बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar

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बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar
बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar

नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains और Interview पूछा जाता है, तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar

उत्तर में रायपुर मंडल, पूर्व में ओड़ीसा के पश्चिमांत, पश्चिम में महाराष्ट्र के पूर्वात तथा दक्षिण में गोदावरी नदी तक बस्तर का क्षेत्र प्रसारित है।

पूर्वकाल में बस्तर को दण्डकारण्य कहते थे। दण्डकारण्य की सीमा के भीतर वर्तमान समय में जयपुर स्टेट, गोदावरी जिला, बस्तर स्टेट और चांदा जिला आबाद है यहाँ पर श्रीराम चन्द्र जी आये थे। वाल्मीकीय रामायण में महानदी का नाम श्रीरामचन्द्र जी के वन गमन मार्ग में देखने से नहीं आता। परन्तु गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी प्रभृति नदियों के नाम लिखे गये है। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

हिन्दुस्तान के हृदय में स्थित मध्यप्रदेश के पूर्वाचल का दक्षिण भाग “बस्तर” ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सदियों से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। आदिमानव के प्रारंभिक विकास से लेकर अर्वाचीन काल तक बस्तर ने अनेक राजवंशों के उत्थान और पतन से संबंधित घटनाक्रम को आत्मसात किया है।

बस्तर की आराध्य देवो दंतेश्वरी माई

बस्तर की आराध्य देवो दंतेश्वरी माई (दंतेवाड़ा) की कृपा से आरण्याच्छादित इस अंचल में सुख-समृद्धि एवं वैभव विद्यमान रहा। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

विशाल भू भाग में फैले बस्तर अंचल को यदि देवी-देवताओं की धरती कहें तो शायद अतिरंजना नहीं होगी। यहां हर गांव के अपने देवी-देवता है। हर गांव में देवगृही है, जहां किसी न किसी दैवीय शक्ति का निवास माना जाता है। लकड़ी की बनी पालकी में सिन्दूर से सनी और रंग बिरंगे फूलों से ढकी विभिन्न आकृतियों वाली आकर्षक मूर्तियां प्रत्येक देवगुड़ी में देखने को मिल जाती हैं। इनमें से प्रत्येक देवी-देवता का अपना स्थानीय महत्व होता है। ये देवी-देवता और देवगुड़ी बस्तर के गांवों में धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र होते हैं।

दंतेवाड़ा का दन्तेश्वरी मन्दिर:- इन देवी-देवताओं के बीच बस्तर के गांवों में माई दन्तेश्वरी की बड़ी प्रतिष्ठा है। वे तत्कालीन बस्तर राजाओं की कुलदेवी होने के साथ ही बस्तर वासियों की आराध्यदेवी भी है। उन्हें शक्ति का प्रतीक माना जाता है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वे नवदुर्गाओं में से एक है। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

बस्तर राजघराना ( काकतीय घराना )

बस्तर राजघराना अपने को काकतीय घराना कहता है उसकी कुल देवी हैं दन्तेश्वरी माई। वह आया है दक्षिण के वारंगल से और बस गया है।

काकतीय तथा दन्तेश्वरी के नामों के पीछे कुछ रहस्य है, कि इस घराने के आदि पुरुष महाभारत कालीन पाण्डव थे। दिल्ली की दुर्दशा के बाद उन्होंने दक्षिण की शरण ली। गुरु द्रोणाचार्य को शिष्य परम्परा के कारण उन्होंने अपने वंश का नाम काकतीय रखा। संस्कृत में काक को द्रोण भी कहते हैं। इस नाम सादृश्य के कारण द्रोणीय परम्परा हुई। काकीय अथवा काकतीय परम्परा संस्कृत में हस्ती को दन्ती भी कहते हैं इस तरह हस्तिनापुर की अधिष्ठात्री देवी हस्तेश्वरी आदि कहाने के बदले दन्तेश्वरी कही गई। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

नलयुग के अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि यह धार्मिक समन्वय का युग था। भवदत्त वर्मा शेव थे पर उसका पुत्र स्कन्द वर्मा वैष्णव तथा विलासतुग वैष्णव था। परन्तु उसके द्वारा निर्मित राजीवलोचन मंदिर में शव प्रतिमाएं भी मिलती है।

बस्तर में मातेश्वरी मंदिर भैरव बाबा का मंदिर, बत्तीसा मंदिर, चन्द्रादित्येश्वर मंदिर है। इन मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा अर्चना होती है। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

माई दन्तेश्वरी बस्तर नरेशों को इष्ट देवी तो थीं ही किन्तु आदिवासियों के लिए भी यह सर्वपूज्य है।

इन्हीं के साथ-साथ गांव-गांव में मां के सहायक देवी-देवता पर घर और जगह-जगह पर हैं।  ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

राज मान्यता प्राप्त देवी-देवता

राज मान्यता प्राप्त देवी-देवताओं में केशरपाल की केशरपालीन, बस्तर की गंगादई माता, गडमधोता की महिषासुर मर्दिनी, आमाबाल की आमाबलिन, लोहड़ीगुड़ा की लोहड़ीगुड़ीन, बेड़ागांव की हिंगलाजीन कोंडागांव की दाबागोसीन, बनिया गांव की दुलारदई प्रमुख हैं।

भैरमगढ़ में भैरमबाबा और डालरदेव की कीर्ति पताका उड़ती है। बारसूर में पीला बाई का बहुत मान है। यहाँ पर महिसासुर मर्दिनी की सुन्दर मूर्ति और इनकी सतवंतीन गही है। बारसूर में भगवान गणेश को विशाल मूर्ति है। बस्तर में शिव मंदिर पुरातन काल में यहीं के निवासियों द्वारा निर्मित दुए हैं। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

कुरुमपाल के भैरम दुर्गा गणेश महादेव की मूर्ति और शिलालेख यहां की सभ्यता का इतिहास कहते हैं।

राजघाट में राजाराव नारायणपुर में दन्तेश्वरी, सातलाघाट में गुटालदेव, तेलीनघाट मुंडीन में तेलीनसती, बैलाडीला घाट की बजारिन, दरभाघाट की बंजारिन माता को सभी जानते हैं और मानते हैं। केशकाल की गोवारिन जिसे गोडिन देव भी कहते हैं के सती होने की कथा बस्तर में प्राय सभी जानते हैं। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

बत्तीसगुड़ा में बत्तीस प्रस्तरस्तथ हैं। यहां गणेश की विशाल मूर्ति दर्शनीय है। शिवलिंग भी बहुत बड़ा है।  कोंडागांव तहसील में हाल में ही बौद्ध स्तूप और बौद्ध प्रतिमा की प्राप्ति से यह कहा जा सकता है कि यहाँ बौद्ध धर्म का पर्याप्त प्रभाव रहा है।

देवों में भंगाराम बुढादेव, डोकरादेव, बारह तरह के भीमा, भैरम बलहा, घुटाल, कुंअर, पाटव, चिकटरा, डाक्टर देव, सियानदेव चौरासीदेव का बहुत नाम है। इनके अलावा और भी देव गांव-गांव, परगना- परगना निवास करते हैं। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

देवी-देवता सामान्यत

देवी-देवता सामान्यत : लहंगा-चोली पहनते हैं और काटा, मंदर सिगारी, मुंदरा, गुरद और त्रिशूल धारण करते हैं। कोई देवी-देवता सोना-चांदी के जनेऊ, सोना-चांदी के मुकुट, बाजू-बंद, मोहर माला, कमरपट्टा धारण करते हैं।

बस्तर के देवियों में और भी नाम है-मावली, करनाकोटिन, हिंगलाजीन, गंगादई, फोटईबुढ़ी, परदेशीन शीतलादई, गोदनामाता, करीतेलंगीन, घाटमुंडीन, तेलंगीन, सातवाहिनी तेलंगीन, कोटगढ़ीन, कंकालीन तथा दुलारदई, केशरपालिन, लोहराजमाता आदि का बहुत मान है। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

इन देवियों में से कुछ ही नारियल -सुपाड़ी के साथ सादी पूजा होती है।
बस्तर के भू-भाग में आंगापाटदेव का भारी प्रताप है। देवी-देवताओं के आसवारी, सिरहा, दियारी, पुजारी, सभी मिलजुलकर रहते हैं और गांव में इनका विशेष मान है। जड़िहार देवी-देवता के चंवर छड़ी धारण करते हैं। इसी तरह सोतार पीढ़ी दर पीढ़ी विशेष अवसरों पर देवी देवता को सजाते हैं।

लोहार लोगों को कुटुंबदेव, मिरचुक और अंतरवाई है। इसी तरह महरा लोगों को कुटुंबदेव राऊर और लंगूरदेव है, अबुझमाड़ में माडामार और राजा मुदियाल प्रमुख देव हैं। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )
घोटुल मुरिया लोगों को कोलार का कुड़मतुला, बेनूर को चंबुधरानी, कंगाल की राजटेको, नारायण का गढ़ियादेव अपने-अपने क्षेत्र में बहुत सम्मान पाते हैं। गांव-गांव में गायता देव है। जिन्होंने गांव विशेष को बसाया है।

इस प्रकार बस्तर अंचल के धार्मिक ऐतिहासिक स्थल अत्यंत ही मनोरम हैं। इसमें दो मत नहीं कि दन्तेवाड़ा में देव के पर्यटन मानचित्र में बस्तर को गौरवपूर्ण स्थान दिलाया है। सचमुच दन्तेश्वरीमाई का मंदिर बस्तर की सांस्कृतिक गरिमा का प्रतीक है। ( बस्तर के देवी देवता | bastar ke devi devta | deities of Bastar )

इस प्रकार इस क्षेत्र के ऐतिहासिक मंदिर, मूर्तियों, पुरातात्विक सामग्रियों गहन शोध कार्य किए जाने से बस्तर की आदिवासी संस्कृति के महत्व पर प्रकाश पड़ेगा और बस्तर की भी गणना देश के प्रमुखतम पर्यटन स्थलों की श्रेणी में की जा सकेगी।

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Source : Internet

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Rajveer Singh
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