बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh

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बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh
बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे बस्तर बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains और Interview पूछा जाता है, तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh

स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् देश में इतिहास लेखन की नई परंपरा चल पड़ी है। यह परंपरा राजा महाराजाओं को दरकिनार रखकर जन इतिहास पर बल देती है। जन जीवन और उसे प्रभावित करने वाले जननायकों को ही इस परंपरा के केन्द्र में रखा गया है। इस नये चश्में से जब हम बस्तर इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो एक नाम पर एक व्यक्ति पर हमारी दृष्टि ठहर जाती है। बस्तर इतिहास उसे गुण्डाधूर के नाम से आदृत करती है।

“आंखों के लिए प्रकाश का, फेफड़ों के लिए हवा का और हृदय के लिए प्रेम का जो महत्व है, वही महत्व मनुष्य की आत्मा के लिए स्वतंत्रता का है।” सच्चाई यही है कि धरती तो आदमी को चाहिए ही, लेकिन उन्मुक्त आकाश की भी उसके लिए कम आवश्यकता नहीं है। स्वतंत्रता भी विचित्र है, भारतीय पुराण प्रतीकों की भाषा में स्वतंत्रता को कामधेनु, कल्पवृक्ष माना जा सकता है, वृक्ष को विकास के लिए जल चाहिए लेकिन स्वतंत्रता का वृक्ष जल का नहीं रक्त का सिंचन चाहता है। स्वतंत्रता से निरपेक्ष मानव सत्ता की कोई सार्थकता नहीं है। भूखे पेट वाला भी स्वतंत्रता चाहता है और नंगी पीठ वाला भी। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

बस्तर के आदिवासियों ने ही नहीं वरन् भारत के अन्य प्रदेशों के आदिवासियों ने भी अग्रेजों से टक्कर ली। देखा जाए तो एक तरह से यह लड़ाई शीशे और पत्थर की लड़ाई थी। शीशा चाहे पत्थर से टकराये चाहे पत्थर शीशे से चूर-चूर तो शीशे को ही होना था। हुआ भी यही नुकसान हुआ बेचारे आदिवासी का। परन्तु स्वतंत्रता के लिए तन-मन-धन सब कुछ अर्पित कर देने वाले सर पर कफन बांधकर निकल पड़े इन आदिवासियों का इतिहास अभी भी सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है आदिवासी शहीदों की लंबी श्रृंखला है, जिन्हें प्रकाशित करना युग की मांग है, समय का तकाजा है, ऋण से उऋण होना है।

बस्तर रियासत से संबंधित गुण्डाधूर

बस्तर रियासत से संबंधित गुण्डाधूर ने 1910 ई. में एक बड़े संघर्ष का नेतृत्व किया था। रियासत बस्तर सी.पी. व बरार के अंतर्गत आने वाला एक देशी राज्य था। 13062 वर्गमील में फैला, 17°46 से 20° 14 उत्तरी अक्षांश तथा 80°15° से 82° । पूर्वी देशांश के मध्य स्थित’ अंचल में 1911 में 43,3363 लोग निवास करते थे। राजा क्षत्रिय थे, प्रजा अधिकांशतः आदिवासी थी। 1854 ई में नागपुर के भोसले साम्राज्य का अंग्रेजी राज्य में संयोजन होता है। और बस्तर ब्रिटिश पैरामाउन्सी में आता है। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

1910 ई. का संघर्ष वस्तरवासियों का संघर्ष है जो कि लक्ष्य की प्राप्ति के लिये किया गया असफल प्रयास था। बस्तर में निवास करने वाली भतरा, परजा, धुरवा, मुरिया, माडिया, हत्या धाकड़ महरा प्रभूत जातियों ने इसमें भाग लिया संघर्ष से बुरी तरह प्रभावित भाग लगभग 137 कि.मी. लंबा और 98 कि.मी. चौड़ा था इतने बड़े अंचल में पहली बार आदिवासी संघर्ष प्रसार पाया था। विप्लव की तैयारी इतने गोपनीय ढंग से की गई थी कि न तो प्रशासन को और न आदिवासियों के मध्य बसे गैर आदिवासियों को (जो बस्तर में बाहर से आकर बस गये विद्रोह की भनक तक नहीं लग पायी जननायक गुण्डाधूर और उसके साथियों को ही इस बात का श्रेय जाता है।

गुंडाधुर का प्रत्येक घर परिवारों को धमकी 

लंबी-लंबी यात्राएं कर गोपनीय बैठकें कर सांकेतिक भाषा का प्रयोग कर उसने अपने लोगों को संघर्ष के लिये तैयार किया। एक तौर, लाल मिर्च, मिट्टी का टुकड़ा, धनुष भाले को अनुकृति सांकेतिक भाषा के रूप में प्रयुक्त किया गया। गांव-गांव पर पर ये घुमाये गये। विप्लव के लिये तैयार रहने का यह संदेशा था, जिसे बस्तरिया अच्छी तरह से समझते थे। गुण्डाधूर और उसके सहयोगी धमकी देते हुए घूमते थे कि प्रत्येक घर से कम से कम एक आदमी संघर्ष के लिए नहीं निकला तो घर जला दिया जावेगा, पशु लूट लिए जावेंगे।’

1910 ई. में किया गया यह विप्लव बस्तरवासियों द्वारा भूमकाल के नाम से अभिहित किया जाता है। भूमकाल का शाब्दिक अर्थ है एक स्थान पर लोगों की भीड़ का जमा होना, समूह में लोगों का शीघ्रता से आना जाना।” बस्तर के इस भूमकाल का नायक गुण्डाधूर, नेतानार ग्राम का धुरवा था। वह जननायक था। न तो वह राज घराने का था, न कोई छोटा-बड़ा जमींदार, न हो बस्तर के गांवों के पारंपरिक मांझी-मुखिया में से था। इस दृष्टि से गुण्डाधूर का मूल्यांकन करने पर उसका कार्य और अधिक प्रशंसनीय हो जाता है। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh
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न केवल भारतीय इतिहास वरन् विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी वक्त की मांग हुई, ऐसे अंचलों एवं ऐसे तबकों से नेतृत्व सामने आया, जहां से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती थी। बस्तर के भूमकाल में भी इतिहास का यही परिदृश्य प्रस्तुत हुआ। ओजस्वी, वीर, कुशल संगठनकर्ता, नेतृत्व के गुणों से युक्त गुण्डाधूर जननायक था। बस्तर राजपरिवार के वरिष्ठ सदस्य लाल कालिन्दर सिंह की महत्वपूर्ण खोज गुण्डाधूर था। संघर्ष की आग दूर-दूर तक फैलाने वाला यही गुण्डाधूर था।

जनवरी 1910 में गुण्डाधूर ने तारोकी (अंतागढ़ तहसील) में लाल कालिन्दर सिंह से भेंट की और संघर्ष करने का निर्देश प्राप्त किया। जान माल की क्षति उठाकर भी आदिवासी पीड़ा व कष्ट से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष करेंगे, यह लिखित स्वीकृति गुण्डाधूर व अन्य आदिवासी मुखियों ने लाल को दी। लाल के नाम से संघर्ष के लिए तैयार रहने को कहा गया। गुण्डाधूर लाल कालिन्दर सिंह के दाहिने हाथ के रूप में जाना जाता था। गांव-गांव में संघर्ष के लिए लोगों को तैयार करने के लिये वह इतनी तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाता था कि लोगों को शक होता था कि गुण्डाधूर उड़ना जानता है।

अपनी भाषा में आदिवासियों के मन मस्तिष्क से अंग्रेजी बंदूकों का भय दूर करने के लिए वह आदिवासियों को आश्वस्त करता कि तंत्र विद्या से वह बंदूक की गोलियों को पानी में बदल देगा। अपने साथ वह तावीजों की थैली लिए रहता। गांव के प्रमुख व्यक्तियों को इस आश्वासन के साथ तावीज बांटता कि उससे व्यक्ति की शक्ति बढ़ जाती है। गुंडाधूर पर लोगों का विश्वास था, उसके बारे में प्रचलित था कि एक पेली मापने की स्थानीय इकाई) में जितना मड़िया (छोटा अनाज) आता है, उससे अधिक उसको बुद्धि है। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

25 जनवरी 1910 को तय हुआ कि विद्रोह करना है, और 2 फरवरी 1910 को पुसपाल बाजार की लूट से विद्रोह प्रारंभ हो गया। इस प्रकार केवल 8 दिनों में उसके साथियों ने इतना बड़ा संघर्ष प्रारंभ कर एक चमत्कार कर दिखाया। 7 फरवरी 1910 को बस्तर के तत्कालीन राजा रूद्रप्रताप देव ने सी.पी. के चीफ कमिश्नर को तार भेजकर विद्रोह गुण्डाधूर और प्रारंभ होने और तत्काल सहायता भेजने की मांग की। विद्रोह इतना प्रबल था कि उसे दबाने के लिये सेन्ट्रल प्राव्हिन्सेंस के 200 पुलिस, मद्रास प्रेसिडेन्सी के 150 पुलिस, पंजाबी बटालियन के 170 सैनिक बस्तर भेजे गए। 16 फरवरी से 3 मई 1910 तक ये टुकड़ियां विद्रोह दमन-शमन में लगी रही। ये 75 दिन बस्तर के विद्रोही आदिवासियों के लिए तो भारी थे ही, जनसाधारण को भी दमनचक्र का शिकार होना पड़ा।

भूमकाल विद्रोह और गुण्डाधुर बस्तर 

बस्तर का 1910 का भूमकाल अकस्मात नहीं हो गया। इसकी पृष्ठभूमि वर्षों पहले से बनती आ रही थी। 1876 में आदिवासियों ने सशस्त्र प्रदर्शन कर अन्याय, अत्याचार, अनाचार से मुक्ति पायी थी. उसके पश्चात् जब अंग्रेजों ने लाल कालिन्दर सिंह की उपेक्षा कर, बस्तर प्रशासन पर नियंत्रण के लिए बाहरी व्यक्ति को दीवान प्रशासक पद पर नियुक्त करना प्रारंभ किया तब से असंतोष के बादल का बनना आरंभ हो गया था। बस्तर राजा के अधिकार धीरे-धीरे योजनाबद्ध ढंग से कम करते गये। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

दीवान नियुक्त करना आसान था, मगर उसे प्रतिष्ठित करना एक समस्या थी। कालिन्दर सिंह अदम्य महत्वाकांक्षी थे, अंग्रेजों के लिए उनके मन में तीव्र आक्रोश था. इसीलिए समकालीन व्यक्तियों ने इसे लाल झगड़ा कहा है। विद्रोह दबाने के लिये पंजाबी वाहिनी आयी थी। उसके कमांडर इ. क्लेमेन्टी स्मिथ ने लिखा है- “इस विद्रोह के कारण राज परिवार के लोग थे, जिनका नेतृत्व लाल कालेन्द्र सिंह कर रहे थे। ये लोग प्रशासन के पुराने सिद्धांतों की वापसी चाहने थे, जिसके अन्तर्गत राज्य का अस्तित्व राज परिवार के आनंद भोग के लिए अधिक से अधिक धन की प्राप्ति के लिए था।

अंग्रेजी राज जो कि अपने सिद्धांतों फिर से देशी राज वनों का आरक्षित किया जाना, स्कूलो आदिवासियों के असंतोष के के अनुसार प्रशासन चलाने वाला था, प्रशासन में अनेक परिवर्तन कर रहा था। इसके स्थान पर स्थापित करना इन लोगों का उद्देश्य था। को खोलना, बेगार, बिसाहा, छोटे कारणों में प्रमुख कर्मचारियों का शोषण आदि अंग्रेजी राज के स्थान पर देशी राज फिर से स्थापित करना” विप्लवकारियों का उद्देश्य था। 

बस्तर इतिहास में जन नायक के रूप में गुण्डाधूर के प्रतिष्ठित होने के कई कारण थे। विप्लव का गुप्त ढंग से प्रचार-प्रसार, थोड़े समय में अधिक भाग में विद्रोही तैयारी करना, अलनार के संघर्ष में विद्रोहियों का नेतृत्व करना आदि विद्रोह की जो रूपरेखा बनायी गयी थी। उसके अन्तर्गत स्कूल, थाना, वन कार्यालय का जलाया जाना, अधिकारी-कर्मचारियों की हत्या, उन्हें रियासत से निष्कासित करना, दीवान व अन्य उच्च पदस्थ व्यक्तियों की हत्या आदि शामिल थे। दीवान ने बीजापुर की ओर से चांदा (चन्द्रपुर) भागकर प्राणों की रक्षा की। रियासत के वन विभाग में पदाधिकारी मि. रूके पर हमला किया गया था। पेरी एंड कम्पनी में कार्यरत मि. सिनक्लेयर पर भी कातिलाना हमला किया गया था।

गुण्डाधुर का अंग्रेजो के साथ संघर्ष 

अंग्रेजी टुकड़ी विद्रोह दबाने के लिए आयी, उसने सबसे पहला लक्ष्य जगदलपुर को घेरे से मुक्ति दिलाना निर्धारित किया। नेतानार के आसपास के 65 गांवों से आये बलवाइयों के शिविर को 26 फरवरी को प्रातः 4.45 बजे घेरा गया, 511 आदिवासी पकड़े गये। जिन्हें बेतों की सजा दी गई। नेतानार के पास स्थित अलनार के वन में हुए 26 मार्च के संघर्ष में 21 आदिवासी मारे गए। यहां आदिवासियों ने अंग्रेजी टुकड़ी पर इतने तीर चलाए कि सबेरे देखा गया तो चारों ओर तीर हो तोर नजर आए। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

“अलनार के इस लड़ाई के दौरान ही आदिवासियों ने अपने इस जन नायक गुण्डाधूर को युद्ध क्षेत्र से हटा दिया। जिससे वह जीवित रह सके और भविष्य में पुनः विद्रोह का संगठन कर सके।” ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं कि 1912 के आस पास फिर सांकेतिक भाषा में संघर्ष के लिए तैयार करने का प्रयास किया गया था। जो प्रशासन की सतर्कता से सफल नहीं हो सका। संभावना यहीं बनती है कि गुंडापूर ही इसके पीछे रहा होगा। गुण्डाधूर के प्रति धुरवा इतनी भक्ति रखते हैं कि आज भी वे यह मानने को तैयार नहीं होते कि गुण्डाधूर की मृत्यु हो गई है। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

उल्लेखनीय है कि 1910 में विद्रोही नेताओं में गुण्डापूर ही न तो मारा जा सका और न अंग्रेजों की पकड़ में आया। गुण्डाधूर के बारे में अंग्रेजी फाइल इस टिप्पणी के साथ बन्द हो गई “कोई यह बतलाने में समर्थ नहीं है कि गुण्डाधूर कौन था? कुछ के अनुसार पुचक परजा और कुछ के अनुसार कालिन्दर सिंह ही गुण्डाधूर थे ” बस्तर का यह जन नायक अपने विलक्षण प्रतिभा के कारण इतिहास में सदैव महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता रहेगा। भारत के आदिवासी विद्रोहों की सूची में बस्तर का 1910 का विद्रोह और उसका यह महान जन नायक का नाम गौरवपूर्ण उल्लिखित है। ( बस्तर के जन नायक गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ | Bastar ke Jan Nayak Gundadhur Chhattisgarh )

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Source : Internet

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