अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh

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नमस्ते विद्यार्थीओ आज हम पढ़ेंगे  अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh के बारे में जो की छत्तीसगढ़ के सभी सरकारी परीक्षाओ में अक्सर पूछ लिया जाता है , लेकिन यह खासकर के CGPSC PRE और CGPSC Mains में आएगा , तो आप इसे बिलकुल ध्यान से पढियेगा और हो सके तो इसका नोट्स भी बना लीजियेगा ।

अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh

अगरिया जनजाति की उत्पत्ति 

अगरिया छत्तीसगढ़ की एक जनजाति है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में अगरिया तथा बिहार में असुर के नाम से भी जा पाये जाते हैं। छत्तीसगढ़ में इनकी जनसंख्या वर्ष 2011 की जनगणना में 67196 थी। राज्य में इनका प्रमुख निवास क्षेत्र सरगुजा, कोरिया, कवर्धा, बिलासपुर तथा जशपुर, सरगुजा, कोरिया आदि जिले हैं।( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

अगरिया जनजाति की उत्पत्ति संबंधी ऐतिहासिक अभिलेख नहीं मिलता। यह जाति प्रदेश की प्रमुख जनजाति गोंड से अलग हुई एक उपजाति है, जो कालांतर एक नवीन स्वतंत्र जाति के रूप में अस्तित्व में है। किवदंतियों के अनुसार प्राचीन काल में गोंड जाति के दो भाई थे। इनका आजीविका का साधन जंगली कंदमूल संग्रह, शिकार, आदिम कृषि आदि था। 

एक दिन दोनों भाइयों के बीच विवाद हो गया। छोटा भाई नाराज होकर घर छोड़कर चला गया और घने जंगल में जाकर अलग झोपड़ी ‘बनाकर रहने लगा। खाने के लिए कुछ नहीं था और वह भूख से व्याकुल था। अतः आग जलाई और कंदमूल खोजने लगा, किंतु उसे आग में भून कर खाने योग्य कुछ नहीं मिला तब क्रोधित होकर आग में वहीं पास में पढ़े हुए पत्थरों को डाल दिया और समीप ही सो गया। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

यह पत्थर लौह पत्थर (आयरन ओर) था, जो अग्नि के ताप से पिघलकर लोहा बन गया था। प्रातः उठने पर उसे आग में लौह पत्थर डालकर लोहा बनाने की कौशल ज्ञात हुआ। इसे वह आजीविका के रूप में स्वीकार किया। इनके वंशज आग से आजीविका मिलने के कारण अगरिया कहलाये।

अगरिया जनजाति के रहन-सहन 

अगरिया जनजाति अन्य जमातिरों, जैसे गोंड, भूमिया, बैगा, कंवर, उरांव आदि के साथ सुदूर वनों एवं पहाड़ी क्षेत्रों के ग्रामों में निवास करते हैं। गाँव में इनके घर मिट्टी के होते हैं, जिस पर घास फूस या देसी खपरैल का छप्पर होता है। घर में दो-तीन कमरे होते हैं। दीवार पर मिट्टी का प्लास्टर होता है, जिस पर सफेद या पीली मिट्टी की पुताई करते हैं। फर्श मिट्टी का होता है, जिसे महिलाएँ गोबर तथा मिट्टी से लीपती हैं। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

घर में अनाज रखने की कोठी, धान कुटने का मूसल, “ढँकी”, अनाज पीसने की चक्की, बाँस की टोकरी, सूपा, मिट्टी व एल्युमिनियम, पीतल के भोजन बनाने व खाने के कुछ वर्तन, ओढ़ने बिछाने के कपड़े, लोहा गलाने के लिए घर के सामने भट्टी, धोंकनी, चिमटा हथौड़ा, हथौड़ी, संसी, छोनी आदि औजार, धनुष, तौर, हसिया, हावड़ा, कुल्हाड़ी, कुदाली आदि कृषि उपकरण होते हैं।

पुरुष व स्त्रियाँ रोज स्नान करते हैं। सिर के बाल मिट्टी या अरीठे से धोकर गुल्ली या तिल का तेल डालकर महिलाएँ जूड़ा बनाती हैं। महिलाएँ शरीर में हाथ, पैर, चेहरे, कपोल, मस्तक व छुट्टी पर गुदना गुदाती हैं। वस्त्र-विन्यास में पुरुष पंछा, छोटी धोती तथा अंगरखा (बंडी) पहनते हैं स्त्रियाँ सुगड़ा पहनती हैं। महिलाएँ नकली चाँदी या गिलट के आभूषण पहनती हैं। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

इनके प्रमुख आभूषण गले में संकरी, पैरों में सांटी, पायल, गले में सिक्का, सुतिया, हाथों में ऍठी, बाहों में पहुंची पहनती हैं। इनका मुख्य भोजन चावल, कोदो, कुटकी का भात, पेज, मक्का की रोटी, उड़द, मूंग, कुलथी की दाल व मौसमी सब्जी है मांसाहार में मछली, मुर्गी, बकरा, हिरण, जंगली सूअर, खरगोश आदि खाते हैं। महुआ का शराब बनाकर पीते हैं। पुरुष तंबाकू को तेंदूपत्ता में लपेटकर बीड़ी बनाकर पीते हैं।

अगरिया जनजाति के व्यवसाय 

अगरिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय लौह अयस्क से लोहा बनाना तथा इस लोहे से हँसिया, कुल्हाड़ी, कुदाली, नागर (हल) का लोहा, तीर की नोक आदि बनाना है। स्थानीय जनजातियों के पास इसे अनाज के बदले या नगद रुपये में बेचते हैं। लौह अयस्क में कोयला मिलाकर मिट्टी की लगभग 3 फुट ऊँची भट्टी में डाल कर नीचे आग जलाकर गर्म करते हैं। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

महिलाएँ चमड़े की धोकनी पर खड़े होकर धोकनी को पैर से दबाकर भट्टी में हवा देती हैं। लौह अयस्क से लोहा गलकर अलग होता है, इससे विभिन्न वस्तु जैसे कुल्हाड़ी, फावड़ा, हँसिया, तीर के नोक आदि बनाते हैं। इसके अतिरिक्त जंगल से तेंदूपत्ता, महुआ, गुल्ली, जंगली कंदमूल भी एकत्र करते हैं। जिनके पास कुछ कृषि जमीन है, ये मक्का, कोदो, कुटकी, धान, उड़द, मूंग बोते हैं। वर्षा में स्वयं के उपयोग हेतु मछली पकड़ते हैं।

अगरिया जनजाति की परम्परा 

अगरिया जनजाति पितृवंशीय, पितृसत्तात्मक व पितृ निवास स्थानीय जनजाति है। इनमें पथरिया तथा खुटिंया दो मुख्य उपजाति पाई जाती है। लोहा को पत्थर पर रख कर हथौड़ी से पीट-पीटकर उपकरण बनाने वाले पथरिया अगरिया तथा लोहे की खूंटी पर रखकर गर्म लोहा को पीटकर उपकरण बनाने वाले खूंटिया अगरिया हैं। सरगुजा क्षेत्र में यह असुर अगरिया कहलाते हैं। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

उपजातियों में कई बहिर्विवाह गोत्र पाये जाते हैं। इनके प्रमुख गोत्र बघेल, धुरवा, मरकाम, उईका, तेकाम, सोनवानी, मरावी, मसराम, करेआम, नाग, तिलाम, बेसरा, पोता, कुकरा आदि हैं। प्रत्येक गोत्र के टोटम पाये जाते है , जो पशु-पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधों, लता-वृक्ष,आदि पर आधारित होते हैं। 

गर्भावस्था में कोई विशेष संस्कार नहीं किया जाता। प्रसव स्थानीय बुजुर्ग महिलाएँ घर में ही कराती हैं। प्रसव उपरांत बच्चे का नाल हंसिया या चाकू से काटते हैं तथा नाल यहीं पर गड़ाते हैं। प्रसूता को महुआ, जामुन तथा तेंदु की छाल, अतिगन, पोपोड़, गुड़ आदि का काढ़ा बनाकर पिलाते हैं। तीसरे दिन से भात और अरहर की दाल खाने को देते हैं। छठे दिन प्रसूता व शिशु को नहलाकर कपड़ा पहनाते हैं। देवी-देवता को प्रणाम कराते हैं। को शराब पिलाते हैं।”

विवाह उम्र लड़कों का 16 से 18 वर्ष एवं लड़कियों का 15 से 17 वर्ष माना जाता है। विवाह प्रस्ताव वर पक्ष की ओर से होता है। वर के पिता वधू के पिता को चावल, दाल, हल्दी, तेल, गुड़, कपड़ा व नगद कुछ रुपये “खर्ची” (वधू धन) के रूप में देते हैं। विवाह संस्कार बुजुर्ग व्यक्तियों या परधान द्वारा संपन्न कराया जाता है। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

घर जमाई, गुरांवट, मामा या बुआ की लड़की से विवाह को सामाजिक मान्यता है। दुकू (घुसपैठ) व उदरिया (सहपलायन) में कुछ सामाजिक दंड लेकर विवाह के रूप में सामाजिक मान्यता देते हैं। विधवा, त्यगता का चूड़ी पहनकर पुनर्विवाह होता है।

मृत्यु होने पर मृतक को दफनाते हैं। तीसरे दिन तोज नहावन करते हैं। इस दिन परिवार व पुरुष सिर तथा दादी मूंछ के बाल कटाते हैं। घर तथा कपड़ों की स्वच्छता सफाई की जाती है। दसवें दिन मृत्यु भोज देते हैं। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

इस जनजाति में परंपरागत जाति पंचायत पाई जाती है। पंचायत का प्रमुख गोटिया कहलाता है। इस पंचायत में विवाह, तलाक, वधू मूल्य तथा अनैतिक संबंध आदि विवादों का फैसला किया जाता है।

अगरिया जनजाति के देवी-देवता और त्यौहार 

इनके प्रमुख देवी-देवता बूढ़ादेव, लोहासुर, ठाकुर देव, दूल्हा देव, शीतला माता, बाघदेव, जोगनी, घुरलापाट आदि हैं। इसके अतिरिक्त हिंदू देवी-देवता राम, कृष्ण, हनुमान, गणेश, सूर्य, चंद्रमा, वृक्ष, पहाड़, नदी, सर्प आदि की भी पूजा करते हैं। इनके प्रमुख त्योहार नवाखानी, दशहरा, दिवाली, होली, करमा पूजा आदि हैं। दशहरा में लोहासुर को काले मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं। भूत-प्रेत, जादू-टोना में विश्वास करते हैं।

इस जनजाति के लोग करमा पूजा में करमा नृत्य, दिवाली में पड़की, विवाह में विवाह नाच नाचते हैं। लोकगीत में करमा गीत, ददरिया, सुआ गीत, विवाह गीत, फाग, भजन आदि गाते हैं। ( अगरिया जनजाति छत्तीसगढ़ Agariya janjati chhattisgarh agariya tribe chhattisgarh )

वर्ष 2011 की जनगणना अनुसार इस जनजाति में साक्षरता 47.0 प्रतिशत थी। पुरुषों में साक्षरता 57.2 प्रतिशत तथा महिलाओं में 37.0 प्रतिशत थी।

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source : Internet

 

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