छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi

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छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi

छत्तीसगढ़ विभिन्न मतमतांतरों और संप्रदाय की उर्वर भूमि रहा है। रामनामी, सतनामी और कबीरपंथी संप्रदायों का उद्भव व विकास छत्तीसगढ़ की माटी से गहरे तक जुड़ा हुआ है। रामनामी छत्तीसगढ़ में एक अद्भुत परंपरा के संवाहक हैं। इस परंपरा के वाहक अपने संपूर्ण शरीर को राममय कर लेते हैं। उनके संपूर्ण शरीर पर रामनाम का गोदना होता है। ( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

यह परंपरा कोई सौ- सवा सौ साल पहले समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, छुआछूत के प्रति प्रतिकार को लेकर प्रारंभ हुई थी। 1890 से 1911 में चांपा के करीबी चाकपारा ग्राम के परशुराम ने अपने संपूर्ण शरीर पर रामनाम गुदवाकर निराकार राम की पूजा का यह सिलसिला प्रारंभ किया था। तब लाखों लोगों ने उनका अनुसरण किया। इस परंपरा के तहत संपूर्ण शरीर पर रामनाम का गोदना गुदवाए लोगों की जमात अपने अंतिम दौर में है।

रामनामी संप्रदाय के लोगों के लिए भगवान राम कण कण में व्याप्त हैं। उनकी भक्ति किसी मूर्ति की मोहताज नहीं है। निराकार भगवान राम के वे भक्त हैं। रामनामी संप्रदाय के मानने वालों की अलग पहचान होती है।

इस पहचान के तहत माथे पर दो बार राम अंकित करवाने वाले को शिरोमणि, पूरे माथे पर रामनाम का टेटू गुदवाने वाले को सर्वांग रामनामी, शरीर के किसी भी हिस्से पर रामनाम का टेटू बनवाने वाले को रामनामी और शरीर के प्रत्येक हिस्से में भगवान राम का नाम लिखवाने वाले को नख-शिख रामनामी कहा जाता है। ( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

इस संप्रदाय को मानने वाले की मृत्यु हो जाने पर उसका अंतिम संस्कार जलाकर नहीं किया जाता है, बल्कि उसे दफनाया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि ऐसे व्यक्ति को अगर जलाया जाता है तो भगवान राम का नाम जल जाएगा, जो अपने आप में पाप होगा। इसलिए व्यक्ति की पार्थिव देह को दफनाकर विसर्जित कर दिया जाता है।

रामनामी सामान्य तौर पर नशे जैसे व्यसनों से दूर शुद्ध शाकाहारी होते हैं। रामनामी संप्रदाय को मानने वाले हिंदू समाज की दहेज जैसी कुप्रथाओं से सर्वथा दूर हैं। इस संप्रदाय को मानने वाले अधिकांश लोगों की जीविका का यापन खेती-किसानी से होता है।

इस संप्रदाय को मानने वाले लोग दैनंदिन जीवन में हमेशा भगवान राम का स्मरण करते हैं, वे अभिवादन भी राम-राम कर करते है . ( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

को मानने वाले लोग छत्तीसगढ़ में महानदी के आसपास के गाँवों में ज्यादातर पाए जाते हैं। रामनामियों की पर्याप्त संख्या जांजगीर, अकलतरा, पामगढ़, जैपुर मालखरौर, चंद्रपुर, सारंगढ़ रायगढ़, कसडौल में पाई जाती है ।

रामनामिओं का हर साल मेला लगता है जिसमें इस संप्रदाय को मानने वाले लोग एकत्रित होते हैं। इस मेले में नए लोगों को रामनामी संप्रदाय में शरीक किया जाता है, वैसे अब इस संप्रदाय के लोगों की संख्या लगातार घट रही है। इसका प्रमुख कारण है कि लोग टैटू बनवाने की कष्टसाध्य प्रक्रिया को सह नहीं पाते हैं, वहीं आज के • समाज की प्राथमिकताएँ बदल गई हैं।( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

कबीरपंथी, सतनामी और रामनामी

छत्तीसगढ़ में हिंदुओं के बीच से उपजी तीन प्रतिक्रियात्मक धाराओं, जिन्हें पंथ कहें या सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ प्रतिक्रिया, ने आकार व आधार लिया। इनको कबीरपंथी, सतनामी और रामनामी के तौर पर मान्यता व पहचान मिली। वैसे रामनामियों को भक्ति काल से भी प्रभावित माना जाता है।

कबीरपंथी तथा सतनामी संप्रदाय

कबीरपंथी एवं सतनामी संप्रदायों का साथ-साथ उदय हुआ। संत कबीर के अनुयायियों का मानना है कि कबीर ने सर्वप्रथम रीवा में उपदेश देना प्रारंभ किया जहाँ कि इन लोगों के प्रथम गुरु धर्मदास सन् 1463 में पीठासीन हुए थे। यह भी कहा जाता है कि कबीर के जीवन काल में ही या बहुत संभव है कि उनकी मृत्यु के पश्चात् धर्मदास को भगा दिया गया था। उनको रतनपुर के राजकुमारों के यहाँ शरण लेनी पड़ी थी। तभी से उनके वंशज छत्तीसगढ़ में निवास करते आए हैं। ( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

इन दोनों पंथों की स्पष्ट समानता तथा विभेद का उल्लेख जे. एफ. के. हेविट ने अपने 1869 के जिले के बंदोबस्त प्रतिवेदन में किया है। यद्यपि सतनामियों में सांप्रदायिक मतभेद अधिक गहरे हैं, तथापि लोगों के वास्तविक धर्म पर उसका बहुत ही कम प्रभाव पड़ा है। लोग ठाकुर देव में गहरी निष्ठा रखते हैं और ठाकुर देव को बलि चढ़ाए बिना कोई कृषि कार्य आरंभ नहीं किया जा सकता। ( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

कबीरपंथियों के दो प्रमुख केंद्र उत्तर प्रदेश के बनारस तथा कवर्धा या रायपुर जिले के दामाखेड़ा में थे। सन् 1916 में रसेल ने यह टिप्पणी की थी कि मतभेदों के कारण रायपुर में अब एक नई शाखा उदित हुई है, जो नादियापंथी कहलाती है। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, सतनामी तथा कबीरपंथी दोनों ही समस्त व्यक्तियों की समानता, जाति प्रथा के उन्मूलन तथा एक ऐसे परम शक्तिमान ईश्वर की, जिसके लिए किसी मूर्ति का मंदिर, और इसी प्रकार किसी ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं है, पूजा के मूलभूत आदर्श को लेकर चले थे। ( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

अब जाति को मान्यता देते हैं और 1911 तक दोनों ने अपने को ब्राह्मण हिंदू लिखवाया। अब सन् 1961 की जनगणना में सतनामियों को एक अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो जिले के उत्तर तथा उत्तर-पूर्व में पाई जाती है। पंका भी कबीरपंथी होते. हैं। पंथ का पहचान चिह्न कंठी या गुरियों की एक माला है, जो गले में पहनी जाती है। ( छत्तीसगढ़ के रामनामी सतनामी और कबीरपंथी | Chhattisgarh ke Ramnami satnami kabirpanthi )

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