भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh  के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya Janjati Chhattisgarh Bhumiya Tribe Chhattisgarh

भूमिया जनजाति की उत्पत्ति 

भूमिया, भुइहर छत्तीसगढ़ की एक जनजाति है। अलग-अलग क्षेत्र में स्थानीय बोली में अन्तर के कारण अलग-अलग उपजाति के रूप में पहचाने जाते हैं। मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा, सिवनी जिले में भारिया जबलपुर, मंडला, बिलासपुर, शहडोल में भूमिया, सरगुजा, रायगढ़, बिलासपुर के कुछ क्षेत्र में भूइयाँ, भूइंहर कहलाते हैं। इस जनजाति को एक आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई उपजाति पांड के नाम से सरगुजा और बिलासपुर जिले में निवासरत है।

छत्तीसगढ़ में भूमिया, भुहर, पाण्डो आदि की जनसंख्या 2011 की जगणना में 1139367 दर्शित है। पुरुषों की जनसंख्या 57370 एवं स्त्रियों 56597 थी। भूमिया व भूइंडर के अलग-अलग उपजाति नाम से सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ जिले में पाये जाते हैं। छिंदवाड़ा जिले के पातालकोट घाटी में निवासरत भारिया परिवारों का भारत सरकार द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति घोषित किया गया है। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

भूइंहर, भूमिया, भारिया, पाण्डो, जनजाति के उत्पत्ति के संबंध में ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। किवदंतियों के आधार पर ये अपनी उत्पत्ति पाण्डवों से मानते हैं। महाभारत युद्ध के समय पाण्डवों के पास सैनिक कम थे, अतः अर्जुन ने “भरु” घास को मंत्र शक्ति से मानव बनाकर सैनिक बनाया था। इन्हीं को भारिया तथा पाण्डों लोग अपना पूर्वज मानते हैं।

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भूमिया उपजाति के अनुसार सर्वप्रथम भगवान महादेव भूमि का निर्माण किया फिर इसमें अपने त्रिशूल से नदी, पहाड़, वृक्ष व पशु पक्षी बनाये। बाद में इस भूमि के उपभोग हेतु एक पुरुष तथा एक स्त्री बनाई। इनके कई पुत्र हुए, एक पुत्र भूमि पूजन तथा देवी-देवता की पूजा का कार्य करने लगा भूमिया कहलाया। अन्य पुत्र खेती, शिकार आदि करने लगे, वे गोंड, कोल, आदि हुए। भूमिया को संताने विन्ध्याचल से छिंदवाड़ा, सिवनी, मंडला, शहडोल, सरगुजा, जशपुर के तरफ गये, यह माना जाता है।

भारिया उपजाति मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा, सिवनी जिले के दूरस्थ ग्रामों में गॉड, परधान, ओझा जनजातियों के साथ, पाण्डो, भूमिया, भूइंहर जनजाति सरगुजा, जशपुर, रायगढ़, बिलासपुर आदि जिले के दूरस्थ ग्रामों में गोंड, कंवर, धनवार, उरांव, मुण्डा, खरिया, कोंध आदि जनजातियों के साथ ग्राम में निवास करते हैं। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

भूमिया जनजाति के रहन-सहन 

इनके घर प्रायः मिट्टी की बनी होती है जिस पर घासफूस या देशी खपरैल की छप्पर होती है। घर में 2-3 कमरे होते हैं। दीवार मिट्टी की बनी होती है, जिस पर सफेद या पीली मिट्टी की पुताई करते हैं। घर की फर्श मिट्टी की होती है, जिसे गोबर से लीपते हैं। इनके घर में अनाज रखने की कोठी, चक्की, मूसल, बाँस की टोकरियाँ, भोजन बनाने के बर्तन जो सामान्यतः मिट्टी व एल्युमिनियम के होते हैं, ओढ़ने-बिछाने के कपड़े, कृषि उपकरण, कुल्हाड़ी, मछली पकड़ने की कुमनी, चोरिया आदि पाया जाता है। पशुओं के लिए स्थान अलग होता है। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

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स्त्रियाँ मस्तक, हाथ, पैर, कपोल, डुठी, गले आदि में गुदना गोदाती हैं। स्त्रियाँ पैरों में पैड़ी, तोड़ा, हाथ में चूड़ियाँ, ककना, गुलेठा, ऐंठी, बाँह में बोहटा, पहुंची, गले में हसेल, सरिया, हंसली, कान में उमेठा, एरिंग, खिनया, नाक में लौंग पहनती है। अधिकांश गहने गिलट या नकली चाँदी के होते हैं। वस्त्र-विन्यास में पुरुष धोती, पंछा, बंडी, कुरता तथा स्त्रियाँ लुगड़ा, पोलका पहनती हैं। इनका मुख्य भोजन मक्का, ज्वार की रोटी, कोदो, चावल का भात, पेज, उड़द, मूँग, कुलथी की दाल, मौसमी सब्जी, कंदमूल आदि है। मांसाहार में मुर्गी, तीतर, बटेर, मछली, केकड़ा, कछुआ, बकरा, खरगोश, सुअर, हिरण आदि का मांस खाते हैं। महुआ से निर्मित शराब पीते हैं।

भूमिया जनजाति के कृषि और व्यवासय 

भूमिया, भूइंहर जनजाति का आर्थिक जीवन मुख्यतः आदिम कृषि, वनोपज संग्रह पर आधारित था। वर्तमान में भी कृषि, कृषि मजदूरी, वनोपज संग्रह इनके जीवन का मुख्य आधार है। खेती पहाड़ियों के ढलान वाली भूमि पर करते हैं। अतः ज्यार, मका, कोदो, कुटकी, मूंग, उड़द, जगनी, कुलथी, बोते हैं, उपज बहुत कम होती है। जंगली उपज में वर्षा ऋतु में कंदमूल भाजी एकत्र कर खाते हैं। पूस माघ से हर्रा, आँवला, फागुन से तेंदू पत्ता, चार, महुआ, गुल्ली, गोंद, लाख, कोसा, आदि एकत्र कर बेचते हैं। वर्षा ऋतु में अपने उपयोग के लिए मछली पकड़ते हैं। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

भूमिया, भूइंहर जाति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग उपजाति नाम से निवासरत हैं। इनके प्रमुख उपजाति भूमिया, भारिया या भरिया, भूहार, पाण्डो आदि हैं। इनमें आपस में विवाह संबंध नहीं होता। प्रत्येक उपजाति अलग-अलग गोत्रों में विभक्त है। छिन्दवाड़ा के भारिया जनजाति में कुमरा, उइका, तेकाम, परतेती, पेदराम, सरेआम, भलावी, धुरवा, बगदरिया, दाडोलिया, पहाड़ी ओलिया, पेचलिया, गोवालिया, खमरिया, रायतिया, ठकरिया, भरतिया आदि प्रमुख गोत्र पाये जाते हैं।

मण्डला बिलासपुर, सरगुजा के भूमिया उपजाति में बाडिया, दारकर, धुरबा, जिकराम. कथाची औचो. कारेआम, हुसरा, मरावी, मरकाम, पेडौवा, पटेटिया, पेन्ड्रो, पोटा, टेकाम, सुखाम, आदि हैं। प्रत्येक गोत्र के टोटम होते हैं। भारिया, भूमिया जनजाति पितृवंशीय. पितृसत्तात्मक व पितृ निवास स्थानी होती है। गोत्र बहिर्विवाह पाया जाता है। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

भूमिया जनजाति के परम्परा 

गर्भवती महिलाएँ प्रसव पूर्व तक आर्थिक तथा पारिवारिक कार्य करती हैं। गर्भावस्था में कोई विशेष संस्कार नहीं होता। प्रसव स्थानीय दाई या पास पड़ोस की बुजुर्ग महिलाओं द्वारा घर पर ही कराया जाता है। बच्चे का नाल चाकू या ब्लेड से काटते हैं और घर में हो गड़ाते हैं। प्रसूता को सूदक पिलाते हैं, जो गुड़, सोंठ, पीपर, अजवायन से बनाया जाता है। छठे दिन छठी मनाते हैं। बच्चे व प्रसूता को नहलाकर सूरज का दर्शन कराते हैं। रिश्तेदारों को शराब पिलाते हैं।

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विवाह उम्र लड़कों में 17-18 वर्ष एवं लड़कियों में 15-16 वर्ष मानी जाती है। प्रस्ताव वर पक्ष ओर से होता है। वर पक्ष के लोग वधू के पिता को चावल, दाल, खेल, गुड़ व नगद 100-200 रुपये खर्ची” के रूप में देते हैं। विवाह की रस्में गाँव के बुजुर्ग व्यक्ति या जाति पंचायत के प्रमुख के देख-रेख में संपन्न कराते हैं। घर जमाई प्रथा, घुसपैठ, सहपलायन, विनिमय, विधवा/त्यगता पुनविवह भी पाया जाता है। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

मृत्यु होने पर मृतक के शरीर को दफनाते हैं। तीसरे दिन पुरुष रिश्तेदार दादी, मूँछ, सिर के बाल मुंडन कराते हैं घर की पुताई साफ-सफाई करते हैं। स्नान कर 10वें दिन मृत्यु भोज देते हैं।

इनमें परम्परागत जाति पंचायत पायी जाती है। जाति पंचायत का प्रमुख “मुखिया ” कहलाता है। जाति पंचायत का प्रमुख कार्य अनैतिक संबंध, अन्तर्जातीय वैवाहिक संबंध, वैवाहिक विवाद, तलाक आदि झगड़े निपटाना, जाति के देवी-देवता की पूजा व्यवस्था करना आदि है। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

भूमिया जनजाति के देवी-देवता 

इनके प्रमुख देवी-देवता हरदुल लाल, मुदुआ, पनघट, भीमसेन, धुरलापाठ, बापदानो, जोगनो, खेड़राई, मेदोदेव, चण्डीमाई, आदि। नूदादेव, ठाकुरदेव, मूढ़ीमाई, भैंसासुर आदि की पूजा मंडला, सरगुजा क्षेत्र में करते हैं। इनके अतिरिक्त हिंदू देवी-देवता सूरज, नदी, पहाड़, वृक्ष, नाग आदि को भी देव के रूप में पूजा करते हैं। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

इनके प्रमुख त्योहार बिदरी, अखाड़ी, जीवति, पंचमी, आठे, तीजा, पोरा, पितर, नोरता, दशहरा, दिवाली, होली आदि हैं। त्योहार में देवी-देवता की पूजा करते हैं। मुर्गा की बलि भी कभी-कभी देते हैं। भूत-प्रेत, जादू-टोना, मंत्र-तंत्र पर काफी विश्वास करते हैं। मंत्र तंत्र का जानकार “भूमका” कहलाता है।

इस जनजाति के लोग दिवाली में शैला नृत्य, होली में रहस नृत्य, पोला में गुन्नुर नृत्य, विवाह में बिहाव नृत्य करते हैं। महिलाएँ पड़की नाचती हैं। इनके प्रमुख लोकगीत उठी में सदक गीत, विवाह में बिहाव गीत, होली में फाग, दिवाली में अहिराई गीत, जवारा में सेवा गीत गाते हैं। ( भूमिया जनजाति छत्तीसगढ़ Bhumiya janjati chhattisgarh bhumiya tribe chhattisgarh )

2011 के जनगणना अनुसार इन जनजातियों में साक्षरता 48.5 प्रतिशत दर्शित है। पुरुषों में साक्षरता 57.8 प्रतिशत तथा स्त्रियों में 39.1 प्रतिशत पाया गया।

 

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अंत में मैं राजवीर सिंह , हमारे पोस्ट को इतने देर तक पढ़ने के लिए , हमारे सोशल मिडिया अकौंट्स में जुड़ने के लिए , हमारे ब्लॉग को दायी ओर की नीली घंटी दबा के हमें सब्सक्राइब करने के लिए , हमारे साथ इतने देर तक जुड़े रहने के लिए आपका हाथ जोड़ के धन्यवाद् करता हु

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source : Internet

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Rajveer Singh
Rajveer Singh

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