धूमकेतु का निर्माण कैसे होता है ?

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इस प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से नहीं दिया जा सकता। उर्ट नामक खगोलशास्त्री द्वारा प्रस्तावित कल्पना सामान्यतः स्वीकारी जाती है। इसके अनुसार सूर्य से करीब एक प्रकाश वर्ष के अंतर पर (एक प्रकाश वर्ष मतलब प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गयी दूरी।

मतलब सूर्य और पृथ्वी के बीच के अंतर से 60,000 गुना अधिक! यह लगभग दस हजार अरब कि.मी. होता है।) मेघ का एक आवरण है। यह जमी हुई गैस से बना है।

कभी किसी धक्के के कारण उसका कुछ अंश सूर्य की तरफ फेंका जाता है और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से उसकी ओर बढ़ने लगता है। सूर्य के पास आते-आते उष्णता के कारण उस जमी हुई गैस का वाष्पीकरण होता है।

सूर्य से निकलने वाली गैस का प्रवाह और सूर्य के प्रकाश के दबाव के कारण उस टुकड़े। की कुछ बाहरी गैस सूर्य की उलटी दिशा में फैल जाती है।

यही बनती है धूमकेतु की पूँछ ! यह गैस और से बनी होती है। धूल के कणों

यद्यपि धूमकेतु सूर्य की तरफ छलांग लगाता है, वह कभी-कभार ही सूर्य से सीधा टकराता है। अधिकांश समय वह सूर्य के पास से गुजर कर लंब-गोल कक्षा में घूमने लगता है।

ऐसी स्थिति में वह पृथ्वी से दिखाई पड़ता है। हैली द्वारा खोजा हुआ धूमकेतु हर 76 वर्षों बाद सूर्य के पास आता है। परंतु, अनेक धूमकेतुओं का आवर्तन काल हजारों वर्षों का होता है। उन्हें पुनः देखे जाने और पहचाने जाने की संभावना कम ही है।

धूमकेतु की कक्षा पर सूर्य के अलावा अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण का भी सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है। इनमें गुरु ग्रह का प्रभाव अधिक होता है और इस कारण धूमकेतु की कक्षा एवं आवर्तन काल में परिवर्तन आ सकता है।

शूमेकर-लेव्ही जैसा धूमकेतु गुरु के आकर्षण की चपेट में आ कर उससे टकरा कर नष्ट भी हो। सकता है। किंतु ऐसा हजार वर्षों में एकाध बार होने की संभावना है।

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