बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar

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बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar
बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains और Interview पूछा जाता है, तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar

क्षेत्रीय इतिहास का महत्व –

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास को सम्पूर्णता देने के लिये क्षेत्रीय इतिहास की जानकारी अत्यन्त आवश्यक है।

विषय के 3 महत्वपूर्ण लक्ष्य है:

1. क्षेत्रीय इतिहास का वैज्ञानिक अध्ययन
2.शोध कार्य समाज और राष्ट्र के हित को ध्यान में रखकर करना ।
3. भविष्य में शोध कार्य को रचनात्मक प्रवृत्ति की ओर अग्रसित करना। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

आन्दोलन की शुरुआत 

जिस प्रकार एक वैज्ञानिक के छोटे से छोटे अस्तित्व अणु और परमाणु के माध्यम से प्रकृति को बड़ी से बड़ी शक्ति और रहस्य का पता लगा रहा है, उसी प्रकार हम लोग समाज की छोटी से छोटी घटनाओं के माध्यम से समाज की बड़ी से बड़ी घटनाओं का पता लगा सकते हैं। 

प्रस्तावना के रूप में यही कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय आन्दोलन रूपी इमारत की कलाकारी को तो सभी याद करते हैं, परन्तु नींव के पत्थर आज भी अज्ञात एवं मौन हैं। वह न मालूम कितने झंझावतों को सहने के बाद आज भी इमारत को सुदृढ़ता प्रदान कर रहे हैं। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

सन् 1920 का वर्ष भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में अपना एक विशेष महत्व रखता है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन में परिणित कर दिया। अहिंसात्मक असहयोग बापू का वह अमोध अस्त्र था जो हमारी सभ्यता, संस्कृति और धर्म को भी गौरवान्वित करता है। 

“असमान विधि प्रमादी तथा हठी प्राधिकारी, असहाय किन्तु विरोध करने वाली जनता जो केवल न्याय की मांग करती है” ये वे परिस्थितियां हैं जिसमें सत्याग्रह आवश्यक होता है। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

रोग-शैय्या पर होने के बावजूद महात्मा गांधी ने वायसराय से अभ्यर्थना की थी कि वे रोलट विधेयक अपनी सहमति न दे, परन्तु ब्रिटिश शासन ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। अतएव 24 फरवरी 1919 को महात्मा गांधी ने घोषणा की कि यदि यह विधेयक अधिनियम बन गया तो वे सत्याग्रह प्रारंभ करेंगे। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग का हृदय विदारक काण्ड हुआ। भारत के अन्य प्रांतों के समान मध्यप्रान्त में भी हड़तालों का आयोजन हुआ एवं अंग्रेजी सरकार के क्रूर कानून की भर्त्सना की गई।

मध्यप्रान्त के छत्तीसगढ़ क्षेत्र में 

मध्यप्रान्त के छत्तीसगढ़ क्षेत्र (रायपुर जिला) में उपरोक्त परिस्थितियों का उत्तर देने के लिए 1919 में ही द्वितीय राजनीतिक परिषद का सफल आयोजन किया गया। रायपुर जिला छत्तीसगढ़ का केन्द्र स्थल था। राष्ट्रीय जागरण एवं देशोद्धार के जिन कार्यक्रमों का प्रचार महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भिक काल में किया था मध्य प्रान्त के रायपुर जिले में इसका विधिवत प्रचार एवं प्रसार किया गया। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

सन् 1923 में जो चुनाव हुए इसमें पंडित मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व वाली चुनाव पार्टी ने बहुमत पाकर भी सरकार नहीं बनाई। डा राघवेन्द्र राव द्वारा प्रस्तुत अविश्वास का प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने पर सदन के भीतर अंग्रेजी सरकार ने साम्प्रदायिकता को उकसाना प्रारंभ कर दिया फलतः उनके स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे हुए। परन्तु छत्तीसगढ़ में इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

काकीनाड़ा में कांग्रेस सरकार

झण्डा सत्याग्रह के पश्चात सन् 1923 में काकीनाड़ा (या कोकनाड़ा) में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ। काकीनाड़ा कांग्रेस ने रचनात्मक कार्यक्रम पर जोर दिया। भारतीय कांग्रेस कमेटी को पहली बैठक में प्रान्त को समितियों को बारडोली कार्यक्रम के प्रमुख विषयों पर विचार करने के लिए बुलाया गया। कांग्रेस ने तीन वर्ष के लिए भारतीय खद्दर बोर्ड की स्थापना की जिसे देशभर में खादी कार्यक्रम बनाने के अधिकार दिये गये।

यह ऐसी स्थिति थी जिसने अनिवार्य रूप से गांधी को कार्यक्षेत्र में कूदने के लिए आव्हान किया। परिषदों में प्रवेश करने की स्वराज्यवादी नीति में सहमति के बाद उन्होंने अपने आपको तीन आधारभूत तथ्यों तक सीमित कर दिया था जो देश की स्वतंत्रता के लिये महत्वपूर्ण था का दिया था जो देश की स्वतंत्रता के लिये महत्वपूर्ण था .( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

1. कताई को प्रोत्साहन।
2. हिन्दू-मुस्लिम एकता,
3. अस्पृश्यता निवारण।

कांग्रेस का काकीनाडा अधिवेशन

कांग्रेस का काकीनाडा अधिवेशन सन् 1923 में मौलाना मुहम्मद अली की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। यह कांग्रेस अधिवेशन एक सुनियोजित आधार पर आयोजित किया गया था। राजनैतिक दृष्टि से कौंसिल प्रवेश के दिल्ली प्रस्ताव की पुष्टि करने के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण निर्णय यह भी लिया गया. “कामेस सेवादल की नियुक्ति।

काकीनाड़ा कांग्रेस में प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित होने के लिए धमतरी से नारायणराव मेघावाले के नेतृत्व में लगभग 25 कार्यकर्ताओं का जत्था भाग लेने गया था। यह यात्रा उन्हें देश में कर्मठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में निर्धारित करती है। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

काकीनाड़ा कांग्रेस पदयात्रा 

काकीनाड़ा कांग्रेस के लिये पदयात्रा जहां एक ओर स्थानीय नेताओं एवं स्वयं सेवकों की कर्म का परिचय देती है, वहीं दूसरी ओर उन्होंने ऐसे क्षेत्र में राष्ट्रीयता का प्रचार किया जहाँ अभी तक राष्ट्रीयता की किरण भी नहीं पहुंची थी। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

काकीनाड़ा कांग्रेस पद यात्रा में रायपुर जिले के विभिन्न नगरों एवं तहसीलों के लोग सम्मिलित हुए थे। सागर के हलवेजी, राजिम के पंडित सुन्दरलाल शर्मा एवं दाऊ श्यामलाल गुप्ता नगरों के श्री श्यामलाल सोम धमतरी के पंडित गिरधारीलाल तिवारी, रामजीवन लाल सोनी आदि ने प्रस्थान किया। ये पैदल हो धमतरी से प्रस्थान किये।

इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य काकीनाड़ा और उसके आसपास के बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में राष्ट्रीयता एवं जन जागरण था। उस समय बस्तर एक रियासती क्षेत्र था। बस्तर की सीमा को जूता हुआ काकीनाड़ा शहर था जो आंध्र प्रदेश का क्षेत्र था। बस्तर और काकीनाड़ा के बीच अत्यधिक घना जंगल पड़ता था। महात्मा गांधी का संदेश यहां तक पहुंचाना दुष्कर कार्य था। परन्तु उपरोक्त जत्था कांग्रेस अधिवेशन के पूर्व काकीनाड़ा पहुंचने का निश्चय कर प्रतिदिन पन्द्रह से बीस मील की रफ्तार से चलने का एक कार्यक्रम बनाकर यहां से प्रस्थान किया था। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

मार्ग में उपरोक्त सत्याग्रहियों द्वारा बस्तर के आदिवासी इलाकों में जन-जागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया गया। प्रायः सत्याग्रही आदिवासी गांवों (बस्तर) में जन जागरण कर लोगों को प्रोत्साहित करते हुए आगे बढ़ते जाते थे। जनाध्यान को आकर्षित करने के लिये सत्यापही राष्ट्रीय नेताओं के चित्र अपने साथ रखे हुए थे। अक्सर राष्ट्रीय नेताओं की आजादी की संघर्षपूर्ण कहानी सुनाकर जन-जागरण के वातावरण को प्रेरित करते थे।

सत्याग्रही नेताओं ने अपने यात्रा के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में साम्प्रदायिक सद्भाव तथा अछूतोद्धार सम्बन्धी भावनाओं को प्रश्रय दिया। इस दौरान इस अधिवेशन के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद अली का अछूतोद्धार और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए जो भाषण हुआ उससे अनेक राष्ट्रीय समस्याओं का निदान सामने आया। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

अतः काकीनाड़ा कांग्रेस में रायपुर जिले के कार्यकर्ताओं की पदयात्रा बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में जन जागरण के लिये काफी प्रेरणास्पद थी। काकीनाडा कांग्रेस ने रचनात्मक कार्यों पर भी जोर दिया। खादी की उपयोगिता पर यहां भी भाषण दिया गया। “महात्मा गांधी कहते थे भारत में अंग्रेजी राज्य रूपी बीमारी बहुत ही लम्बी और न सुधरने वाली है।” इसके लिये बहुत ही योग्य चिकित्सा की आवश्यकता है और रोग के लिए दवा का सेवन अति आवश्यक है। चरखा वह प्रभावशाली दवा है जिसका भारतीय जनता उपयोग करे और बहिष्कार आन्दोलन को सफल बनावे।

इस तरह बस्तर जैसे सघन वन तथा आवागमन विहीत क्षेत्र में स्वाधीनता संग्राम की चेतना के प्रचार प्रसार का गश्ती कार्य सम्पादित हो सका था। ( बस्तर में असहयोग आन्दोलन | Bastar me asahayog andolan | non cooperation movement in Bastar )

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Source : Internet

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Rajveer Singh
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