बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti

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बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti
बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains और Interview पूछा जाता है, तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

 बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti

बस्तर की सीमा –

बस्तर का क्षेत्रफल 13,062 वर्गमील था। इसके उत्तर में कांकेर रियासत और रायपुर जिला, पूर्व में जयपुर जिला, दक्षिण में भद्राचलम तालुका, पश्चिम में चांदा जिला तथा निजाम हैदराबाद के क्षेत्र थे।

बस्तर के इतिहास का सूत्रपात

रामायणयुगीन दण्डक वन हो आज के बस्तर का दण्डकारण्य है, जो कभी महाकान्तार भी कहा जाता था। बस्तर की आदिवासी संस्कृति एवं समाज व्यवस्था तथा उनकी शाक्त एवं शैव परम्परा तथा जादू-टोना जैसा तांत्रिक विश्वास आदि ऐसे तत्व हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ आसुरी संस्कृति का वर्चस्व रहा है। बस्तर में पाये जाने वाले अनेक गाँव एवं मामा-भान्जे के परस्पर प्रगाढ़ संबंध रावण और मारीच के संबंधों को व्यक्त करते हैं। वर्तमान में सांवरा जो उस समय शबर कहे जाते रहे होंगे उसके प्रमाण के लिये बस्तर के निकटवर्ती जिले बिलासपुर में आज भी शिवरीनारायण का मंदिर खड़ा है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

नदियों के शंखिनी- डंकिनी आदि नाम भी आसुरी प्रवृत्ति के द्योतक है। अतः यह स्पष्ट यहां राम ने वनवास के समय पदार्पण किया होगा। गोदावरी नदी सोता और राम को पर्णकुटी की याद दिलाती है। आज भी बस्तर में काला हीरा मिलता है। जो यह संकेत देता है कि उस समय यह वन बडा ही समृद्ध रहा होगा और बस्तर की अन्य खनिज सम्पदा भी यही प्रमाणित करती है। कहा जाता है पाण्डवों ने भी अपना वनवास काल यहां व्यतीत किया था। अबुझमाड़ क्षेत्र में आज भी एक ऐसा गाँव “पुजारी कांकेर” है, जहां प्रति वर्ष पाण्डवों एवं धनुष तीर आदि उपकरणों की पूजा होती है।

नगरी-सिहावा का क्षेत्र श्रृंगी ऋषि एवं सप्त ऋषियों की तपोभूमि कहा जाता है। अगस्त मुनि भी आरण्डयक में निवास करते थे। अतः यह सिद्ध होता है कि बस्तर की भूमि ऋषि-मुनियों की भी तपोभूमि रही है। इन सब स्थितियों से ज्ञात होता है कि बस्तर में ऋषि मुनि एवं राक्षस दोनों ही प्रकार के लोग रहते थे। बस्तर की इन्द्रावती नदी, चित्रकूट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, वारसूर की सातधारा इसके अलावा अन्य बहुत सी छोटी-मोटी नदियाँ यह इंगित करती हैं कि उस समय बस्तर के चारों ओर काफी पानी रहा होगा। बस्तर में लंका नाम का ग्राम है। बैलाडीला के सर्वोच्च शिखर पर “पण्डवार’ नामक ग्राम है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

बस्तर का नामकरण-

बस्तर के नामकरण के संबंध में भी किंदन्तियाँ हैं। एक किदन्ती है कि बस्तर की नींव डालने वाले चूंकि बांस तले निवास करते थे अतः यह बांस तल ही बस्तर कहलाने लगा। दूसरी किदन्ती है कि जब देवी दन्तेश्वरी को ज्ञात हुआ कि काकतीय शासक उनकी शरण में आया है तो वे उसे साथ लेकर उत्तर की ओर बढ़ी। उन्होंने राजा से कहा था कि वह आगे-आगे चले किन्तु पीछे मुड़कर न देखे। रास्ते में शंखिनी डंकिनी नदी आ जाने के कारण देवी के पांव के रेत में धंस गये। अतः उनके घुंघरूओं की आवाज बन्द हो गई। राजा ने लिया कि देवी आ रही है या नहीं? देवी वहीं स्थिर हो गई और उन्होंने अपना वस्त्र फैला दिया। जो भूमि खण्ड उनके वस्त्र के आंचल के नीचे आ गया, वह भू-खण्ड बस्तर के नाम से विख्यात हो गया।

बस्तर के राजवंश 

नल राजवंश:

बस्तर के प्रारंभिक इतिहास पर अभी तक कोई प्रकाश नहीं पड़ा है। अब तक को तथ्यपूर्ण जानकारी शिलालेखों, स्वर्ण मुद्राओं, ताम्र मुद्राओं आदि से जो मिली हैं, उससे यही ज्ञात होता है कि बस्तर में नल राजवंश का राज्य रहा है और राजवंशों के इतिहास में नल राजवंश हो सर्वप्रथम बस्तर के शासक रहे हैं. एक प्रशस्ति लेख से ज्ञात होता है कि नलवंश में भवदत वर्मन चतुर, साहसी एवं शाक्तिशाली शासक था। उसने अपने शत्रुओं का सामना बड़ी वीरता से किया। वह महेश्वर एवं कार्तिकेय का परम भक्त था। उसके पास अपार धन-वैभव था। उसने सोने के सिक्के चलवाये थे। उसका शासनकाल सन् 460 से 476 ई. तक रहा, उसकी राजधानी का नाम नन्दिवर्द्धन” था। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

अर्थपति भट्टारक उसका ज्येष्ठ पुत्र था जो एक निरंकुश शासक था। इसके पतन के पश्चात् भवदत वर्मन का छोटा पुत्र स्कन्द वर्मन शासक बना। यह भी अपने पिता के समान एक प्रतापी राजा था। उसने नलवंश की खोई प्रतिष्ठा पुनः अर्जित की उसका शासनकाल सन् 497 ई. तक रहा। राजिम के एक शिलालेख से पता चलता है कि इसके परिवार ने सन् 700 ई. तक शासन किया। डॉ. फिल्ट ने नलबाड़ी विजय का आधार लेकर यह अभिमत व्यक्त किया है कि नल नरेशों का शासन क्षेत्र तुंगभद्रा के किनारे बेल्लरी और कर्नूल में रहा होगा। पुलिकेशिन द्वितीय के शिलालेखों से भी यह स्पष्ट होता है कि पूर्वीय क्षेत्र में चालुक्य वंश के शत्रु थे। मन् 5000 ई. से लेकर सन् 850 ई. तक के इतिहास को बस्तर के इतिहास का अंधकार युग कहा जाता है, क्योंकि इस काल की कोई ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती।

गंग राजवंश:

जगन्नाथपुरी से आकर गंगवंश के लोगों ने अपने किसी पूर्वज के नाम “बाल सूर्य” के अधार पर एक नगर बसाया जो कालान्तर में बारसूरगढ़ हो गया। बारसूरगढ़ एक धार्मिक नगर था। यहां एक सौ तैंतालीस मंदिर और इतने ही तालाब पाये जाते हैं। यह स्थान शिल्प एवं पुरातत्व काल के लिये प्रतिष्ठित है। यहां की वास्तुकला के श्रेष्ठतम अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। दन्तेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में वारसूर को नारायण गुड़ी का कलात्मक गुण स्तंभ और वहाँ की पेदानुमा गुड़ की दुर्गा मूर्ति का शिल्प अद्वितीय है। ऐसा ज्ञात होता है कि गंग राजवंश केवल वारसूर तक ही सीमित रहा। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

नाग राजवंश:

नागवंश का राजा नृपति भूषण सन् 1023 ई. में आया और उसने वारसूरगढ़ पर विजय प्राप्त की। तत्पश्चात् जगदेक भूषण धारावर्ष नाम का राजा आया उसका शासनकाल सन् 1060 ई. तक रहा। नागवंशी राजाओं की राजधानी पहले वारसूरगढ़ में थी उसके बाद दंतेवाड़ा में रही तत्पश्चात चितरकोट में हो गई। धारा उसर नामक गांव आज भी आबाद है। जगदेक भूषण का पुत्र सोमेश्वर एक योग्य शासक था उसने मधुरांतक को पराजित कर उसे मार डाला। सोमेश्वर ने उडीसा लाजी एवं दक्षिण कौशल के वृहद भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था।

सोमेश्वर देव का शासन 1097 ई. तक रहा। सोमेश्वर की माता गंग महादेवी विष्णु की भक्त थी। उन्होंने इन्द्रावती तथा नारंगी नदी के संगम पर एक विष्णु मंदिर बनवाया था। इस मंदिर की स्थापत्य कला अति सुन्दर व उच्च कोटि की थी। इस मंदिर को सन् 1111 ई. में नारायणपुर नाम का गांव समर्पित कर दिया गया था। बाद में यह गांव “नारायणपाल” कहलाने लगा। राय बहादुर डॉ हीरालाल ने नागवंशी राजाओं की वास्तु कला की प्रशंसा की है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

दन्तेवाड़ा के एक शिलालेख से पता चला है कि छिन्दक नागवंशीय राजाओं में एक प्रतापी राजा भी हुआ था, जिसकी बहन का नाम मासक देवी था। यह एक विदुषी एवं प्रजावात्सल्य से युक्त नारी थी। यह हमेशा अपने भाई को प्रजा के हितों की ओर आकर्षित कर उसे प्रोत्साहित करती थी। कहा जाता है कि नागवंशी की उत्पत्ति किसी धरणीन्द्र” नामक नागराज से हुई है। सिन्धु नदी के किनारे यह शेरनी का दूध पीकर पाला-पोसा गया। आगे चलकर यह एक प्रतापी राजा हुआ। बस्तर के छिन्दक नागवंशी कश्यप गोत्र के थे। सोमेश्वर देव के पश्चात् नरसिंह देव एवं हरिशचन्द्र नाम के राजाओं ने राज्य किया था। हरिशचन्द्र नागवंश के अंतिम शासक थे।

काकतीय राजवंश:

काकतीय वंश के आदि पुरुष प्रताप रूद्रदेव काकतीय देवी के उपासक थे काकतीय और दुर्गा परस्पर पर्यायवाची नाम है। आंध्र प्रदेश की एकशिला” नामक नगरी में काकतीय देवी का प्रसिद्ध मंदिर था। एक शिला को ही तिलंगी भाषा में उरूकुल कहा जाता है। यह उस्कुल शब्द ही बाद में वारंगल कहा जाने लगा। काकतीय वंश के आदि पुरुष प्रताप रूद्रदेव को उसके पिता ने युवराज पद देकर राज्य विस्तार के लिये भेजा। एक प्राचीन नाटक “प्रतापादित्य विजय में यह प्रसंग मिलता है। इसने कई राज्यों पर विजय प्राप्त की। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

मुगल शासक की सेना ने इसे कई बार हराने की कोशिश की किन्तु वे असफल रहे। बड़े प्रयास के बाद मुसलमान शासक की सेना ने प्रताप रुद्रदेव को परास्त कर उन्हें भागने के लिये बाध्य किया। प्रताप रूद्रदेव ने बस्तर में शरण ली। प्रताप रूद्रदेव ने बस्तर के अनेक जनपदों पर स्वयं का अधिकार कर लिया और कुछ समय तक राज्य किया। तत्पश्चात् वे पुनः वारंगल आ गये और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।

भाई की मृत्यु के पश्चात् अन्नमदेव वारंगल से बस्तर पहुंचे। उसने नागवंश के अंतिम राजा हरिशचन्द्र को हराया और ये सन् 1314 ई. में राज्य सिंहासन पर बैठे। वह वारसूरगढ़ में मात्र एक वर्ष रहा। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

अन्नमदेव से लेकर प्रवीरचन्द्र भंजदेव तक चालुक्य राजवंश की कई पीढ़ियों ने राज्य किया। उनमें से पुरुषोत्तम देव, रक्षपाल देव, दलपत देव, महिपाल देव, भोपाल देव, भैरम देव और रूद्रप्रताप देव का शासनकाल अपनी विशिष्ट गतिविधियों के कारण चर्चित रहा है।

महत्वपूर्ण व्यक्तित्व

पुरुषोत्तम देव ने अपने चक्रकोट राज्य से जन्ननाथपुरी तक की यात्रा दण्डवत करते हुये की थी। इनके साथ कुछ आदिवासी भी हो लिये थे। अतः इस कष्टसाध्य यात्रा से लौटने के बाद पुरुषोत्तम देव ने इन आदिवासियों को जनेऊ पहनाते हुये सम्मानजनक शब्दों में “भद्र” कहा। यह भद्र शब्द ही आगे चलकर “भतरा” हो गया और इस नाम पर एक जनजाति चल पड़ी जिसे “भतरा” कहा जाता है। राजा पुरुषोत्तम देव को “रथपति” की भी उपाधि मिली थी। अतः उन्होंने बस्तर में गोवा की रथ यात्रा एवं दशहरे की रथ यात्रा का शुभारंभ किया। बस्तर के काकतीय शासकों ने वारसूर, दन्तेवाड़ा, बड़े डोंगर, चीतापुर, राजनगर, मंधोता, कुरुसपाल और चक्रकोट में राजधानी बनाई। राजा हगपाल देव के समय राजधानी बस्तर में बनी।

राजा दलपतदेव का शासनकाल सन् 1721 से 1774 ई तक रहा। इसी के शासनकाल में बस्तर राज्य नागपुर के भोंसला शासकों के पास चला गया। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

युवराज भोपालदेव ने सन् 1842 के लगभग शासन सम्हाला भोपालदेव शारीरिक एवं बौद्धिक दृष्टि से योग्य शासक था। वह विद्वान था। ज्योतिष विद्या भी जानता था। सन् 1830 ई. में उसने भोंसला शासक रघुजी द्वितीय को सिहावा नज़राने के रूप में दे दिया था। भोपालदेव की सन् 1853 ई. में मृत्यु हो गई। भैरमदेव ने 1853 से 31 सालों तक राज्य किया।

दलगंजनसिंह भोपालदेव एवं भैरमदेव दोनों का ही दीवान था। प्रजा इससे प्रसन्न थी मोतीसिंह दीवान बना था, किन्तु वह इस पद के लिये अयोग्य था। गोपीनाथ कपड़दार नामक व्यक्ति को दीवान बनाया गया पर वह क्रूर एवं निरंकुश निकला और इसके विरुद्ध सन् 1876 में बस्तर में विद्रोह की ज्वाला भभक उठी थी। गोपीनाथ के बाद लाल कालिन्द्रसिंह दीवान बने। यह अपने पिता दलगंजनदेव की तरह दबंग और निडर थे। प्रजा इसे बहुत चाहती थी और यह भी राजा पर भारी पड़ता था। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

सन् 1891 में भैरमदेव का पुत्र युवराज रूद्रप्रतापदेव बस्तर की गद्दी पर बैठा। यह एक सौम्य व शालीन शासक था। इसे रामलीला से अत्याधिक लगाव था और इसने अपने शासनकाल में सिरासार, राजमहल में रामलीला, गणेशोत्सव, दशहरा, रामनवमी आदि पर्व मनाने की प्रथा डाली थी। इसी राजा के समय एक विद्रोह हुआ था। ऐसा अनुमान है कि इस विद्रोह में कालिन्द्रसिंह का हाथ था। उसने गुंडाधुर व देवरीधूर का सहारा लिया। तत्कालीन दीवान राय साहब पड़ा बैजनाथ ने वनों का आरक्षण कर दिया था। इसके अलावा पूरी रियासत में अनिवार्य शिक्षा लागू कर दी थी।

कबाड़ी प्रथा से लोग नाराज थे हो अतः विद्रोह की अग्नि भड़क उठी। कालिन्द्र सिंह एवं उसके अन्य विद्रोही साथियों को जेल में डाल दिया गया और विद्रोह दबा दिया गया। राजा रूद्रप्रताप देव की मृत्यु सन् 16/11/1921 में हुई। राजा रूद्रप्रताप देव निःसंतान थे अतः प्रजा के आग्रह पर राजकन्या प्रफुल्ल कुमारी देवी को बस्तर की राजगादी पर बैठाया गया। सन् 1922 में उनका राज्याभिषेक हुआ और सन् 1936 में उनकी मृत्यु हो गयी। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

उनकी मृत्यु के पश्चात् उनका ज्येष्ठ पुत्र प्रवीरचन्द्र भंजदेव बस्तर की राजगद्दी पर बैठे। प्रवीरचन्द्र भंजदेव विद्वान, ज्योतिषि शास्त्र एवं दर्शन शास्त्र के जानकार थे। उन्हें अध्ययन करने का शौक था। उनकी एक बड़ी लायब्रेरी थी। उनका अधिकांश समय अध्ययन और चिन्तन-मनन में व्यतीत होता था। वे अपनी प्रजा को बहुत चाहते थे। उनकी आदिवासी प्रजा उनके लिये मर मिटने तक को तैयार रहती थी। इस तरह से राजा और प्रजा के बीच मधुर संबंध थे। यह बात अलग है कि भंजदेव में कतिपय व्यक्तिगत दुर्बलता थी किन्तु जहाँ उसके शासन का प्रश्न है, वह लोक प्रिय राजा था।

स्वतंत्रता के बाद अन्य रियासतों की तरह बस्तर भी भारत संघ में विलीन हो गया। सन् 1961 की 12 फरवरी को प्रवीरचन्द्र भंजदेव को शासन द्वारा नजरबंदी कानून 1950 की धारा 7 की उपधारा के अनुसार नजरबंद किया गया और उनके ऊपर आरोप लगाये गये जिनमें कोर्ट ऑफ वार्डस का विरोध प्रमुख है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

फलस्वरूप प्रांतीय सरकार यह समझने में संतुष्ट है कि तुम्हारे कार्यों से राज्य सरकार की सुरक्षा, अनुशासन एवं व्यवस्था के मार्ग में रुकावटें पड़ रही हैं। अतः प्रवीरचन्द्र भंजदेव ने अपना उत्तर नरसिंहगढ़ जेल से फुलस्केप साइज के 23 पृष्ठों में भेज दिया। यह उत्तर सलाहकार बोर्ड के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। बोर्ड ने प्रवीरचन्द्र भंजदेव की नज़रबन्दी को गलत ठहराया। इसके बाद भी प्रांत की सरकार उन्हें रिहा करने को तैयार नहीं थी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के हस्तक्षेप से उन्हें एक स्वतंत्र नागरिक की भांति जीने का अधिकार मिला।

प्रवीरचन्द्र भंजदेव के जीवन का अंतिम चरण काफी कष्टपूर्ण रहा, किन्तु आदिवासी उनके जीवन पर्यन्त सच्चे स्वामी भक्त बने रहे। वे अपने राजा प्रवीरचन्द्र भंजदेव की सुरक्षा के लिये महल की पहरेदारी करते। राजा के दुख-दर्दों को दूर करने की चेष्टा करते। आदिवासी राजा के ऊपर अपने प्राणों तक के बलिदान के लिये तैयार रहते थे। बस्तर के इस राजा और प्रजा के बौच के मधुर संबंधों की मिसाल किसी राम राज्य से कम नहीं है। विश्व में ऐसे उदाहरण बहुत ही इने-गिने मिलते हैं। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

दीवान कालिन्द्रसिंह आदिवासियों के बल पर ही विद्रोह कर सका। (1910 ई) आदिवासियों के विद्रोह से यह भी बात सिद्ध होती है कि आदिवासी जंगल के मामले में किसी भी प्रकार की दखलंदाजी पसंद नहीं करते। उनकी धारणा है कि वे जंगल के हैं और उनका जंगल है। आदिवासी अपनी संस्कृति में भी परिवर्तन के अनायास कायल नहीं हैं और न उन्हें बाह्य संस्कृति की सी शिक्षा ही पसंद है। वे यह भी नहीं चाहते कि उनसे ऊपर किसी प्रकार स्सिवर उडाला है कुछ किया जावें । यही कारण है कि समय-समय पर आदिवासियों ने विद्रोह का सर उठाया ।

बस्तर के नलवंश से लेकर चालुक्य वंश तक के शासनकाल में आवश्यक वस्तुओं की कोई कमी न थी। आवश्यक वस्तुयें सस्ती कीमत पर उपलब्ध होती थी। आबादी कम थी और जीवन बड़ी सहूलियत से चलता था, किन्तु आज तो आबादी एवं महगाई दोनों ही बढ़ रही हैं। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

बस्तर के राजवंशों के ऐतिहासिक अध्ययन के साथ-साथ हमारी दृष्टि उन आदिवासियों पर जाती है, जिनकी जनसंख्या बस्तर की कुल जनसंख्या की 70.76% है और यहां हिल मारिया वायसन हार्न मारिया, राजा मुरिया, घोटुल मुरिया, झोरिया मुरिया, भतरा, हलवा, परजा, धुरवा, गोंड और गढ़वा आदि निवास करते हैं।

चूंकि बस्तर में माड़िया एवं मुरिया जनजातियों का अन्य जनजातियों की अपेक्षाकृत अधिक बाहुल्य है, इसलिये जनजातीय संस्कृति के संदर्भ में मैं इन दो प्रमुख जनजातियों के आधार पर ही जनजातीय संस्कृति पर चर्चा करूंगी। वस्तुतः माडिया और पुरिया जनजातियों गोंड जनजाति की ही उपशाखायें हैं। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

माड़िया जनजाति की शिक्षा एवं स्वास्थ्य:

माया जनजाति शिक्षा एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत पिछड़ी हुई है। तथाकथित चोपी गई शिक्षा व्यवस्था उन्हें रुचि कर नहीं लगती उनके बच्चे स्कूल तभी तक जाते हैं, जब तक कि वे काम करने में अक्षम होते हैं। महिलाओं की शिक्षा तो नहीं के ही बराबर है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी वे एकदम पिछड़े हुये हैं। उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य ज्ञान तक का बोध नहीं है। बीमार पड़ने पर झाड़-फूंक कराते हैं।

स्त्रियों के प्रजनन और प्रसूति के समय आज भी क्रूर पद्धतियों को अपनाया जाता है। हेल्थ सेन्टर से इनका कोई सरोकार नहीं है अशुद्ध पेयजल एवं अशुद्ध पर्यावरण आंत्रशोथ, पीलिया, मोती आदि रोगों को जन्म देते हैं। चर्म रोग भी पाया जाता है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

औद्योगिक संस्कृति एवं बाह्य संस्कृति का कुप्रभाव

बस्तर का बैलाडीला क्षेत्र औद्योगिकता के कारण आज परिवर्तित सा नज़र आ रहा है। आवागमन के साधन बढ़ गये हैं और प्रायः संपूर्ण भारत के लोग इस औद्योगिक क्षेत्र में काम करने आये हैं। बाह्य लोगों को देखकर आदिवासियों में भी अच्छा खाने-पीने एवं पहनने ओढ़ने की इच्छा करने लगे हैं। इस तरह से उनकी आवश्यकतायें तो बढ़ने लगी हैं किन्तु उनकी आर्थिक स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ है, जिसके फलस्वरूप उनकी अर्थ व्यवस्था में असंतुलन उत्पन्न हो रहा है। बहुत से आदिवासी पेंदा खेती छोड़ कुलो, मजदूरी के लिये आगे बढ़े हैं। उनमें बाह्य संस्कृति के मनोरंजन के साधनों के प्रति आकर्षण बढ़ा है। इस तरह से उनमें अप्रत्यक्ष रूप से अपनी संस्कृति के प्रति एक प्रकार की उदासीनता सी आ रही है। आदिवासी स्त्रियाँ भी इससे अछूती नहीं रह सकीं।

डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने विवाह योजना सहृदयता से ही क्यों न बनाई हो, किन्तु इसके आदिवासी स्त्रियों पर कुपरिणाम हो हुये हैं। दो संस्कृतियों के लोगों के बीच सांस्कृतिक सात्मीकरण इतनी आसानी से नहीं होता, जैसा कि लोग समझ बैठते हैं। सभ्यता बदल सकती है, किन्तु सांस्कृतिक मूल्यों को बदलने में युग लग जाते हैं। अतः एक संस्कृति पर दूसरी संस्कृति को आरोपित करना अन्य अनेक समस्याओं को जन्म देना है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

आश्रयों की व्यवस्था भी आदिवासियों को बाह्य संस्कृति की ओर आकर्षित कर रही है। यह जरूरी नहीं कि जो नैतिक मूल्य किसी एक संस्कृति पर लागू हों, वे अन्य संस्कृतियों में भी लागू किये जायें, क्योंकि कोई भी संस्कृति अपनी परम्परागत पृष्ठभूमि पर ही खड़ी होती है। अतः बाह्य संस्कृति के नैतिक मूल्य एवं शिक्षा आदिवासी लोगों के लिये अनुकूल नहीं हो सकते, बल्कि आदिम समाजों में भी उस तरह की समस्यायें उठ खड़ी होंगी, जिस तरह की समस्यायें कस्बों और नगरों के निर्धन वर्ग में पाई जाती हैं।

मुरिया जनजाति

बस्तर की मुरिया जनजाति गोंड जनजाति की ही एक उपशाखा है, वस्तुतः माड़िया और मुरिया दोनों ही गोंड जनजाति की उपशाखायें हैं, जो माहिया झरनों के किनारे रहन लगे वे झोरिया कहलाये और जो मैदानों में रहन लगे वे मुरिया कहे जाने लगे। जहाँ तक देवी-देवताओं, गोत्रों, विवाह, समाज व्यवस्था एवं संस्कृति का प्रश्न है तो माहिया और मुरिया जनजातियों को परस्पर अलग कर पाना कठिन है। क्योंकि दोनों में इतना अधिक साम्य है कि दोनों अलग कर देखी ही नहीं जा सकतीं। मारिया शब्द की उत्पत्ति “मूर” शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है। मूल या जड़। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

भोजन:

मुरिया जनजाति के लोग भी माड़िया जनजाति के लोगों की ही तरह कोदों, कुटकी एवं चावल का पेज पीते हैं या भात बनाते हैं इसके अलावा जंगली उपज तेंदू, चार, कंदमूल, मास मछली आदि खाते हैं।

अर्थ-व्यवस्था:

मुरिया जनजाति की मिली-जुली अर्थ व्यवस्था है, कृषि कर्म, जंगली उपज इकट्ठी करना, कुली-मजदूरी करना आदि आदि कार्य करते हैं, मुरिया अर्थ-व्यवस्था में मुरिया स्त्रियों की महत्वपूर्ण सहभागिता है। वस्तुतः मुरिया स्त्रियों का परिवार व समाज में मूल्यांकन उनकी आर्थिक सहभागिता के कारण ही होता है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

मुरिया गाँव का स्वरूपः

मुरिया गाँव कच्चे एवं घासफूस के घरों के समूह होते हैं। गाँव के बीच में या बाहर घोटुल बना होता है। गांव के एक छोर पर देवी की मढ़िया और दूसरे छोर पर बाहर शमशान होता है। शमशान में मृतक आत्माओं के चिन्ह स्वरूप पत्थर पड़े रहते हैं।

गाँव के प्रमुख व्यक्ति:

परगना माझी, माझी, सिरहा, गायता, बैगा, गुनियाँ, पटेल आदि गाँव के प्रमुख व्यक्ति होते. हैं। परगना माझी अपनी सहायता के लिये बूमकाल बुलाता है। भूमकाल के सदस्य विभिन्न ग्रामों के प्रतिष्ठित व्यक्ति होते हैं। बूमकाल की सहायता से परगना माझी महत्वपूर्ण निर्णय लेता है। समय समय पर उसको सलाह-मशवरा लेता है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

सामाजिक संगठन:

मुरिया जनजाति में पितृसत्तात्मक परिवार पाये जाते है। पितृ सत्तात्मक परिवार होने के बावजूद भी स्लियों को परिवार व समाज में पर्याप्त स्वतंत्रता एवं बराबरी का दर्जा प्राप्त है। मुरिया समाज में एक विवाही परिवार एवं बहु विवाही परिवार पाये जाते हैं। संयुक्त परिवार कम किन्तु केन्द्रित परिवार अधिक पाये जाते हैं. मुरिया समाज दो भागों में विभक्त है दादा भाई एवं अको मामा एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है। माडिया लोगों की ही तरह ममेरे- फुफेरे भाई-बहन के बीच के विवाह को अधिमान्यता दी जाती है।

धार्मिक संगठन:

सिंग जनजाति का धर्म, अधविश्वास, जादू-टोना, नृत्य-गीत एवं मेले-मड़ई आदि से परस्पर इस तरह गुम्फित है कि इन्हें अलग-अलग कर देख पाना कठिन है। प्रत्येक गाँव के अपने देवी-देवता होते हैं। परगना स्तर पर प्रति वर्ष विभिन्न स्थानों में मड़ई भरती है। इस मड़ई में परगना के अंतर्गत आने वाले विभिन्न मामों के देवी देवताओं के छत्र व आँगा लाये जाते हैं। जो देवी को मड़िया के सामने रखे जाते हैं। आदिवासियों की धारणा है कि देवी अपने मातहत सभी देवी-देवताओं की साल में एक बार बैठक करती है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

जजमानी प्रथा:

बस्तर को माडिया एवं मुरिया जनजातियों में जजमानी प्रथा का प्रचलन है पड़वा लोगो की धोकरा कला (बेल मेटल कला) इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, बस्तर के आदिवासियों के लिये पढ़वा लोग उनके देवी-देवताओं एवं टोटम चिन्हों की मूर्तियों बनाते है, जिसके बदले में आदिवासी इन्हें चावल, मुर्गी एवं कुछ मुद्राएँ देते हैं। प्राचीन काल में तो इन्हें गाय-बैल तक दिये जाते थे, किन्तु अब मुद्रा देकर ही ये मूर्तियाँ खरीदी जाती है, इस तरह से मुरिया समाज में जजमानी प्रथा पाई जाती है

माड़िया एवं मुरिया जनजातियों का सौन्दर्य-बोध:

माड़िया एवं मुरिया जनजातियों में अद्भुत सौन्दर्य बोध होता है। रंग-बिरंगे मूंग-मोतियों से बहुत सुन्दर मालायें एवं पट्टियाँ बनाते हैं। इनके रंगों का मिश्रण बड़ा ही मनमोहक होता है। ये स्वयं के गले में मोती- मूंगों के आभूषण पहनते हैं भले ही तन पर कपड़ा न हो, युवक अपनी पगड़ी मूंगों-मोतियों के आभूषणों से सजाते हैं। स्त्रियाँ भी माथे पर मोती मूंगों की पट्टी सजाती है। खियाँ कोड़ी को बनी हुई पट्टी अपने जूड़ों में बांधती है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

गुदना गुदाने की प्रथा माया एवं मुरिया स्त्रियों में पाई जाती है। गुदना से गुदी हुई स्त्री में युवक विशेष सौन्दर्य देखता है।गुदना किये बिना माड़िया एवं मुरिया लड़की का विवाह सम्पन्न नहीं होता। गुदना के साथ अनेक अवधारणायें जुड़ी है जैसे कि पैरों में गुदना कराने से स्त्री स्वर्ग की सीढ़ी सहज ही चढ़ सकती है। हाथों में गुदना कराने से श्रम-शक्ति बढ़ती है आदि-आदि।

बस्तर के आदिवासियों की प्रमुख समस्यायें

बस्तर के आदिवासियों के सामने आर्थिक शोषण एवं कर्ज से लदे रहने की विकराल समस्या है। इनके जीवन में कर्ज उतर ही नहीं पाता। एक कर्ज उतरता है तो दूसरा चढ़ जाता है। इनकी जंगली उपज एवं इनके द्वारा निर्मित वस्तुयें कोचिये (बिचौलिए) मिट्टी के मोल लेकर मनमाना मुनाफा कमाते हैं। बस्तर के आदिवासी सिक्के गिनना सीख गये है, किन्तु अभी वस्तुओं की क्वालिटी एवं क्वान्टिटी नहीं जानते। अतः आवश्यकताओं की वस्तुयें क्रय करने पर उनका कोचिये एवं व्यापारी खूब शोषण करते हैं और उनकी अज्ञानता का भरपूर नाजायज लाभ उठाते है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

बस्तर क्षेत्र में औद्योगिक विकास एवं आवागमन के साधनों के विकास के कारण यहाँ की जनजातियाँ बाह्य संस्कृति के सम्पर्क में आई हैं, जिसके फलस्वरूप इनकी परम्परागत जीवन-दृष्टि में अप्रत्यक्ष रूप से परिवर्तन आ रहा है और उनकी आवश्यकतायें बढ़ रही है। अतः उनकी आवश्यकताओं एवं आर्थिक स्थिति के बीच असन्तुलन पैदा हो गया है। बाह्य संस्कृति की चकाचौंध उन्हें अपनी संस्कृति से धीरे-धीरे उखाड़ रही है।

आदिवासी स्त्रियों के यौन शोषण की समस्या भी इधर उठ खड़ी हुई है बाह्य संस्कृति के विभिन्न सतही आकर्षण उन्हें मोहित कर रहे हैं और उनमें अपनी संस्कृति के प्रति उदासीनता पैदा हो रही है, वे स्वयं की सांस्कृतिक भूमि से उखड़ते से नजर आ रहे हैं। उनकी स्वावलम्बन की भावना कम हो रही है। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

आदिवासी क्षेत्रों में विभिन्न आश्रमों के स्थापित हो जाने से आदिवासी संस्कृति के लिये खतरा पैदा हो गया है। आश्रमों के माध्यम से आदिवासियों पर बाह्य संस्कृति के अनावश्यक नैतिक मूल्यों को थोपा जा रहा है, विभिन्न संस्कृतियों के अपने अलग नैतिक मूल्य होते हैं, जो मूल्य किसी संस्कृति के लिये नैतिक है, वे अन्य दूसरी किसी संस्कृति के लिये अनैतिक भी हो सकते हैं। कोई भी समाज-व्यवस्था अपने परम्परागत जीवन मूल्यों एवं अवधारणाओं पर खड़ी होती है और उस समाज व्यवस्था की अपनी निज की ऐसी विशेषतायें होती हैं जो अपने समाज को विघटन होने से बचाती है। अतः आदिवासी संस्कृति पर बाह्य संस्कृति का थोपा जाना वहाँ समस्यायें पैदा करना है। अतः बस्तर में आज आदिवासी नस्लों एवं उनकी संस्कृति के ह्रास की समस्या खड़ी हो गई है।

आदिवासी संस्कृति के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि आदिवासी समाज व्यवस्था एवं संस्कृति अपनी समस्याओं के निराकरण के लिये स्वयं सक्षम है, क्योंकि वह मानवीय मूल्यों एवं सामूहिक भावना पर आधारित है किन्तु आज उनकी संस्कृति को होन कह कहकर और उन्हें एकदम पिछड़ा कह कर उनमें एक प्रकार की आत्महीनता भरी जा रही है जो न आदिवासियों के ही हित में हैं। और न सरकार और प्रशासन के ही हित में। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

यह सच है कि आज के युग में राष्ट्र के विकास के लिये खनिज सम्पदा बहुल क्षेत्र बस्तर में औद्योगिक विकास को नहीं रोका जा सकता और न आवागमन के साधनों को ही अवरुद्ध किया जा सकता है, किन्तु इतना तो किया ही जा सकता है, जिससे बस्तर को आदिवासी संस्कृति का संरक्षण व सुरक्षा हो सके इसके लिये सर्वप्रथम आदिवासी संस्कृति में निहित उच्च तत्वों को उजागर कर उसकी महत्ता को स्वीकार करना होगा। साथ ही आदिवासियों में यह भावना पैदा करनी होगी कि उनकी संस्कृति हीन नहीं, बल्कि ठोस है और उनकी हर तरह से रक्षा करने में समर्थ है। आदिवासियों में पनप रही आत्म-हीनता एवं अपनी संस्कृति के प्रति पैदा हुई। उदासीनता को दूर करना होगा। बस्तर में कार्यक्रम व योजनायें लागू करने से पहले बस्तर की आदिवासी संस्कृति को गहराई तक समझा जावे और योजनायें उनकी सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि पर ही आधारित हों।

बस्तर में आर्थिक एवं शैक्षणिक विकास के लिये बस्तर के आदिवासियों की जन्मजात प्रतिभा एवं परम्परागत हस्त-कौशल का उपयोग करते हुये बस्तर के नैसर्गिक संसाधनों का सहारा लेकर उनके आर्थिक एवं शैक्षणिक विकास की दिशा निर्धारित की जावे। बस्तर में जो भी गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम चलाये जावें उनमें बस्तर के आदिवासियों के हितों की रक्षा करते हुये उनमें आदिवासियों की भी महत्वपूर्ण भागीदारी हो। ( बस्तर के राजवंश और जनजाति संस्कृति | Bastar ke rajvansh aur janjati sanskriti )

आज बस्तर में मानव संसाधन एवं नैसर्गिक संसाधनों के बीच तालमेल बैठाकर बस्तर के विकास की दिशा निर्धारित करने की आवश्यकता है, ताकि बस्तर, बस्तर ही बना रहे।

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