। गोदना गुदवाने का कोई निष्चित समय नहीं है। बरसात के मौसम को छोड़कर कभी भी गोदना गुदवाया जा सकता है।

गोदना के प्रकार

छत्तीसगढ़ समाज में अलग-अलग जनजातियों और समुदायों में अलग-अलग आकार प्रकार होते हैं। जाति विशेष की महिलाओं की पहचान गोदना कला के आरेखन से की जा सकती है। नगेसिया और पहाड़ी कोरबा आदिवासी गोदना नहीं कराते, इनके अतिरिक्त सभी आदिवासी गोदना कराते हैं। इनमें प्रमुख हैं-गोंड गोदना, बैगा गोदना, उराँव गोदना और कोरवा गोदना । यह गोदना विशेष चिह्नों, आकृतियों, गोत्र चिह्नों के आधार पर विभक्त होते हैं।

उरांव गोदना- माथे और कनपटी पर तीन रेखाओं वाला गोदना

• गोंड गोदना -महिलाएँ दोहरा जट गुदवाती हैं। इसमें पहले करेला चानी गोदा जाता है, फिर उसकी ऊपरी सतह पर डोरा गोदा जाता है। उसके ऊपर दोहरा जट गोदा जाता है और अगल-बगल में फूल बनाए जाते हैं। फिर इसमें गोंड जाति के गोदना की पहचान बनती है।

मंझवार जाति – में जट गोदना का प्रचलन है। इसमें सबसे पहले सिकरी या लवंग फूल उसके ऊपर थाम्हा खूरा और सबसे ऊपर जट गोदा जाता है।

कंवर जाति- में पहले करेला चानी, फिर सिकरी, फिर लवंग फूल, उसके ऊपर थाम्हा खूरा और सबसे ऊपर सादा हाथी गोदा जाता है।

रजवार गोदना– में पाँव और बाँह पर हाथी गोदना गुदवाने की प्रथा है। रजवान गोदना में छंदुआ हाथी होता है। इसमें सबसे पहले करेला चानी, फिर सिकरी, लवंग फूल, थाम्हा खूरा और सबसे ऊपर छंदुआ हाथी गोदा जाता है। बैगा गोदना- जहाँ आकार में बड़े होते हैं, वहीं गोंड समेत अन्य गोदना छोटे होते हैं।

कंवर आदिवासी – हाथी का मोटिफ अधिक बनवाते हैं। बड़ीला कंवर बुंदकिया गोदना और पोथी मोटिफ बनवते हैं। रजवार जाति की महिलाएं जट मोटिफ बनवाना पसंद करतीं हैं। इस क्षेत्र में सीकरी, डोरा, लवंगफूल, करेला चानी, हाथी, पोथी, चक्कर, जट, चाउर, फुलवारी, चिरई गोड़, चंदरमा, कोहड़ा फूल, अरंडी डार, मछरी, भैसा सींघ, करंजुआ पक्षी, कडाकुल सेर, सैंधरा और मछरी कांटा जैसे मोटिफ लोकप्रिय हैं।

बैगा जनजाति – के लोग गोदना ज्यादा अनुष्ठानिक व उत्सवपूर्ण तरीके से गुदवाते हैं स्त्रियाँ अपनी बस्ती से दूर जाकर जंगल में गोदना गुदवाती हैं। आठ-नौ वर्ष की उम्र में लड़की के सिर पर गोदना गुदवाया जाता है, फिर 14 वर्ष की उम्र तक पीठ पर, 16 साल की उम्र होते-होते हाथ और पैरों में आगे की तरफ, 16 से 18 साल के बीच हाथ-पैरों के पीछे की तरफ गोदना गुदवाया जाता है। इसके बाद जब लड़की माँ बन जाती है, तब सीने के आगे की तरफ गोदना गुदवाया जाता है।

भील, भिलाला जनजातीय –समुदाय में स्त्री-पुरुष सभी गोदना गुदवाते हैं। इस जनजातीय समुदाय में जो परंपरा है उसके मुताबिक 12-13 साल की उम्र में पहला, गोदना बाएँ हाथ पर गुदवाया जाता है जिसे चीता मावड़ी कहते हैं। लड़कियाँ हाथों, पैरों और छाती पर चौक, मोर का जोड़ा, फूल, बिच्छू ठोड़ी पर बंदकियाँ आदि गुदवाती हैं। इस जनजातीय समुदाय में गोदना गोदने वाले स्त्री-पुरुष को गोदावरा गोदावरी कहा जाता है।

गोदावरा-गोदावरी की गोदना गोदने की प्रक्रिया बादी बदनिन की तरह ही होती है। वे पहले रंग को बाँस की काही से रँगकर शरीर पर आकृति बनाते हैं, फिर विभिन्न आकार-प्रकार और संख्या में सुइयों का संयोजन कर गोदना गोदते हैं। गोदना गुदवाने के बाद छलक आई खून की बूंदों को पोंछकर फिर गोदने को पुख्ता आकार दिया जाता है, बाद में मीठा तेल लगाकर साफ कर लिया जाता है।

उरांव जनजाति -में गोदना प्रथा एक ऐतिहासिक घटना से जुडी हुई है। उरांव बोली कुडूख में इसे बन्ना चखरना कहते हैं। इसका मतलब बार गोदना होता हैं। उरांव जनजाति की महिलायें अपने माथे पर तीन खडी लकीर अर्थात एक सौ ग्यारह (TT1) रोहतसगढ़ (पटना बिहार) लड़ाई की यादगार में गुदवाती हैं उरांव जनजाति के लोग बताते हैं कि रोहतसगढ़ कीला में औरंगजेब के शासन काल के समय मुगल सेना की एक टुकडी तीन बार अक्रमण की। जिसमें महिलायें पुरुष वेष-भूषा में वीरता पूर्वक लडते हुए हरायीं थीं।

लुंदरी ग्वालन ने मुगल सेना को बताया कि पुरुष भेष-भूषा में महिलायें ही लडाई करती हैं। इस बात की जानकारी मिलते ही मुगल सेना पुनः आक्रमण की और वे विजयी हुये । हारने के बाद उरांव लोग दास्ता स्वीकार नहीं किये और पलामू से राँची व सरगुजा में बस गये। यही कारण है कि 12 वर्ष में एक बार रोहतसगढ़ की याद में उरांव जनजाति के लोग जनीषिकार उत्सव मनाते हैं। जिसमें केवल महिलायें भाग लेती हैं।

छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाके से अलग बुंदकिया गोदना अधिक लोकप्रिय है। अर्थात बिंदुओं के समूह से बने पैटर्न। यहाँ पहुंची, बिच्छू, पुतरा, तिकोनिआ, हथौड़ी एवं चूढ़ा जैसे पैटर्न अधिक प्रचलन में हैं। गोदना प्रथा बस्तर, सरगुजा, कांकेर, कर्वधा और जयपुर की जनजातीय संस्कृति से अधिक जुडी हुई

है ।

बस्तर में महिलाएँ गोदना बड़ी ललक के साथ गुदवाती हैं। बस्तर में गोदना का काम ओझा जाति के लोग करते हैं इन्हें नाग भी कहा जाता है। गोदने का कार्य माँ या परिवार में कोई बड़ी-बूढ़ी महिला करती है, जिसे गुदनारी भी कहा जाता है। विवाह के पूर्व कन्याओं के अंगों का गुदना आवश्यक है। नहीं हो तो ससुर लड़की के पिता से इसके एवज में क्षतिपूर्ति वसूलता है मान्यताएँ जुड़ी हैं जो महिलाएँ अपने शरीर पर गोत्र चिह्न गुदवाती हैं, उनके पूर्वजों की मृत आत्माएँ संकट की घड़ी में उनकी रक्षा करती हैं।

दाहिने कंधे और छाती पर किसी देवी-देवता का प्रतीक गुदवाती हैं, उसे कभी कोई हानि नहीं पहुँचा सकता है। पैरों में गोदना है उसे स्वर्ग की सीढ़ी चढ़ने में जरा सी भी परेशानी नहीं आती है। जो महिलाएँ अपने घुटनों के ऊपर सामने की और गोदना गुदवाती हैं, उनके पैरों में घोड़ों की सी शक्ति होती है। बस्तर अंचल की अबुझमाडियां दण्डामी माडियां, मुरिया, दोरला, परजा, घुरुवा जनजाति की महिलाओं में गोदना गुदवाने का रिवाज पारम्परिक है। बस्तर, कांकेर के जनजातियों में

रामनामी समाज में गोदना

इस समाज के लोगों का निवास मुख्यतः महानदी के तटवर्ती रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, सारंगगढ़, जांजगीर, मालखरौदा, चंद्रपुर, कसडोल और बिलाईगढ़ के करीब तीन सौ ग्रामों में जनसंख्या लगभग पाँच लाख के ऊपर है। रामनामी पंथ अनुसुचित जाति की एक शाखा है रामनामी समाज के लोग अपने चेहरे समेत पूरे शरीर में राम का नाम गुदवा लेते हैं। ऐसा ये अपनी राम के प्रति गहरी भक्ति के कारण करते हैं।

रामनामी समाज में लड़का पैदा होने पर निश्चित उम्र में एक संस्कार के तहत शरीर पर राम नाम गुदवाया जाता है, लेकिन लड़कियों के शरीर पर राम नाम विवाह के बाद ही हैं। पहले रामनामी समाज के लोग पूरे शरीर, चेहरे, यहाँ तक कि सिर में भी राम नाम गुदवाते थे, अब समाज के युवा सिर्फ मागे, कलाई या शरीर के किसी भी अंग में गोदना गुदवाते हैं। इस समाज का हर समारोह श्रीराम पूजा तथा रामायण के आधार पर होता है कन्या पक्ष से किसी प्रकार का कोई दहेज नहीं लिया जाता।

रामायण को साक्षी मानकर समुदाय का प्रमुख व्यक्ति जयस्तंभ के सात फेरे दिलाकर पति-पत्नी घोषित करता है। इनका संत समागम रामनवमी और पौष एकादशी से त्रयोदशी तक होता है। बिलासपुर के शवरी नारायण में माघ मेला लगता है। रामनामी गोदना के संबंध में स्मरमिहा जाति के लोगों की मान्यता है कि मरने के बाद स्वर्ग में भक्त के रूप में भगवान पहचानते हैं। इनकी मान्यता है कि शरीर में राम का नाम लिखना राम का हस्ताक्षर है।

विवाह पूर्व लड़कियों में गोदना गुदवाने का रिवाज है। यहां की जनजातीय महिलायें कोहनी में मक्खी, अंगूठा के किनारे खिच्ची, पंजा में खडडू, बांह में बांहचिंघा और छाती में सुता गोदना गुदवाती हैं।

सरगुजा अंचल में गोदना प्रथा का प्रचलन काफी प्राचीन है। यहां की सभी जनजातियों में गोदना गुदवाने की प्रथा प्रचलित है। क्षेत्र और जाति के आधार पर भिन्न-भिन्न गोदना गुदवाये जाते हैं। यहां की जनजातियां सम्पूर्ण शरीर में गोदना गुदवाती हैं। सभी अंगों के गोदना का अलग अलग नाम और उसका महत्व है। यहां की गोदना प्रिय जनजातियां गोड, कंवर, उरांव, कोडाकू पण्डो, कोरवा हैं। स्त्रियां सुन्दरता के लिए माथे में बिन्दी आकृति गुदवाती हैं। इनकी मान्यता है कि इससे सुन्दरता के साथ-साथ बुद्धि का विकास होता है। दांतो की मजबूती के लिए ठोढ़ी में गोदना गुदवाये जाते हैं। इसे मुटुकी कहते हैं। नाक की गोदना को फूली और कान की गोदना को झूमका कहते हैं। रवांध भुजा में चक्राधार फूल आकृति गुदवाने से सुन्दरता बढ़ती है। गला में हंसुली गहना जैसी आकृति गुदवाने से सुन्दरता के साथ-साथ आवाज में मधुरता आती है। कलाई की गोदना को मोलहा कहते हैं। ऐसी मान्यता | है कि इसके गुदवाने से स्वर्ग में भाई-बहन का मिलाप होता है। हथेली के पीछे गोदना को “करेला चानी” और हथेली के पीछे की सम्पूर्ण गोदना को “हथौरी फोराय” कहते है। हाथ के अंगूठा में मुन्दी और पेंडरी में लवांग फूल गुदवाये जाते हैं। पैर में चूरा पैरी और पंजा में अलानी गहना गुदवाये जाते हैं। पैर के अंगूठे की गोदना को अनवट कहते हैं। इसी तरह शरीर के प्रत्येक अंगों में हाथी पांज, जट, गोंदा फूल, सरसों फूल, कोहरा फूल, पंखा चूड़ी, अंडरी दाद, हल्दी गांद माछी मूड़ी पोथी, कराकुल सेत, दखिनहा, धंधा, बिच्छवारी, पर्श विजना, हरिना गोदना अनेक अलग-अलग नामों से गोदना गुदवाये जाते हैं, जिसका अपना महत्व है।

शिवअनुराग पटैरिया

Share your love
Rajveer Singh
Rajveer Singh

Hello my subscribers my name is Rajveer Singh and I am 30year old and yes I am a student, and I have completed the Bachlore in arts, as well as Masters in arts and yes I am a currently a Internet blogger and a techminded boy and preparing for PSC in chhattisgarh ,India. I am the man who want to spread the knowledge of whole chhattisgarh to all the Chhattisgarh people.

Articles: 1117

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *