बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan

Rate this post
बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan
बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains और Interview पूछा जाता है, तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

 बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan

बस्तर का इतिहास मध्यप्रदेश के इतिहास में अपनी एक अलग भूमिका अदा करने के साथ एक अद्वितीय स्थान बनाये है इसका उल्लेख वैदिक पुराणिक कथाएं बाल्मिकि रामायण एवं पुराणों में शवरमुरल तथा वत्सर में मिलता है। नागवंश का प्रादुर्भाव के स्पष्ट प्रमाण रायपुर के राम-लक्ष्मण शिलालेख में मिलता है। इसमें रानी वासटा का सतीत्व दमयंती से बढ़कर था। चालक्य एवं नागवंशी राजाओं का भी योगदान बस्तर के इतिहास में रहा है।

बस्तर का नामकरण

प्रथम क्षत्रिय इच्छावाकु की आधीनता दक्षिण पथ के निवासियों ने के कारण इसका नाम कालान्तर में दण्डकारण्य पड़ा ये का स्वीकार किया उसके पुत्र दण्ड के अधीन विन्ध्य तथा शेवल तथा शैवल मध्य क्षेत्र थे। ये आरण्यक बहुलता के कारण इसका नाम कालांतर में दंडकारण्य पड़ा । ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

भौगोलिक पृष्ठभूमि

इस क्षेत्र का स्थान मध्यप्रदेश में पचमढ़ी के पश्चात आता है यह अपने प्राकृतिक सौन्दर्य और जंगली जानवरों के लिए भारत में अद्धितीय स्थान रखता है। भौगोलिक दृष्टि से भारत का ही नहीं विश्व का भी यह महत्वपूर्ण जिला है। इसमें इसका क्षेत्रफल विश्व के तीन देशों से बड़ा तथा भारत के चार राज्यों से भी बड़ा है। विस्तार 17.45 डिग्री उत्तरी अक्षांश से 20 डिपी 34 अक्षांश के मध्य स्थित है तथा 80 डिग्री 13 से पूर्वी देशांश से 82 डिग्री 15 पूर्वी देशांश में यह अण्डाकार स्वरूप में फैला है। पूर्व में यह 200 कि.मी. चौड़ा तथा 288 कि.मी. लम्बा उत्तर दक्षिण है। क्षेत्रफल- 391145 स्के. कि.मी. और जनसंख्या 1840499 है। इसकी प्रमुख नदियां इन्द्रावती और गोदावरी हैं।

प्रशासनिक स्वरूप:- राज्यों के पुनर्गठन के पश्चात यह जिला 20 मार्च 1981 को संभाग घोषित किया गया इसमें 4 नगर 3683 गांव और 4 नगर पालिका स्थित है। इसका मुख्य कार्यालय जगदलपुर है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

भौगर्भिक संरचना:- पृथ्वी की संरचना के आधार पर बस्तर को भी भौगर्भिक दृष्टि से 5 भागों में बांटा गया है। 1. विन्ध्यन शैल समूह, 2. कडप्पा, 3. प्राचीन ट्रेप, 4. ग्रेनाइट एवं नीश, 5. भारवाद क्रम है। इसमें शेन्डस्टोन लाइम स्टोन क्वार्टजाइट और कायान्तरित शैलों के साथ ग्रेनाइट एवं नीश की प्रमुखता है।

धरातलीय संरचना:- धरातलीय विस्तार असामान्य होने के कारण यहां का सबसे ऊंचा भाग 500 से 2500 फीट तक का धरातल मिलता है भू वेत्ताओं के आधार पर उत्तरी भाग मैदानी होकर दक्षिणी सीमा तक बनाता है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

धरातलीय संरचना को 6 भागों में बांटा गया है-

1. उत्तर का निम्न मैदान

3. अबूझमाड की पहाड़ी

4. उत्तर पूर्वी पठार

5. दक्षिण का पहाड़ी बैलाडीला क्षेत्र

6. निम्न भूमि क्षेत्र

यहाँ सबसे ऊंचा क्षेत्र 1200 मी. का क्षेत्र बीजापुर बैलाडीला क्षेत्र जो कि दक्षिणी पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

जलवायु 

प्रत्येक स्थान के निवासियों को उस क्षेत्र की जलवायु शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रभाव डालती है जिसके आधार पर उसके कार्यकलाप व ढांचा तैयार होता है। यहां म.प्र. में मानसूनी जलवायु होने के कारण बस्तर में भी मानसूनी जलवायु का प्रादुर्भाव है। यहां गर्मी का तापमान 41.9 से प्रे. मई में तथा वर्ष भर 20 डिग्री से. मे तापमान रहता है। शीत ऋतु का तापमान 14.3 डिग्री से ग्रे और वर्षा 40 इंच दक्षिणी पश्चिमी मानसून से होती है। यहां पर भी शुष्क आई एवं नम प्रदेश पाये जाते हैं। मिट्टियां कन्हार, मटासी, डोरसा, भाटा मुख्य है।

जाति का अर्थ :- समान्य अर्थ में ऐसे व्यक्तियों का वर्ग जिसमें शारीरिक एवं मानसिक गुण समान होते हैं। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

जाति का निर्माण :- स्थानीय समूह सबसे बड़े समुदाय में शामिल हैं अधिकतर आदिम जातियों की इकाई यह समाज को आदिम जनजाति कहा जाता है इसमें एक भाषा एक क्षेत्र एक जीवन यापन की विधि तथा उनकी सामाजिक संस्कृति समान होती है। इस जनजाति का आधार सामाजिक अस्तित्व की याद दिलाते हुए एकता के सूत्र में अपने को जोड़ना है। इस सूत्र में बराबर आपसी सहयोग से मनोभावों का निरूपण करने एवं इसी एकता से ही सभी समारोह संयुक्त आर्थिक सहयोग से पूरा करना है।

ये क्रमशः पूर्वजन द्वारा विरासत में आ रहे कार्यों का उल्लेख करते हैं परन्तु दुर्भाग्य से ये जातियां बिखर रही है जिसका कारण हे मूल परदेशियों द्वारा उन्हें उनके मार्ग से विचलित करना। परिणाम स्वरूप ये भिन्न-भिन्न परिस्थितियों से उत्पन्न समस्याएं इनके सामने सुरसा के समान विकराल रूप धारण करके आ खड़ी हुई हैं। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

इम्पीरियल गजेटियर के आधार पर आदिम जनजातियों की परिभाषा इस प्रकार है एक जाति परिवारों का वह समूह है जिसका एक सामान्य नाम होता है, सामान्य भाषा में बोलते हैं, वास्तव में सामान्य क्षेत्र में रहते हैं या उसी क्षेत्र से संबंधित मानते हैं तथा अन्तः विवाही समूह होते हैं।

भारत के आदिवासियों की परिभाषा में भिन्नता 

सभी क्षेत्रों में विभिन्नता के साथ-साथ आदिम जनजातियों में भी विभिन्नता का एक महत्वपूर्ण पहलू हमें देखने को मिलता है। यदि विश्व को जनजाति का प्रश्न उठता है तो हम गर्व के साथ अपना मस्तक ऊंचाकर कह सकते हैं कि विश्व की जनजातियों में भारत की जनजातियों की भिन्नता एक अनूठा स्थान रखती हैं। सर्वप्रथम भारत की जनजातियों का विश्लेषण करने का श्रेय डा. मजूमदार को है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

डॉ. मदार के अनुसार यद्यपि किसी आदिम जनजातियों के सदस्य का आपस में रक्त से संबंध नहीं हुआ है तथा सिद्धान्ततः रक्त संबंध प्रत्येक आदिम जनजाति के संबंध के. संगठन एवं नियंत्रण में महत्वपूर्ण स्थान रखते है परिणामतः अपने स्वरूप को अपने समूह के अन्तर्गत की वैवाहिक संबंधों तक सीमित होना उनके गुणों एवं उपगुणों में विभाजित होना उनकी सामान्य विशेषता है।

भारत में मध्यप्रदेश की जनजाति का स्थान :-

जनजातियों का 1961 के बाद भारतीय संविधान में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इसी तरह मप्र में मंडला, बालाघाट, सरगुजा के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां जनजातियां असभ्य रूप से जीवन यापन कर रही हैं। इनमें गोंड जनजाति महत्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र में भिन्न-भिन्न आक्रान्ताओं ने अपने प्रभाव डाले हैं बस्तर की सभ्यता और संस्कृति का मध्यप्रदेश में एक अपना अनूठा स्थान है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

बस्तर के आदिवासियों के संबंध में ऐतिहासिक किंवदन्तियां :-

राजा एवं रक :- नृतत्व शास्त्रियों, भौगर्भिक शास्त्रियों, इतिहासकारों ने बस्तर एवं उसके आसपास की प्रजातियां मूलतः गोंड जनजाति को द्रविण माना है। भूगर्भशास्त्रियों के आधार पर विन्ध्याचल के मूल निवासी गोंड हैं इनका उल्लेख स्मृति पुराणों में किया गया है। यहां तक कि बस्तर के इतिहास के बारे में प्रश्न उठता है तो बस्तर एवं मध्य विन्ध्याचल क्षेत्र ही नहीं वरन् सम्पूर्ण भारत के इतिहास में इस जाति को गौरवपूर्ण कार्य करने के लिये याद किया जाता है। जिसमें कि इस वंश की वीरांगना दुर्गावती जिन्होंने अपना नाम उस स्याही से लिखा है जिसका इतिहास से मिट पाना असंभव है। उसी के बाद इस जाति का पतन हुआ और आज ये रंक बन गई।

बस्तर की जनजातियों का वर्गीकरण :-

बस्तर की जनजातियों को 5 भागों में बांटा गया है-

1. भौगोलिक आधार पर्वत, मैदान, नदियों के आधार पर उल्लेख किया गया है- डा. दुबे, मजूमदार, गुहा उल्लेखनीय प्राचीन जातियां अबूझमाड़, बैगा, गोंड-गोंड की उपजातियां मरिया, माडिया, मुरिया हैं।
2. द्रविण भाषा का क्षेत्र बस्तर की गोंड जनजातियों को द्रविण भाषा के परिवार से संबंधित मानते हैं।
3. प्रजातीय तत्वों के आधार पर इसमें बस्तर की द्रविण (गोंड) गोडेड समूह, फोटोस्टोलायेट लोग निवास करते हैं। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )
4. आर्थिक आधार पर वर्गीकरण- डॉ. मजूमदार, दास और मदन ने किया है इसमें भोजन संग्रह, चारागाह, स्थानान्तर प्रसी, पठारों की तलछटीय में निवास करने वाली जाति और हिन्दू धर्म में समाहित होने वाली जाति का उल्लेख किया है। इसमें माड़िया गोंड, मुरिया, स्थानान्तरण प्रवासी के अन्तर्गत आते हैं। स्थायी प्रवासी के अन्तर्गत, परजा, भतरा, गोंड हलबी हैं। मजूमदार ने अपनी पुस्तक दी रेसेस एंड कल्चर आफ इंडिया में जो आर्थिक आधार के लक्षण बताये हैं वे पूर्णतया बस्तर की जाति में खरे उतरते हैं।
5. विकास के आधार पर वैरियर एलविन ने इसे 4 भागों में बांटा है- आदिमजाति, सभ्य स्थानों से दूर हैं. इसमें मुख्य माड़िया पहाड़ी क्षेत्र, सघन जंगलों में निवास करने वाली जाति जो प्राचीन परम्पराओं का पालन कर रही है वह बस्तर की माड़िया जाति है सामन्तवादी गोंड और राजगोड आते हैं।

आदिम जनजातियों का अध्ययन क्यों करते हैं हम ?

इसके दो कारण दृष्टिगोचर होते है-
1. ऐतिहासिक संयोग से आगे चलकर
2. सचेष्ट प्रयास के द्वारा।

इन दोनों का प्रभाव ऐतिहासिक काल में व्यापारिक वर्ग द्वारा उनके मार्गों एवं व्यापारिक कार्यों का अनुगमन करने के पश्चात् धार्मिक राजनैतिक आर्थिक क्रियाओं में परिवर्तन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन लोगों की जीवन पद्धति रीति रिवाजों को व्यवहारों के द्वारा समझने के लिये प्रबुद्ध वर्गों का अध्ययन कर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि समाज की विभिन्न अवस्थाएं एवं उनका प्रादुर्भाव प्राकृतिक अवस्था से हुआ है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

इस तर्क का समर्थन रूसों ने भी किया है और वे आदिम समाज को सुखी मानते हैं। उपरोक्त तथ्यों का शोध छात्र-छात्राओं और प्रबुद्ध वर्गों ने अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि बस्तर का आदिम समाज प्राचीन काल से ही शोध का विषय रहा है।

क्लाखान के अनुसार :- आदिम समाजों का अध्ययन हमें स्वयं को समझने में सक्षम बनाता है। इस तरह हम जटिल एवं सरल दोनों ही तरीकों से अध्ययन कर उनके संकटपूर्ण जीवन के साथ-साथ उनके विलुप्त होने के तर्क भी हमें मिलते हैं। जैसे, आधुनिक सभ्यता का विनाशकारी प्रभाव सभी क्षेत्रों में पड़ा है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

बाह्य पक्ष में आक्रान्ताओं ने उनकी जीवनलीला को समाप्ति की ओर एक भयावह स्थिति में डाल दिया है जिसके परिणाम स्वरूप इसका प्रभाव बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों में मिलता है समाज के प्रबुद्ध वर्ग इनकी जानकारी हासिल करके नये स्रोत के रूप में जनता, सरकार व समाज के लिये उपयोगी नीतियां अपना रहे हैं एवं इनके विलोपन तथ्य और आत्मिकरण, नृतत्व विज्ञान, ऐतिहासिक मानवीय भूगोल के विद्वानों व शोध कर्ताओं के लिए एक चुनौती भरी ललकार बनकर सामने उभर रहा है।

बस्तर के आदिवासियों की उत्पत्ति के संबंध में किंवदन्तियां :-

एक बार ननद भौजाई पानी भर रही थी। भौजाई स्वरूप सीता जी थी। ननद ने व्यंग्य करते हुए कहा कि शक्तिशाली रावण की शक्ल बताओ तो सीता जी ने गोवर पर विशालकाय रावण का स्वरूप बना दिया जिसके परिणाम स्वरूप रावण की शक्ल देखकर राम ने सीता जी को निर्वासन का आदेश दिया और लक्ष्मण जी से कहा कि इन्हें जंगल में छोड़ आओ। जंगली जानवरों के भय के कारण सीता जी ने यहां पर लव-कुश को जन्म दिया उसी समय दो माड़िया (बस्तर) गोंड उन्हें अपने घर ले गये और आश्रय दिया। इस पति की अक्षमता एवं ननद के व्यवहार का सहज प्रतिरूप भारतीय परिवारों की सामाजिक स्थिति में यह चित्रण परिलक्षित होता।

हलवा जनजाति के बारे में किंवदन्ती:-

पार्वती जी एवं शंकर जी मृत्युलोक में विचरण कर रहे थे तब दो पुतलों को नारी सहित देखकर पार्वती जी ने शंकर जी से कहा है भगवन इन चारों को प्राणवत कर दो जिससे कि ये रखवाली कर सके। तब उन्होंने उन्हें प्राण दान दिये, जिससे कि ये बाद में हालीवाटा कहकर जाने गये। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

महाभारत काल की कथा के अनुसार भगवान ने जब रुक्मणी का हरण किया तब बलराम के से प्रभावित मणी के भाइयों के सिपाही को भी हल वाहिनी की संज्ञा दी जाती है जोकि कालान्तर में हल्वी कहलाई।

सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक संगठन

विभिन्न वैज्ञानिकों के मतानुसार इन जनजातियों के लिये विभिन्न प्रकार के संगठन अपने सामाजिक संबंधों और दायरों तथा परम्पराओं को तोड़ चुके हैं और सभ्य समाज के साथ समायोजन कर रहे हैं लेकिन यह पूर्णतया गलत या मिथ्या है। बस्तर के एक परिवार में 4 से 8 तक सदस्य पाये जाते हैं जो कि समाज का ढांचा रक्त लिंग आयु के आधार पर मिलता है। विवाह नातेदारी, टोटम, ट्रेस सम्पत्ति आदि को सामूहिक एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान कर एक संगठन के माध्यम से नई संस्कृति का निर्माण होता है। बस्तर में पुत्रवंशीय परिवार मिलते हैं। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

आयु लिंगीय के आधार पर युवा गृह मिलते हैं जिन्हें गोटुल और गोतुल दोनों कहा जाता है। जिसमें इन समाजों के बालक बालिकाओं को समस्त प्रकार की (आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक शारीरिक एवं यौन) शिक्षा दी जाती है जो कि इनके समाज का नैतिक माप होती है। विवाह कई रूपों में देखने को मिलता है।

अपहरण विवाह, हठ, सेवा क्रय, विवाह हैं। परन्तु इसके अतिरिक्त यहां बहुत पत्नि और बहुत पतित्व विवाह भी प्रचलित हैं इनके गोत्र सजीव वस्तुओं के आधार पर निर्धारित होते हैं जैसे जीव जन्तु वनस्पति पेड़ पौधे आदि। इनकी नातेदारियां निम्न प्रकार से होती हैं निषेधात्मक, परिहास संबंधी, संकेतात्मक, मामा अधिकार संबंध, बुआ अधिकार संबंध और संवेदात्मक अधिकार संबंध । ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

पहनावा- लोग प्रकृति की गोद में विचरण करने वाले व्यक्ति हैं जिसके कारण कि इनका प्रभाव इनके सभी प्रकार के स्वरूपों में देखने को मिलता है। ये वस्त्र के रूप में केवल गुप्तांगों पो में मि के लिये वस्त्र का प्रयोग करते हैं। आभूषण पीतल एवं लोहे के पहनते एवं लकड़ी के पहनते है।

त्यौहार- बस्तर में चैत पर्व, इसमें आम व चार का भोग लगाते हैं। ये लोग हिन्दू सभ्यता के सभी त्यौहारों को अपनाते हैं और हिन्दू धर्म पर विश्वास करते हैं। लेकिन कुछ धार्मिक क्षेत्रों में इनकी अपनी आस्था अलग है। ये नवाखाई, भादो, कोरा, अमावश्या, दिवाली, श्रावण की पूर्णिमा को बकरे की बली देते हैं। होलिका दहन के समय आंवला भार होता है। इनके प्रत्येक नृत्य कर्मा, सिरसा डागर आदि हैं। तथा बस्तर का दशहरा मप्र में मशहूर है क्योंकि दन्तेश्वरी माता को चढ़ावा चढ़ाया जाता है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

बस्तर के आदिवासियों की प्रशासनिक व्यवस्था में गांव का सरदार या मुखिया होता है। जो कि ये पैतृक रूप से प्राप्त होता है। वही सभी प्रकार के निर्णय करता है। (आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक) गांव में आने वाला अतिथि कोटवार के पश्चात मुखिया के घर में जाता है और उससे परिचित होता है उसके पश्चात अन्य लोगों से।

बस्तर की आदिवासियों की अर्थ व्यवस्था में भौगोलिक प्रभाव देखने को मिलता है। वर्तमान में औद्योगिक करण के कारण ये लोग मजदूरी करने लगे हैं। भौगोलिक अर्थव्यवस्था का ऐतिहासिक काल से निरन्तर प्रभाव इनके शरीर पर देखने को मिलता है जैसे कि प्रकृति की तरह भी इनका शरीर हुष्ठ पृष्ठ रंग काला ऊंचाई सामान्य और उत्तम होती है। प्रकृति के स्वच्छन्द में इनकी मोटाई बहुत ही भावुक और सुन्दर होती है। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

बस्तर की अरण्य और वन्य प्राणी- बस्तर में सघन जंगल मिलने के कारण यहां पर भयंकर हिंसात्मक जीव जन्तु की बाहुल्यता है यहां जिन क्षेत्रों में सघन वन पाये जाते हैं वे हैं कांकेर, बारसूर, अमरावती, कोटा, मातला।

मुख्य वृक्ष- सागोनसाल, शीशम, सतकठा, महुआ, आंवला, चिरोंजी आदि हैं और विभिन्न प्रकार के कन्द फूल फल भी यहां पाये जाते हैं। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

जानवर में- शेर, चीता, भालू वनभैंसा, नील गाय, चिड़िया, तोता मैना नील कंठ, मयूर तीतर आदि हैं।

उपसंहार- प्रदेश की प्राकृतिक एवं नैसर्गिक सौन्दर्य के साथ-साथ आदिम जनजातियों की संस्कृति एवं समाज के कार्यात्मक पहलुओं के लिए भी बस्तर जिला प्रसिद्ध है। यदि हम अपने असभ्य जीवन या आदिम स्वरूप को देखना चाहते हैं तो बस्तर के वर्तमान स्वरूप 請 अबूझमाड़ और मूरिया, माड़िया जनजातियों को देख सकते हैं। ( बस्तर क्षेत्र के आदिवासियों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक विश्लेषण | Bastar kshetra ke adiwasiyo ka bhaugolik vishleshan )

क्योंकि ये अपनी सभ्यता एवं समाज में इतने लौन रहते हैं कि इन्हें बाहरी सभ्यता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन कुछ जातियों ने अपना ये प्रभाव छोड़ दिया है कि एक दृष्टि से ये सराहनीय और एक दृष्टि से ये निंदनीय है क्योंकि ये अपनी सभ्यता छोड़ रहे हैं क्योंकि ये अपनी जीवित रहने के साथ-साथ समायोजित करें तो निश्चित ही अच्छा परिणाम प्राप्त होगा।

इन्हे भी पढ़े 👉

छत्तीसगढ़ी गीतों में नारी भाव 

छत्तीसगढ़ के दाऊ रामचंद्र देशमुख

मनेन्द्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर जिला सामान्य ज्ञान

खैरागढ़ छुईखदान गंडई जिला सामान्य ज्ञान

सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिला सामान्य ज्ञान

Source : Internet

Leave a Comment