भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh

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भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh
भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

 भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina Janjati Chhattisgarh Bhaina Tribe Chhattisgarh

भैना जनजाति की उत्पत्ति 

भैना जनजाति छत्तीसगढ़ का एक अनुसूचित जनजाति समूह है। जनगणना 2011 अनुसार इनकी जनसंख्या 55975 थी, जिनमें 27896 पुरुष तथा 28079 स्त्रियाँ थी। इनकी मुख्य जनसंख्या बिलासपुर तथा रायगढ़ जिले में निवास करती है । 

भैना जनजाति के उत्पत्ति संबंधी ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है। कुछ विद्वान इसे बैगा जाति से अलग हुआ एक समूह मानते हैं। मण्डला जिले के बैगा जनजाति में राजभैना उपसमूह पाया जाता है। दंतकथाओं में प्रचलित है कि पहले बिलासपुर के पेण्ड्रा और रायपुर के फूलझर में भैना जनजाति के जमींदार थे। कंवर और गोंड जाति के जमीदारों ने उन्हें हटाया था। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

भैना जनजाति का रहन-सहन 

भैना जनजाति अन्य जनजातियों गोंड, कंवर आदि के साथ गाँव में निवास करते हैं । इनका घर मिट्टी की बनी होती है, जिसमें छप्पर देशी खपरैल या घास-फूस का होता है। मकान में दो-तीन कमरे होते हैं। कमरे के आगे परछी होती है। दीवार की पुताई सफेद मिट्टी से करते हैं । घर का फर्श मिट्टी का होता है, जिसे गोबर से रोज लीपते हैं। पशुओं का कोठा अलग से होता है ।

घरेलू वस्तुओं में अनाज रखने की कोठी, चारपाई, ओढ़ने-बिछाने के कपड़े, भोजन बनाने व खाने के बर्तन, कृषि उपकरण, कुल्हाड़ी, ढेंकी, मूसल, चक्की, बाँस की टोकरी, सूपा आदि पाया जाता है। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

पुरुष व महिलाएँ सुबह उठकर बबूल, नीम, हर्रा, करंज आदि के दातौन से दाँत साफ करते हैं। प्रतिदिन स्नान करते हैं। शरीर से मैल निकालने के लिए नहाते समय चिकने पत्थर से शरीर को रगड़ते हैं। सिर के बाल धोने के लिए चिकनी मिट्टी का उपयोग करते हैं। पुरुष सिर के बाल कटाते हैं। बालों में मूँगफली, तिल या गुल्ली का तेल डालकर कंघी करते हैं। स्त्रियाँ चोटी बनाकर जूड़ा बनाती है।

स्त्रियाँ चेहरा, हाथ व पैर पर गुदना गोदाती हैं, गहनों की शौकीन होती हैं। पैर की उँगलियों में बिछिया, पैर में सांटी, लच्छा, कमर में करधन, कलाईयों में ऐंठी, चूड़ियाँ, बाहुओं में पहुंची, गले में सुड़, रुपिया माला, कान में खिनवा, नाक में फूली पहनती हैं। वस्त्र -विन्यास में पुरुष पंछा-वंडी, सलूका, धोती-कुरता, स्त्रियाँ लुगड़ा, पोलका पहनती हैं।( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

इनका मुख्य भोजन चावल, कोदो की भात, बासी, उड़द, मूंग, अरहर, तिवड़ा, कुलथी आदि की दाल, मौसमी सब्जी है। मांसाहार में मछली, मुर्गी, बकरे का मांस खाते हैं। महुआ से निर्मित शराब भी पीते हैं। पुरुष बीड़ी पीते हैं।

भैना जनजाति के व्यवसाय 

इस जनजाति के जीविकोपार्जन का मुख्य साधन कृषि, मजदूरी, वनोपज संग्रह है। खेतों में मुख्यतः कोदो, धान, उड़द, मूंग, तिवड़ा, तिल, अरहर आदि बोते हैं। जमीन असिंचित होने के कारण उत्पादन कम होता है। जंगल से तेंदूपत्ता, तेंदू, चार, महुआ, गुल्ली, गोंद, लाख, हर्रा, आंवला आदि एकत्र करते हैं।

जंगली उपज स्वयं के उपयोग का रखकर शेष स्थानीय बाजार में बेच देते हैं। भूमिहीन परिवार अन्य जनजाति के घर मजदूरी करते हैं। वर्षा ऋतु में अपने उपयोग के लिए मछली पकड़ते हैं। पहले इनके पूर्वज शिकार भी करते थे, अब प्रतिबंध के कारण शिकार नहीं करते। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

भैना जनजाति के परम्परा 

भैना समाज में पितृसत्तात्मक, पितृवंशीय, पितृ निवास स्थानीय परम्परा पाई जाती है। इनमें चार उपजातियाँ क्रमशः लरिया या छत्तीसगढ़िया, उड़िया, झलयारा व घटियारा पाई जाती है। उपजातियाँ अन्तःविवाही होती है। अर्थात् उपजातियाँ अपने समूह में ही विवाह करते हैं। उपजातियाँ पुनः बहिर्विवाही गोत्र में विभक्त हैं।

इनके प्रमुख गोत्र नाग, बाघ, चितवा, गिधवा, बेसरा, बेन्दरा, लोधा, बतरिया, गबड़, दुर्गाचिया, मिरचा, धोबिया, अहेरा, मनका, मालीन आदि है। गोत्र के अपने टोटम पाये जाते हैं, जो जीव-जन्तु, पशु-पक्षी तथा वृक्ष-लता आदि पर आधारित होते हैं। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

इस जनजाति की महिलाएँ गर्भावस्था में सभी आर्थिक कार्य संपन्न करती हैं। गर्भावस्था में कोई संस्कार नहीं होता। प्रसव स्थानीय “सुईन दाई” की मदद से घर पर ही कराते हैं। प्रसव के बाद बच्चे का नाल चाकू या ब्लेड से काटकर घर में गड़ाते है । प्रसूता को तिल, सोंठ, गुढ़, पीपल, अजवायन, घी, नारियल का लड्डू खिलाते हैं । छठवें दिन उठी मनाते हैं। पुरुष दादी तथा सिर के बाल कटाते हैं। प्रसूता व शिशु को नहलाकर कुल देवी-देवता का प्रणाम कराते हैं। रिश्तेदारों को भोजन कराते हैं और दारू पिलाते हैं।

विवाह उम्र लड़कों में 16-18 वर्ष, लड़कियों में 15-17 वर्ष मानी जाती है। विवाह का प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है। वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को चावल, दाल, तेल, गुड़, कुछ नगद रकम “सूक” के रूप में देते हैं। विवाह, मंगनी, फलदान, बिहाव तथा गौना चार चरणों में पूर्ण होता है। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

पहले विवाह की रस्म जाति का बुजुर्ग व्यक्ति संपन्न कराते थें, अब कुछ लोग ब्राह्मण पंडित बुलाते हैं । इनमें विनिमय, सहपलायन, घुसपैठ, सेवा विवाह, पुनर्विवाह, देवर-भाभी पुनर्विवाह को भी समाज द्वारा मान्यता दी जाती है।

मृत्यु होने पर मृतक को दफनाते हैं। तीसरे दिन परिवार के पुरुष दाढ़ी, मूँछ य सिर के बालों का मुण्डन कराते हैं। 10वें दिन पूर्वजों की पूजा कर मृत्यु भोज देते हैं। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

इनमें परम्परागत जाति पंचायत पाई जाती है। जाति पंचायत का प्रमुख “गौटिया” कहलाता है। जाति पंचायत का प्रमुख कार्य वधू धन तय करना, विवाह, तलाक के विवादों का निराकरण, अनैतिक संबंध को नियंत्रण करना, जाति के देवी-देवता की पूजा व्यवस्था करना आदि है।

भैना जनजाति के देवी-देवता 

इनके प्रमुख देवी-देवता ठाकुरदेव, बुढ़ादेव, गोरइयां देव, भैंसासुर, शीतला माता आदि हैं। इसके अतिरिक्त सूरज, चाँद, पृथ्वी, नदी, पहाड़, वृक्ष, बाघ, नाग आदि तथा हिंदू देवी-देवताओं को भी पूजा करते हैं। पूजा के अवसर पर परम्परागत देवी-देवताओं में मुर्गा, बकरा की बलि दी जाती है। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

इनके प्रमुख त्योहार हरेली, तीजा, पोला, पितर, नवाखानी, दशहरा, दिवाली तथा होली है। भूत-प्रेत, जादू-टोना में विश्वास रखते हैं। जादू मंत्र के जानकार “बैगा” कहलाता है।

भैना जनजाति के लोग करेमा, रहस, रामधूनी, बिहाव नाच नाचते हैं । महिलाएँ भी करमा तथा पड़की नाचती हैं । इनके मुख्य लोकगीत करमागीत, ददरिया गीत, रहस गीत, भजन, सुआगीत, बिहाव गीत आदि हैं। ( भैना जनजाति छत्तीसगढ़ Bhaina janjati chhattisgarh bhaina tribe chhattisgarh )

भैना जनजाति में साक्षरता का प्रतिशत 2011 की जनगणना अनुसार 60.5 प्रतिशत थी। पुरुषों में साक्षरता 72.5 प्रतिशत व स्त्रियों में 48.7 प्रतिशत थी।

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