अंतरिक्ष दूरबीन का क्या महत्व है ?

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पृथ्वी वायुमंडल से घिरी है। तारे, आकाशगंगाएँ इत्यादि से निकली किरणें इस वायुमंडल से होकर हम तक पहुँच पाती हैं। इससे उनका कुछ हद तक अवशोषण होता है।

इसके अलावा वायुमंडल में छोटे-बड़े पैमाने पर अलग-अलग स्तरों के दोलन होते रहते हैं। इस कारण किरणों की दिशा कम-ज्यादा मात्रा में बदलती रहती है। इन कारणों से तारे इत्यादि धुंधले नजर आते हैं और उनके बिंबों की दिशा हल्के से बदलती रहती है ( प्रश्न 90 देखिए) ।

तारे स्पष्ट और स्थिर देखने के लिए वायुमंडल के ऊपर से निरीक्षण करना फायदेमंद होता है। इसलिए अंतरिक्ष में दूरबीन रखने का प्रयास मनुष्य ने किया।

1990 में अंतरिक्ष प्रथम दूरबीन रखकर निरीक्षण आरंभ किये गए। इस दूरबीन को खगोलशास्त्री एडविन हबल के नाम से नवाजा गया (प्रश्न 108 देखिए)। यह दूरबीन पृथ्वीतल पर रखी दूरबीनों से कहीं अधिक सक्षम साबित हुई है।

अत्यंत धुंधले तारे इत्यादि खोजकर उनकी स्पष्ट तस्वीरें खींचना हबल दूरबीन ने संभव किया है। इसका संपूर्ण नियंत्रण पृथ्वी से ही होता है। यह दूरबीन पृथ्वी से 600 किलोमीटर ऊपर पृथ्वी की परिक्रमा करती रहती है।

इसके पूर्व अल्ट्रा व्हायलेट, क्ष-किरण आदि के निरीक्षण करने वाली दूरबीनें उपग्रह के माध्यम से सन् 1970 से ही ऊपर भेजी गई हैं।

पर इन सभी से हबल दूरबीन का प्रकल्प अधिक बड़ा है। उसका आकार निश्चित करते वक्त वह स्पेस शटल में समा सकेगी, इसका ध्यान रखा गया था। इसके आईने का व्यास करीब 205 मीटर है।

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